Review जीत की जिद- सैनिकों के जिद को जिंदा करते हैं अमित साध, सच्ची कहानी में दमदार परफॉरमेंस
वेब सीरीज- जीत की जिद
कलाकार-अमित साध, अमृता पुरी, सुशांत सिंह, एली गोनी आदि
निर्देशक-विशाल मैंगलोरकर
निर्माता-बोनी कपूर
यहां देखिए- जी 5
दुश्मन के सामने खड़े होकर देश के लिए मर मिटने का जज्बा सेना के जवानों की वर्दी से महकता है। किसी भी सैनिक के जीवन की हकीकत देश प्रेम और देशवासियों के लिए प्रेरणा तक सीमित नहीं होती। बल्कि खुद के साथ भी एक जंग होती है जिसे वह अपने भीतर हर पल लढ़ता है। परिवार से दूर रहकर देश के लिए सर्पित होना के जीता जागता उदाहरण भारत की सीमा पर खडे़ हर उस वीर जवान के जोश में देखा जा सकता है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि क्या होता होगा जब एक सैनिक ऐसे हालात में उलझ जाए जहां, हताशा-निराशा और गहरा अंधकार हो? जी 5 की सीरीज जीत की जिद ऐसे ही एक फौजी अफसर की सच्ची कहानी है जो कि कारगिल युद्ध के बाद अपने चलने की शक्ति खो देता है। ये सीरीज केवल एक्स आर्मी अफसर मेजर दीप सिंह के हौसले जिंदगी और जंग की कहानी नहीं दिखाती, बल्कि हर उस सैनिक को सलामी देती है, जो सीमा पर एक युद्ध खत्म कर दूसरे युद्ध के लिए खुद को समर्पित करता है।
अमित साध सीरीज में मेजर दीप सिंह की भूमिका निभा रहे हैं। बचपन से हम इस हकीकत को सुनते देखते आए हैं, जहां गणतंत्र दिवस के मौके पर सैनिकों की वर्दी पर देशभक्ति के चार चांद से सजा मेडल चमकता है, लेकिन इसी वीरता भरे मेडल के पीछे जिस्म पर लगे निशान उनके जीवन की वो कहानी भी बयान करता है ,जिसे हम अक्सर देख नहीं पाते हैं। जीत की जिद्द इसी सच्चाई से रूबरू कराती है।
आकाश चावला और अरुणाभ जॅाय सेन गुप्ता की कहानी को पटकथा लेखक सिद्धार्थ मिश्रा ने 7 एपिसोड की इस सीरीज में बखूबी दिखाने की कोशिश की। मेजर दीप सिंह के बचपन के दर्द से लेकर अपाहिज होने के असहनीय सच को स्क्रीनप्ले में सटीक बैठाया है। हर एपिसोड के 30 मिनट में मेजर दिप सिंह के बीते हुए कल और वर्तमान को एक साथ मजबूती से बांध कर रखा है।
हालांकि शुरू के तीन एपिसोड में स्क्रीनप्ले में वर्तमान और अतीत का सफर कई बार कहानी को पटरी से नीचे उतार देता है। 1987 से 2010 के बीच की मेजर दीप सिंह के जीवन के प्रमुख घटनाओं को दिखाने की कोशिश जरा सी धुधंली पड़ जाती है। बचपन में बड़े भाई को खोने का गम दीप सिंह को जिद्दी बना देता है। कुछ कर गुजरने की जिद दीप सिंह को सैनिक बनाती है।
सैनिक बनने के हर पड़ाव पर ऐसे कई मौके आते हैं जो दीप सिंह के हिम्मत पर कई बार गहरा वार करते हैं। जब वो सैनिक बन जाता है तब कारगिल की लड़ाई के बाद बंदूक के बजाए उसके हाथ में बैसाखी आ जाती है। बस, यही से कहानी पिछली सभी धूल को साफ कर पकड़कर रखती है। कैसे अपाहिज होने का अहसास मेजर को कचोटने लगता है, निराशा में कैसे उसकी पत्नी और उसके ट्रेनर कर्नल रंजीत चौधरी रोशनी की किरण बनते हैं यही है जीत की जिद की कहानी का मुख्य बिंदू।
ये कहने में कोई गुरेज नहीं है कि मेजर दीप सिंह की भूमिका में अमित साध सौ प्रतिशत खरे उतरे हैं। दीप सिंह के किरदार के हर लेयर को हर फ्रेम में अमित साध ने जिंदा रखा है। मेजर दीप सिंह को अमित साध ने जिया है। सैनिक के कड़ी ट्रेनिंग से लेकर मजबूत पति -पिता और अपाहिज के मन के अंतर्द्वंद को जिस सहजता से अमित साध ने निभाया है उसे सलामी है। सैनिक की प्रेमिका से पत्नी- मां और बहू की भूमिका में अमृता पूरी न्याय करती हैं।
कर्नल रंजीत चौधरी के किरदार में सुशांत सिंह कहानी में एक्शन और तीखा पन का ऐसा स्वाद ले आते हैं जो मेजर दीप सिंह की कहानी को और मजबूत बनाता है। अली गोनी भी दोस्त की भूमिका में कम स्पेस में जब भी स्क्रीन पर आते हैं तो ताजगी भर देते हैं। कुल मिलाकर सीरीज में कम कलाकारों के साथ एक फ्रेश सच्ची कहानी को दिखाने का प्रयास सफल होता नजर आता है। विशाल मैंगलोरकर ने डायरेक्शन में केवल 7 एपिसोड में जिस तरह ट्रेनिंग और युद्ध सीन को फिल्माया है वो काबिलेतारीफ है।
देखने की वजह- कहानी को बेवजह खींचने की कवायद नहीं की गई है। 7 एपिसोड में मखन की तरह एक सैनिक के निजी संघर्ष को माला की तरह पिरोया गया है। अमित साध के साथ सभी कलाकारों ने ईमानदार अदायगी इस सच्ची घटना को दी है। मेजर दीप सिंह की कहानी ये बताती है कि एक सैनिक का युद्ध सीमा के बाद भी कई बार जारी रहता है। फिल्मीबीट की तरफ से इसे 3 स्टार।


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