सूरमा REVIEW: दिलजीत दोसान्ज्ह एक सुपरस्टार हैं और ये फिल्म आपको बताएगी क्यों!
एक समय ऐसा आएगा जब सूरमा में तापसी पन्नू का किरदार दिलजीत दोसान्ज्ह के किरदार संदीप सिंह को कहता है, "लाइफ में गोल होगा ना, तो यहां भी हो जाएगा।" हमारी मानिए तो यही एक लाइन पूरी फिल्म सूरमा, का सार है। इसी एक लाइन पर शाद अली की ये पूरी फिल्म टिकी हुई है। आजकल बायोपिक का ज़माना है और शाद अली की कहानी प्रेरणा लेती है हॉकी स्टार संदीप सिंह की ज़िंदगी से।
संदीप सिंह, हॉकी चैंपियन हैं जो कुछ साल पहले मौत के मुंह से जूझते हुए अपने जादुई कमबैक की वजह से चर्चा में आए थे। संदीप को डॉक्टरों ने जीवन भर के लिए हॉकी खेलने के लिए अयोग्य बता दिया और उसके बाद संदीप ने अपनी ज़िंदगी की नई कहानी, खुद लिखी थी जिसे शाद अली ने परदे पर उतारने की कोशिश की है।

हालांकि एक जीत, ज़िद और जुनून की इस साहसी सी कहानी के पीछे एक प्यारी सी प्रेम कहानी भी छिपी है। सूरमा की शुरूआत होती है शाहाबाद से, 1994 में। जहां पर एक छोटा संदीप सिंह अपने सपने बुन रहा है, भारतीय हॉकी टीम में जगह पाने के। हालांकि उसकी दिलचस्पी तभी खत्म हो जाती है जब उसका सख्त कोच उसे ज़्यादा तवज्जो नहीं देता है।
हालांकि कई साल बीत जाते हैं और संदीप फिर से हॉकी तब उठाता है जब उसका दिल आता है हरप्रीत को हॉकी खेलता देख। इस किरदार को निभाया है तापसी पन्नू ने। हरप्रीत, संदीप में वापस से हॉकी के लिए प्यार जगाती है और जल्दी ही संदीप को अपने शानदार स्टाइल के लिए फ्लिकर सिंह कहा जाने लगा।
हालांकि संदीप की ज़िंदगी में सब कुछ पलट तब जाता है जब वर्ल्ड कप के लिए जाते समय उन्हें शताब्दी एक्सप्रेस में गलती से एक गोली लग जाती है और उनके शरीर के निचले हिस्से को लकवा मार जाता है। इस समय भारतीय टीम जर्मनी वर्ल्ड कप के लिए निकल रही होती है।हरप्रीत को जीवन में कुछ कड़े फैसले लेने पड़ते है।
बाकी की पूरी कहानी संदीप के जुझारूपन पर है कि कैसे वो भारतीय हॉकी में एक जादुई वापसी करते हैं और साबित करते हैं कि वो एक सूरमा हैं। फिल्म का पहला हाफ संदीप के एक हीरो बनने की कहानी है। एक हल्की फुल्की सी कहानी है और लीड पेयर का रोमांस है जो फिल्म को बांधे रखने में सफल होता है।
फिल्म की असली दिक्कत इंटरवल के बाद शुरू होती है। यहां से फिल्म गंभीर होना शुरू होती है। जैसे जैसे फिल्म भारी होती जाती है, दर्शकों के लिए ऊबाऊ होती जाती है। बहुत ज़्यादा मेलोड्रामा फिल्म की गहराई को समतल कर देता है। आपका जुड़ाव किरदारों से खत्म होता जाता है। क्लाईमैक्स तक आते आते फिल्म आपसे पूरी तरह छूट जाती है।
शाद अली का लेखन और निर्देशन सूरमा में कोई असर नहीं छोड़ता। एक समय के बाद हर किरदार बेजान सा हो जाता है। लेकिन अभिनय की बात करें तो दिलजीत दोसान्ज्ह वाकई सुपरस्टार हैं। फिल्म का हर फ्रेम उनके नाम है। किरदार को गहराई से पकड़ने की उनकी समझ काबिले तारीफ है और परदे पर दिखाई देती है।
दिलजीत के अंदर अभी भी एक बच्चे सी मासूमियत है और वहीं दूसरी तरफ उनके पास एकदम गबरू भारी अंदाज़ है। बॉलीवुड को इस आदमी पर काफी ध्यान देने की ज़रूरत है। हाथ जोड़कर विनती है। तापसी पन्नू एक बार फिर अपना जादू चलाती हैं लेकिन उनके किरदार में थोड़ा और ठहराव फिल्म को बेहतर कर सकता था।
अंगद बेदी अपने बेस्ट फॉर्म में दिखे हैं। सतीश कौशिक गलतियां करते ही नहीं हैं जबकि विजय राज़ जब भी स्क्रीन पर आए, आप बोर नहीं होंगे ये उनकी पूरी कोशिश रही जो कि काफी हद तक सफल भी रही।
सिक्के के दूसरे पहलू पर जाए तो शाद अली का निर्देशन और लेखन दोनों ही ढीला है और इतने मज़बूत विषय को बांधने में इसीलिए कामयाब नहीं हो पाया। फिल्म रिसर्च के मामले में काफी अच्छी थी, फिल्म में डीटेल्स पूरी थीं और ये सही मायनों में बायोपिक थी लेकिन आपको बांधे रखने में नाकामयाब थी क्योंकि ये रिसर्च परदे पर ढंग से नहीं उतारी गई।
जो लोग फिल्म से एक रोंगटे खड़ी कर देने वाली कहानी की उम्मीद कर रहे हैं उन्हें निराशा के अलावा कुछ हाथ नहीं लगेगा। चिरंतन दास की सिनेमैटोग्राफी ठीक दिखती है लेकिन फारूक हुंडेकर की एडिटिंग में कमी परदे पर साफ दिखाई देती है। किसी भी गाने में छू लेने जैसा कुछ भी नहीं है, टाईटल ट्रैक के अलावा। शंकर एहसान लॉय यहां पर असफल दिखते हैं।
कुल मिलाकर सूरमा दिल से बनाई गई एक फिल्म है जिसकी धड़कनें काफी धीमी गति से चलते चलते रूक जाती हैं। दिलजीत दोसान्ज्ह ने अपना गोल निशाने पर लगाया है और वो अपने आपको एक शानदार एक्टर के तौर पर स्थापित करते हैं। लेकिन वो मैन ऑफ द मैच भले ही पर मैच नहीं जीत पाते हैं। जिसका कारण है शाद अली का डायरेक्शन। संदीप सिंह की कहानी इतनी शानदार है कि इसे एक बेहतर डायरेक्टर की ज़रूरत थी।
हमारी तरफ से फिल्म को 2.5 स्टार।


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