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    शायद हेमामालिनी की बेरूखी ही संजीव कुमार बर्दाश्त नहीं कर पाये?

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    आज बहुमुखी प्रतिभा के धनी संजीव कुमार का जन्मदिन हैं। बेनायाब कलाकारी के मालिक संजीव कुमार को एक ऐसे बहुआयामी कलाकार के तौर पर जाना जाता है जिन्होंने नायक, सहनायक, खलनायक और चरित्र भूमिकाओं से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। उनके अभिनय की यह विशेषता रही कि वह किसी भी तरह की भूमिका में खुद को ढाल लेते थे। फिल्म 'कोशिश' में एक गूंगे की भूमिका हो या 'शोले' में ठाकुर की भूमिका।

    'सीता और गीता' में लवर बॉय की भूमिका हो या 'नया दिन नई रात' में नौ अलग-अलग भूमिकाएं, सभी में उनका अभिनय लाजवाब रहा। इस फिल्म में संजीव ने लूले-लंगड़े, अंधे, बूढ़े, बीमार, कोढ़ी, हिजड़े, डाकू, जवान और प्रोफेसर के किरदार को निभाकर जीवन के नौ रसों को रुपहले पर्दे पर साकार किया।

    कहा जाता है कि फिल्म 'सीता और गीता' को करते वक्त उनका दिल अभिनेत्री हेमामालिनी पर आ गया था। लेकिन स्वभाव से बेहद शर्मिले होने के कारण वो अपनी दिल की बात हेमा से नहीं कह पा रहे थे इसलिए उन्होंने अपने दिल की बात कहने के लिए अपने और हेमा के कॉमन फ्रेंड जितेन्द्र को चुना था लेकिन शायद उन्हें पता नहीं था कि जितेन्द्र भी हेमा से दिल ही दिल में प्यार करने लगे थे और जब संजीव ने उन्हें अपने प्यार की बात करने के लिए हेमा के पास भेजा तो जितेन्द्र ने उन्हें साइडलाइन करके अपनी दोस्ती हेमा से बढ़ा ली।

    इस बात पर कहा जाता है कि संजीव और जितेन्द्र का झगड़ा भी हुआ था। लेकिन हेमा के दिल में ना तो संजीव के लिए और ना ही जितेन्द्र के लिए कोई जगह थी क्योंकि हेमा का दिल तब तक बॉलीवुड के ही-मैन धर्मेंद्र पर चुका था। हेमा की यह बेरूखी संजीव से बर्दाश्त नहीं हुई और वो अवसाद के शिकार हो गये जो कि शायद उनकी मौत का कारण बना।

    संजीव कुमार के बारे में जानेंगे कुछ और बातें इसके लिए क्लिक कीजिये नीचे की स्लाइडों पर..

    असली नाम हरिभाई जरीवाला

    असली नाम हरिभाई जरीवाला

    मुंबई में 9 जुलाई, 1938 को एक मध्यम वर्गीय गुजराती परिवार में जन्मे संजीव कुमार का असली नाम हरिभाई जरीवाला था। बचपन से ही वह फिल्मों में नायक बनने का सपना देखा करते थे। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने फिल्मालय के एक्टिंग स्कूल में दाखिला लिया। वर्ष 1962 में राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'आरती' के लिए उन्होंने स्क्रीन टेस्ट दिया, जिसमें वह पास नहीं हो सके। संजीव को सर्वप्रथम मुख्य अभिनेता के रूप में 1965 में प्रदर्शित फिल्म 'निशान' में काम करने का मौका मिला।

    संघर्ष करते रहे...

    संघर्ष करते रहे...

    वर्ष 1960 से वर्ष 1968 तक संजीव कुमार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। फिल्म 'हम हिंदुस्तानी' के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने 'स्मगलर', 'पति-पत्नी', 'हुस्न और इश्क', 'बादल', 'नौनिहाल' और 'गुनाहगार' जैसी कई फिल्मों में अभिनय किया, लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।

    'फिल्म फेयर अवार्ड'

    'फिल्म फेयर अवार्ड'

    वर्ष 1968 में प्रदर्शित फिल्म 'शिकार' में वह पुलिस ऑफिसर की भूमिका में दिखाई दिए। यह फिल्म पूरी तरह अभिनेता धर्मेद्र पर केंद्रित थी, फिर भी संजीव धर्मेद्र जैसे अभिनेता की मौजूदगी में अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फिल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें सहायक अभिनेता का 'फिल्म फेयर अवार्ड' भी मिला।

    राष्ट्रीय पुरस्कार

    राष्ट्रीय पुरस्कार

    वर्ष 1970 में प्रदर्शित फिल्म 'खिलौना' की जबर्दस्त कामयाबी के बाद संजीव कुमार ने बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बनाई। वर्ष 1970 में ही प्रदर्शित फिल्म 'दस्तक' में उनके लाजवाब अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के 'राष्ट्रीय पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। वर्ष 1972 में प्रदर्शित फिल्म 'कोशिश' में उनके अभिनय का नया आयाम दर्शकों को देखने को मिला। इस फिल्म में उनके लाजवाब अभिनय के लिए उन्हें दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया।

    जया के प्रेमी भी और ससुर भी...

    जया के प्रेमी भी और ससुर भी...

    वर्ष 1975 में प्रदर्शित रमेश सिप्पी की सुपरहिट फिल्म 'शोले' में वह अभिनेत्री जया भादुड़ी के ससुर की भूमिका निभाने से भी नहीं हिचके। हालांकि संजीव कुमार ने फिल्म 'शोले' के पहले जया भादुड़ी के साथ 'कोशिश' और 'अनामिका' में नायक की भूमिका निभाई थी। वर्ष 1977 में प्रदर्शित फिल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' में उन्हें महान निर्देशक सत्यजित रे के साथ काम करने का मौका मिला।

    दर्शकों के दिल पर राज करने लगे

    दर्शकों के दिल पर राज करने लगे

    इसके बाद संजीव कुमार ने मुक्ति (1977), त्रिशूल (1978), पति पत्नी और वो (1978), देवता (1978), जानी दुश्मन (1979), गृहप्रवेश (1979), हम पांच (1980), चेहरे पे चेहरा (1981), दासी (1981), विधाता (1982), नमकीन (1982), अंगूर (1982) और हीरो (1983) जैसी कई सुपरहिट दी और उसके बाद तो वह दर्शकों के दिल पर राज करने लगे।

    हेमामालिनी से प्यार करते थे संजीव कुमार?

    हेमामालिनी से प्यार करते थे संजीव कुमार?

    कहा जाता है कि वो हेमामालिनी को बेंइंतहा प्यार करते थे लेकिन हेमा के मना करने की वजह से वो अवसाद ग्रस्त हो गये थे। और इसी वजह से 6 नवंबर, 1985 को दिल का गंभीर दौरा पड़ा और उन्होंने दुनिया से विदा ले ली।

    English summary
    Sanjeev Kumar liked Hema malini But Hema Liked Dharmendra, So he lost his love. Its was main reason behind his death said Bollywood Pandits.
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