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    'थप्पड़' फिल्म रिव्यू: तापसी पन्नू की ये फिल्म पुरुषवादी सोच पर करारा तमाचा है

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    Rating:
    4.0/5

    निर्देशक- अनुभव सिन्हा

    कलाकार- तापसी पन्नू, पावेल गुलाटी, कुमुद मिश्रा, रत्ना पाठक शाह, दिया मिर्जा, तन्वी आज़मी, माया सराओ

    बेटी के निर्णय से परेशान अमृता (तापसी) की मां (रत्ना पाठक शाह) अपने पति (कुमुद मिश्रा) से कहती है, ''परिवार के लिए औरतों को अपनी इच्छा का त्याग करना पड़ता है। यह मेरी मां ने मुझे सिखाया था, उन्हें उनकी मां ने.. और शायद उन्हें उनकी मां ने सिखाया होगा।'' इस संवाद से एक मां के साथ साथ एक महिला का अंतर्द्वंद्व भी साफ दिखता है। यह अंतर्द्वंद्व उस समाज की वजह से है, जो हर लड़की को सभ्यता, संस्कार, मर्यादा और सुदंरता का पाठ पठाते हैं। जहां अमृता (तापसी पन्नू) की तरह आदर्श बहू सुबह होते ही चाय बनाती है, पति को उठाती है, मनपसंद नाश्ता खिलाती है, सास का ब्लड- सुगर लेवल भी जांच लेती है और पति को कार तक छोड़ कर आती है.. हर दिन, मुस्कुराहट के साथ।

    अपने सारे ख्वाबों को पीछे छोड़ चुकीं अमृता की अब सिर्फ दो ही ख्वाहिश है- इज्जत और प्यार। लेकिन जब उससे यह भी छिन जाता है, तो वह सवाल उठाती है और एक कठोर कदम लेती है। ऐसा कदम को इस पितृसत्ता समाज पर जोरदार तमाचा है।

    फिल्म की कहानी

    फिल्म की कहानी

    अमृता और विक्रम (पावेल गुलाटी) शादीशुदा कपल हैं और परिवार के बीच अपनी अपर-मिडिल-क्लास ज़िंदगी जी रहे हैं। जहां विक्रम करियर में आगे बढ़ने के सपने देख रहा है और काम में व्यस्त है। वहीं अमृता एक परफेक्ट पत्नी, बहू, बेटी और बहन है। वह क्लासिकल डांसर है और उसके पिता की मानें तो वह इसमें अपना करियर भी बना सकती थी। लेकिन गृहस्थी के लिए वह अपने सपनों को पीछे छोड़ देती है। वह पति की खुशी में ही खुशी ढूंढ़ लेती है.. कि तभी 'थप्पड़' पड़ता है। घर की पार्टी में तमाम मेहमानों के सामने पति के हाथों से एक जोरदार थप्पड़। इस घटना के साथ अमृता ठिठक जाती है। पति, सास, मां, भाई.. सभी सलाह देते हैं कि इस घटना को भूलकर उसे आगे बढ़ना चाहिए, move on करना चाहिए। लेकिन अमृता ऐसा नहीं करती है। वो इस घटना को भूलने से इंकार करती है। पिता हर कदम पर उसके साथ हैं। बेटी के गाल पर पड़े थप्पड़ से वो व्यथित हैं और क्रोधित भी। वह किसी भी प्रकार के घरेलू हिंसा के खिलाफ हैं, भले ही वह एक थप्पड़ क्यों ना हो। दामाद आकर उनसे कहता है- हो गई गलती.. अब मैं क्या करूं? आगे से कभी नहीं होगी। तो पिता कहते हैं- सवाल यह ज्यादा जरूरी है कि ऐसा हुआ क्यों?

    कहानी सिर्फ अमृता की नहीं है। बल्कि अमृता से जुड़ी पांच और औरतों की भी है। तलाकशुदा पड़ोसी (दिया मिर्जा), सास (तन्वी आज़्मी), मां (रत्ना पाठक शाह), वकील नेत्रा जयसिंह (माया सराओ) और अमृता के घर की कामवाली बाई.. ये सभी किरदार कहानी में साथ साथ चलते जाते हैं.. एक अंतर्विरोध के साथ। सभी समाज की पुरुषवादी सोच से घिरी हुई हैं। लेकिन अमृता की लड़ाई इन्हें भी इस सोच से उबरने का मौका और हिम्मत देती है।

