Kuttey Review: लालच की अंधेरी दुनिया में घूमते "कुत्ते", बंदूकों के साथ ह्यूमर का दिलचस्प डोज देते हैं आसमान

Rating:
3.5/5

kuttey-review-aasman-bhardwaj-dark-world-of-greed-with-toting-guns-and-dose-of-humour-is-interesting

निर्देशक- आसमान भारद्वाज
कलाकार- अर्जुन कपूर, तब्बू, कुमुद मिश्रा, कोंकणा सेन शर्मा, नसीरूद्दीन शाह, राधिका मदान, शार्दुल भारद्वाज

पुलिस वैन में बैठी पम्मी (तब्बू) अपने साथियों को बिच्छू और मेंढ़क की कहानी सुनाती है कि कैसे एक मेंढ़क ने नदी पार करने के लिए बिच्छू की मदद की, लेकिन बिच्छू ने उसे बीच रास्ते में ही काट लिया, क्योंकि ढंक मारना उसका कैरेक्टर है। पूरी फिल्म कहीं ना कहीं इसी कहानी के तर्ज पर चलती है, जहां सभी किरदार लॉजिक से नहीं बल्कि अपनी फितरत से मजबूर हैं।

तीन अलग अलग चैप्टर में बंटी, आसमान भारद्वाज की 'कुत्ते' कुछ भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों, ड्रग डीलर्स और नकस्लियों की अलग अलग कहानी है, जो एक ही चीज से जुड़ती है.. वो है लालच। पैसों की लालच और अपनी जान बचाने की चाहत। सबके अपने अपने मकसद हैं, जरूरते हैं, लेकिन क्या वो उसमें सफल हो पाएंगे! इसी के इर्द गिर्द घूमती है कहानी।

कहानी

कहानी

कहानी शुरु होती है नक्सली समूह की लीडर लक्ष्मी (कोंकणा सेन शर्मा) से, जो जेल में पुलिस इंस्पेकटर पाजी (कुमुद मिश्रा) से कहती है, "जंगल का एक ही वसूल है.. या तो शिकार करो, या शिकार बनो"। जेल से भागते हुए वो पाजी को छोड़कर बाकी सभी पुलिस वालों को गोलियों से भून डालती है।

अब कहानी 13 साल आगे बढ़ती है, जहां पाजी अपने सीनियर अफसर गोपाल (अर्जुन कपूर) के साथ शहर के ड्रग डीलर्स के धंधे के बीच फंसा है। एक घटना के बाद, दोनों को संस्पेंड कर दिया जाता है और उन्हें अपनी जान बचाने के लिए करोड़ों रूपए की जरूरत होती है। यहां से शुरु होता है कहानी का अलग हिस्सा। शहर के एक एटीएम में पैसे डालने के लिए एक वैन करोड़ों की नकदी लिये आ रही होती, जिसे पुलिस फोर्स से सस्पेंडेड गोपाल (अर्जुन कपूर) लूटने की योजना बनाता है। उसे अपने जान बचाने के लिए दो करोड़ रूपयों की जरूरत है। लेकिन उसे इस बात का अंदाजा नहीं है कि और दो गिरोह भी इसी ताक में हैं। हर किसी का अपना अलग गुप्त मकसद है। एक दूसरे से अंजान तीनों गिरोह आमने सामने आ जाते हैं.. गोपाल, शहर के सबसे बड़े माफिया की बेटी (राधिका मदान), उसका लवर (शार्दुल भारद्वाज) , उच्च पुलिस अधिकारी पम्मी (तब्बू) और पाजी (कुमुद मिश्रा)। और फिर शुरु होता है सिलसिला- गोलियां बरसाने का, हत्या का, विश्वासघात का। इस खूनी खेल में कौन बचता है, कौन जान की बाजी हारता है और किसे मिलते हैं करोड़ों रूपए.. ये जानना आपके लिए दिलचस्प होगा।

