Mitron Movie Review: वीकेंड के लिए हल्की-फुल्की मजेदार फिल्म, देखकर फ्रेश हो जाएंगे
फिल्म का एक सीन है जिसमें एक शादी चल रही है और यहां एक अमीर बिजनेसमैन (मोहन कपूर) रौनक (प्रतीक गांधी) से एक टिपिकल सवाल पूछता है, 'तुम करते क्या हो?' इस सवाल पर रौनक बड़ी शांती से जवाब देता है कि वो राइटर है और किताब लिख रहा है जिसका नाम है 'माइंड योर ओन बिजनेस'.. शारिब हाशमी की चटपटी लाइनें और प्रतीक गांधी की शानदार कॉमेडी 'मित्रों' को हल्की-फुल्की, मजेदार और इंगेजिंग फिल्म बनाती है।

फिल्म में लीड रोल प्ले कर रहे हैं जय (जैकी भगनानी) जो मजबूरी में इंजीनियरिंग कर लेते हैं लेकिन दिल से शेफ बनना चाहते हैं। इस फिल्म एक ट्विस्ट है ये लड़का अपने ही सपने को पूरा करने के लिए बुरी तरह आलसी है। मेहनत करने के बजाए वो एक अमीर बिजनेस टाइकून का दामाद बनना चाहता है। इसी जद्दोजहद में उसकी मुलाकात होती है अवनी (कृतिका कामरा) से जो कि एक एंबीशियस लड़ी है जो ऑस्ट्रेलिया में अपनी ड्रीम जॉब कर रही है।
जय और अवनी का जिंदगी को लेकर नजरिये में जमीन आसमान का अंतर है फिर भी दोनों जुड़ने का छोटा सा जरिया खोज लेते हैं। दोनों को ही अपने समोसे में सॉस पसंद नहीं होता। जहां एक तरफ जय आलसी और सपनों में रहने वाला इंसान है वहीं दूसरी तरफ अवनी एक तेज तर्रार बिजनेस वुमेन है। अवनी जय तो सुझाती है कि वो अपना एक फूड ट्रक शुरू करे। यहां से शुरूआत होती है एक ऐसे सफर की जिससे ऑडिएंस भी रिलेट कर पाती है।
मित्रों के प्लॉट की बात करें तो इसका अंदाजा लगाना काफी आसान काम है। हालांकि नितिन कक्कड की स्क्रिप्ट इस कहानी को फ्रेश बना देती है। इस बार उन्होंने वापसी की है चकाचौंध से दूर एक लाइट हार्टेड फिल्म के साथ। ये फिल्म विजय देवराकोंडा-ऋतु वर्मा की तुलुगू हिट फिल्म 'पेल्ली चोपुलु' से ली गई है। कक्कड फिल्म मित्रों को अपना ट्रेड मार्क टच देते हैं। शारिब हाशमी का लेखकर चमक कर उभरता है। बॉलीवुड की ऐसी फिल्मों में किसी फीमेल हीरो कम ही देखने को मिलती हैं और यहीं मित्रों बाकी फिल्मों से अलग और शानदार साबित होती है।
वहीं दूसरी फिल्म फिल्म का लेखन कहीं-कहीं बिखर जाता है और कुछ सीन काफी तेजी से निकल जाते हैं। फिल्म के किरदारों पर थोड़ा और ध्यान दिया जाता तो फिल्म और भी अच्छी हो सकती थी।
एक लंबे समय बाद फिल्मों में वापसी कर रहे जैकी भगनानी की एक्टिग दिल जीत लेती है। ऐसा मालूम होता है कि ये किरदार उन्हीं के लिए लिखा गया है। कृतिका कामरा फिल्म में किसी ताजी हवा की तरह मालूम होती हैं। उनका टैलेंट ये साबित करता है कि बॉलीवुड को अभी ऐसे कई टैलेंट को एक्सप्लोर करना बाकी है। प्रतीक गांधी और भाविन पारेख में से प्रतीक को काफी बेहतर लाइनें मिली हैं। वहीं नीरज सूद को देखना किसी ट्रीट से कम नहीं लगा।
नितिन कक्कड गुजराती कल्चर को बखूबी दिखाते हैं और स्टीरियोटाइप से दूर रखते हैं। सचिंद्र वत्स की शानदार एडिटिंग ऑडिएंस को फिल्म से जोड़े रखती है।
फिल्म का शानदार म्यूजिक दिखता है कमरिया और दिस पार्टी इज़ ओवर जैसे गानों में। वहीं चलते-चलते भी बेहद सूदिंग है।
मित्रों दिल से बनाई गई एक ऐसी फिल्म है जो ऑडिएंस के दिलों को जीतने में कामयाब हो जाती है। ये फिल्म कई कमियों के बावजूद फील गुड फिल्म है और आपको एक बड़ी सी स्माइल के साथ छोड़ती है। हमारी तरफ से इस फिल्म 3 स्टार।


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