मोतीचूर चकनाचूर एक बॉलीवुड कॉमेडी-ड्रामा है, जो लोकप्रिय टीवी निर्देशक देबमित्रा हसन द्वारा अभिनीत है। फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी और अथिया शेट्टी मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म मुख्य तौर से शादी और रिश्तों के तानेबाने से बुनी हुई है। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी एक कुँवारे लड़के की भूमिका निभा रहे हैं जो एक दुल्हन की तलाश कर रहा है, और जो एक बदसूरत, मोटी, गंजी लड़की से भी शादी करने के लिए तैयार है। दूसरी ओर, अथिया शेट्टी एक ऐसी लड़की की भूमिका निभा रही है, जो केवल एक एनआरआई से शादी करना चाहती है। यह सारी चीजें सबसे ज़्यादा हाँस्य मोड़ तब लेती है, जब ये दोनों लोगो की गाँठे आपस में बांध दी जाती है। कहानी है, एनी यानि की अनिता (अथिया शेट्टी) की, जो विदेश में रहने वाले लड़के से ही शादी करना चाहती है। वजह भी काफी सिंपल है.. फेसबुक। एनी की सहेलियां अपने पति के साथ विदेश घूम रही हैं और फेसबुक पर उनकी तस्वीरों को देखकर एनी भी फैसला कर लेती है कि वह भी शादी के बाद विदेश जाएगी और तस्वीरें डालकर दोस्तों को जलाएगी। इसी क्रम में एनी अब तक 10 लड़कों को शादी के लिए रिजेक्ट कर चुकी है। ऐसे में एंट्री होती है अनिता के पड़ोसी दुबई रिटर्न पुष्पिंदर त्यागी (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) की, जो दिन रात शादी के सपने देखते हुए वापस घर आया है और इस बार छुट्टियों में किसी भी तरह शादी के बंधन में बंधने को लालायित है। अपने भाई से बात करते हुए पुष्पिंदर कहता है- कोई काली, नाटी, मोटी या टकली ही क्यों ना हो, मैं किसी भी लड़की से अब शादी कर लूंगा। पुष्पिंदर दुबई में नौकरी करता है, यह जानकर अनिता उससे प्यार का नाटक करती है और दोनों शादी कर लेते हैं। लेकिन इसके बाद आता है कहानी में ट्विस्ट। अभिनय की बात की जाए तो नवाजुद्दीन सिद्दिकी और अथिया शेट्टी अपने किरदारों में खूब जमे हैं। नवाजुद्दीन तो दमदार अभिनेता हैं ही, लेकिन अथिया ने इस फिल्म में सरप्राइज दिया है। शादी के सपने लिए एक मिडिल क्लास लड़की के किरदार में वह आत्म विश्वास से भरपूर और तैयार नजर आई हैं। वहीं, फिल्म में सह कलाकारों की टोली भी काफी उम्दा रही। विभा छिब्बर, नवीन परिहार, करूणा पांडे, संजीव वत्स और अभिषेक रावत जैसे कलाकारों ने फिल्म को एक ताजगी दी है। निर्देशन और तकनीकि पक्ष की बात की जाए तो इस दिशा में फिल्म औसत रही है। जहां फिल्म का फर्स्ट हॉफ हंसी मजाक में आसानी से गुज़र जाता है, वहीं सेकेंड हॉफ में कहानी थोड़ी गंभीर हो जाती है। क्लाईमैक्स को मजेदार बनाने की पूरी कोशिश की गई है। इस हंसी मजाक के बीच निर्देशक ने दहेज प्रथा जैसे मुद्दों को भी उठाने की कोशिश की है, लेकिन सफल नहीं रही हैं। "भाई की शादी में लिया गया दहेज बहन की शादी में इस्तेमाल होगा".. से कहानी शुरु होकर "दहेज लेकर मैं अपना आत्म सम्मान नहीं खोना चाहता" तक फिल्म में दहेज को लेकर इतनी बातें और तर्क रखे गए हैं कि यह ऊबाऊ हो जाता है, बाकी फिल्म की सिनेमेटोग्राफी, एडिटिंग, संगीत के क्षेत्र में फिल्म औसत है।