    अभिनय

    अभिनय

    अमृता के किरदार में तापसी पन्नू का काम शानदार है। वह संवेदनशील होने के साथ साथ दृढ़ भी दिखती हैं। हर रिश्ते के साथ तापसी का अलग अलग भाव पर्दे पर प्रभावी लगा है। खासकर पिता बने कुमुद मिश्रा के साथ तापसी के दृश्य दिल को छूते हैं। दोनों के बीच निर्देशक के कई खूबसूरत पल बुने हैं। वहीं, बतौर पति- पत्नी कुमुद मिश्रा और रत्ना पाठक शाह की जोड़ी भी खूब जंची है। अमृता के पति विक्रम के रोल में पावेल गुलाटी ने आकर्षित किया है। निर्देशक अनुभव सिन्हा ने उन्हें कई शेड दिये हैं और पावेल ने पूरी तरह से न्याय किया है। एक दृश्य है, जहां विक्रम अपनी पड़ोसी (दिया मिर्जा) की कार देखकर शक्की अंदाज़ में अमृता से कहता है- ''इसने फिर से नई गाड़ी ली है.. ये ऐसा क्या करती है?'' तो अमृता सपाट जवाब देती है- "मेहनत".. बतौर सह कलाकार दिया मिर्जा, मानव कौल, तन्वी आज़्मी, माया सराओ ने बेहतरीन काम किया है।

    निर्देशन

    निर्देशन

    मुल्क, आर्टिकल 15 के बाद अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित थप्पड़ ने एक बार फिर समाज की सोच पर प्रहार किया है। इस बार फिल्म ने सवाल भी खड़ा किया और जवाब भी दिया है.. थप्पड़, सिर्फ इतनी सी बात नहीं है। पुरुषवादी सोच में दबी महिलाओं की इच्छाएं कब हवा हो जाती हैं, इसका अहसास उन्हें खुद भी नहीं होता। लेकिन क्यों नहीं होता? फिल्म इसका जवाब भी देती है। अनुभव सिन्हा ने हर किरदार और हर रिश्ते को इतने सलीके और प्रभावी ढ़ंग से बुना है कि आप हर किसी की कहानी से जुड़ा महसूस करेंगे। बेटी के लिए पिता का दुलार हो या समाज के मापदंडों में फंसी मां की चिंता.. हर किरदार की रूपरेखा कहानी को मजबूत बनाती गई है। खासकर संवादों का खूब ध्यान रखा गया है। जैसे चिंतिंत मां का कहना- "औरतों को मन मारना पड़ता है.. थोड़ा बर्दाश्त करना सीखना चाहिए।" या पति से रोज मार खाने वाली नौकरानी का दिन पति से सवाल करना- "क्यों मारते हो मुझे?" और पति का जवाब- "तुम्हें मारने के लिए लाइसेंस चाहिए क्या मुझे"..

    तकनीकि पक्ष

    तकनीकि पक्ष

    6 बिल्कुल अलग महिला किरदारों के जरीए अनुभव सिन्हा और मृणमयी लागू ने अपने लेखन से पुरुषसत्तात्मक समाज में रह रही महिलाओं की अलग अलग परिस्थिति दिखाई है। फिल्म की पटकथा कसी हुई है और काफी केंद्रित है। फिल्म मुद्दे से भटकती नहीं है। यशा रामचंदानी की एडिटिंग थोड़ी और चुस्त हो सकती थी, खासकर सेकेंड हॉफ में। खैर, वह ज्यादा नहीं अखरती। शौमिक मुखर्जी की सिनेमेटोग्राफी अच्छी रही है।

    संगीत

    संगीत

    फिल्म में एक ही गाना है- एक टुकड़ा धूप, जिसे लिखा है शकील अज़मी ने और संगीत दिया है अनुराग साइकिया ने। फिल्म की कहानी के साथ साथ चलता यह गाना दिल- दिमाग को छूता हुआ जाता है। यह गाना मूड सेट करने में भी मददगार साबित होता है। इसके लिरिक्स शानदार हैं। मंगेश ढ़ाकरे द्वारा दिया गया बैकग्राउंड स्कोर प्रभावशाली है।

     देंखे या ना देंखे

    देंखे या ना देंखे

    हमारे समाज में आज भी पुरूषवादी मानसिकता हावी है और इस पर सवाल करने की जगह, कहीं ना कहीं इसे प्रकृति का हिस्सा मान कर लोग चले जा रहे हैं। अनुभव सिन्हा के निर्देशन में बनी फिल्म 'थप्पड़' समाज के इसी पुरूषवादी मानसिकता पर प्रहार करती है। गुस्से में या हिंसा के साथ नहीं, बल्कि तर्क और भावनाओं के साथ। ये फिल्म पति, पत्नी, पिता, मां, भाई, बहन, प्रेमी, प्रेमिका.. हर किसी को देखनी चाहिए और इस पर विचार करना चाहिए। फिल्मीबीट की ओर से फिल्म को 4 स्टार।

    English summary
    Taapsee Pannu starrer film Thappad shows how patriarchy is handed down from one generation to another. Film directed by Anubhav Sinha.
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