अभिनय

अभिनय

इस लंबी चौड़ी स्टारकास्ट में कोई शक नहीं कि तब्बू सबसे ज्यादा प्रभावशाली रही हैं। एक भ्रष्ट बॉस लेडी के किरदार में वो दमदार लगी हैं। पुरुषों से घिरी दुनिया में, वह सबको अपने इशारों पर नचाने की क्षमता रखती हैं। जो अपशब्दों से भरे संवाद बोलती हैं, लेकिन मजाकिया अंदाज से फिल्म में जरूरी कॉमिक राहत भी लाती हैं। अपने किरदार में वो सहज दिखीं है। कोंकणा सेन शर्मा, राधिका मदान, शार्दुल भारद्वाज और कुमुद मिश्रा अपने अभिनय से छाप छोड़ते हैं। फिल्म मुख्य रूप से अर्जुन कपूर के इर्द गिर्द घूमती है, निर्देशक ने उन्हें तमाम भाव दिखाने का मौका भी दिया है, जहां अर्जुन अभिनय को लेकर ईमानदार दिखे हैं। नसीरूद्दीन शाह कुछ ही मिनटों के लिए हैं और उनका किरदार खास प्रभावी नहीं रहा।

निर्देशन

निर्देशन

विशाल भारद्वाज के बेटे आसमान भारद्वाज ने इस फिल्म के साथ निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा है। और इस फिल्म के लिए उनकी सराहना जरूर होनी चाहिए। आसमान ने एक साथ कई सामनांतर कहानियों की दुनिया बुनी है और सभी को एक कड़ी के साथ जोड़ते हैं। कहानी में कई ट्विस्ट एंड टर्न्स हैं, जो दिलचस्प हैं। फर्स्ट हॉफ जितनी गहराई के साथ शुरु होती है, धीरे धीरे कहानी थोड़ी बिखरती लगती है। लेकिन सेकेंड हॉफ इतनी मजबूत है कि आप सारी कमियों को नजरअंदाज कर देते हैं। सेकेंड हॉफ में बिल्कुल सही मात्रा संस्पेंस है, जिसे कॉमेडी के हल्के डोज के साथ परोसा गया है। खास बात है कि फिल्म अपनी टाइटल के साथ न्याय करती है। हालांकि कभी कभी फिल्म ज्यादा डार्क होने की कोशिश करती है, लेकिन वहां सफल नहीं हुई है।

तकनीकी पक्ष व संगीत

तकनीकी पक्ष व संगीत

कुत्ते की डायरेक्शन, पटकथा और सिनेमैटोग्राफी सभी एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं, यही सबसे अच्छी बात है। ए श्रीकर प्रसाद की एडिटिंग काफी कसी हुई है, जो फिल्म को टैक से भटकने नहीं देती है। वहीं, फरहाद अहमद देल्वी की सिनेमेटोग्राफी काफी रोमांचक है।

फिल्म का संगीत विशाल भारद्वाज ने तैयार किया है। टाइटल ट्रैक लिखा है फैज अहमद फैज ने, जबकि बाकी सभी गानों के बोल गुलजार ने लिखे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि विशाल भारद्वाज का संगीत फिल्म की अंधेरी दुनिया को एक ऊंचाई देती है। खास बात है कि सारे गाने फिल्म की गति को रोके बिना पटकथा के साथ अच्छी तरह से मेल खाता है।

रेटिंग

रेटिंग

एक डेब्यू डायरेक्टर के रूप में, आसमान भारद्वाज की कोशिश तारीफ लायक है। एक उलझी व्यंग्यात्मक कहानी और प्रतिभाशाली कलाकारों के साथ उन्होंने अपनी प्रतिभा साबित की है। इस जॉनर बनी फिल्मों से तुलना की 'कुत्ते' बहुत गहरी या जटिल नहीं है। लेकिन कोई शक नहीं कि यह मनोरंजक है। 1 घंटे 52 मिनट की यह फिल्म आपका ध्यान स्क्रीन से भटकने नहीं देती है। फिल्मीबीट की ओर से 'कुत्ते' को 3.5 स्टार।

More from Filmibeat

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+
X