Bhavesh Joshi Superhero Review: 'इंसाफ-मैन' की कहानी में ऑडिएंस के साथ नाइंसाफी, जानें क्यों
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मुंबई की सड़कों पर मास्क लगा कर सुपरहीरो की तरह घूमता एक आम लड़का। ये आइडिया सुनने में काफी इंटरेटिंग मालूम होता है। हमें भी ऐसा ही कुछ लगा जब पता चला कि विक्रमादित्य मोटवानी भावेश जोशी सुपरहीरो के नाम से ऐसी फिल्म बना रहे हैं जिसका लीड एक्टर बिना केप का एक सुपरहीरो है। बॉलीवुड में इस जेनर पर फिल्म कम ही बनती हैं। लेकिन क्या विक्रमादित्य अपने 'इंसाफ-मैन' से ऑडिएंस को इंप्रेस कर पाए?.. हम कहेंगे.. थोड़ा बहुत।
प्लॉट की बात करें तो सिकंदर खन्ना उर्फ सिक्कू (हर्षवर्धन कपूर), भावेश जोशी (प्रियांशू पेन्युली) और रजत (आशीष वर्मा) तीन जवान लड़को हैं तो सोसाइटी के बारे में दूसरों से ज्यादा फिक्र करते हैं और समाज में सुधार करना चाहते हैं। सिक्कू और भावेश मिलकर इंसाफ टीवी नाम से एक यू-ट्यूब चैनल शुरू करते हैं जिसमें ने ब्राउन पेपर का मास्क पहनकर आम आदमी को बचाते हुए नजर आते हैं।

दुर्भाग्य से कुछ ऐसा होता है जिससे कि लीड सिक्कू इस मिशन से अलग हो जाता है और MNC में नौकरी करने लगता है। दूसरी तरफ, भावेश जोशी समाज से गलत चीजें और भ्रष्टाचार को मिटाने के मिशन पर लगा रहता है। इसी दौरान उसका सामना पानी माफियाओं से होता है और ये लोग उसे मौत के घाट उतार देते हैं। अपने दोस्त की मौत से बुरी तरह दुखी सिक्कू एक ऐसा फैसला लेता है जो उसे मौत के करीब भी ले जा सकता है।
दूसरी तरफ, भावेश जोशी सुपरहीरो एक पेपर शानदार कहानी है लेकिन दुख की बात ये है कि विक्रमादित्य मोटवानी के कमजोर निर्देशन और लचर लिखावट ने फिल्म को बर्बाद कर दिया है। एक ऐसा फाइटर जो किसी कॉमिक बुक कैरेक्टर ने नहीं मिला और न ही उसके पास कोई सुपर पावर है.. ये कॉन्सेप्ट काफी इंटरेटिंग हो सकता था। इसके बावजूद ये फिल्म 155 मिनट की उबाऊ कहानी बन कर ही रह गई।
राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म से फ्लॉप डेब्यू करने वाले हर्षवर्धन कपूर एक बार फिर दूसरी फिल्म में भी कुछ खास कमाल नहीं कर पाए। कुछ सीन्स को छोड़कर हर्षवर्धन ऑडिएंस को इंप्रेस करने में पूरी तरह फेल साबित हुए हैं।
प्रियांशू पेन्यूली काफी प्रॉमिसिंग लगे हैं। जो इस फिल्म में कुछ यादगार सीन देते हैं। आशीष वर्मा भी अपने रोल में ठीक-ठाक दिखे हैं। फिल्म में हर्षवर्धन कपूर की प्रेमिका बनी श्रेया सबरवाल का रोल फिल्म में जबरदस्त ठूंसा हुआ मालूम होता है। विलेन के किरदार में निशिकांत कमात भी बुरी तरह फेल हुए हैं।
फिल्म के घिसटते हुए बेकार के लंबे सेकेंड हाफ में एडिटिंग कुछ और अच्छी हो सकती थी। हलांकि इस फिल्म की सिनेमैटोग्राफी काफी बेहतरीन है। फ्रेंच स्टंट कोरियोग्राफर्स सिरिल रफाएली और सेबेस्टियन सेवौ का खतरनाक बाइक चेजिंग सीक्वेंस फिल्म का सबसे बेहतरीन सीन है। ऐसा लगता है कि फिल्म में कुछ ऐसे थ्रिलर सीन थोड़े और जोड़ने चाहिए थे। फिल्म के गाने फिलर मात्र बनकर रह गए हैं।
पूरी फिल्म की बात करें तो, जबरदस्त सब्जेक्ट के बावजूद, आडिएंस को इंप्रेस करने में फेल हो गई भावेश जोशी सुपरहीरो। इसके साथ ही ये फिल्म विक्रमादित्य मोटवानी की सबसे कमजोर फिल्म है। इस फिल्म की एक लाइन है- हीरो पैदा नहीं होता, बनता है.. भारी दिल से हम आपको बता दें कि मोटवानी की ये फिल्म ये खुद की ये टैग लाइन साबित नहीं कर पाई है। हम इस फिल्म को सिर्फ 2 स्टार दे रहे हैं।


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