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    'शकुंतला देवी' फिल्म रिव्यू- गणित की जीनियस बनीं विद्या बालन दिल जीत लेंगी

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    Rating:
    3.5/5

    निर्देशक- अनु मेनन

    कलाकार- विद्या बालन, जीशु सेनगुप्ता, सान्या मल्होत्रा, अमित साध

    प्लेटफॉर्म- अमेज़न प्राइम वीडियो

    'एक लड़की जो अपने दिल की सुनती है और खुल के हंसती है, मर्दों के लिए इससे ज्यादा डरावना और कुछ नहीं होता है'.. महान गणितज्ञ शकुंतला देवी में ये दोनों ही बातें थीं। समाज के बने बनाए कुछ परपंरागत जंजीरों को तोड़कर निकलीं शकुंतला देवी ने ना सिर्फ भारत में, बल्कि विश्व भर में नाम कमाया है। फिल्म में शकुंतला देवी का किरदार निभातीं विद्या बालन एक दृश्य में कहती हैं, 'जब मैं स्टेज पर होती हूं, मुझे लोगों के चेहरे देखना अच्छा लगता है, जब वो हैरानी से चोटी और साड़ी पहनी औरत को मैथ्स सॉल्व करते देखते हैं।'

    गणित के साथ उनका रिश्ता और उससे पाई गईं उपलब्धियों के अलावा फिल्म में उनकी पारिवारिक जिंदगी और मुद्दों को भी शामिल किया गया है। खासकर एक बेटी, एक मां और एक औरत का सफर।

    फिल्म की कहानी

    फिल्म की कहानी

    साल 1934 से 2000 तक के सफर में शकुंतला देवी का बचपन, जवानी, वृद्धा अवस्था तक शामिल किया गया है। उनके सफर की शुरुआत महज पांच साल में ही हो गई थी, जब वो गणित के बड़े से बड़े सवाल भी मुंह जुबानी हल कर दिया करती थीं। वह स्कूल जाना चाहती थीं, लेकिन बेरोजगार पिता शकुंतला की प्रतिभा के शोज कराने लगे। परिवार को पैसा मिलने लगा और शकुंतला देवी को पूरे शहर में ख्याति.. फिर देश में और फिर देखते ही देखते विश्व भर में। शकुंतला देवी के निर्भीक स्वभाव और आजाद ख्याल ने उन्हें परिवार से दूर कर दिया। खासकर मां के प्रति एक गुस्सा था क्योंकि उन्होंने पिता के गलत तौर तरीकों को सहते जिंदगी गुजार दी।

    इधर अंकों के साथ शकुंतला देवी का रिश्ता हर दिन गहराता चला गया। कंप्यूटर से भी तेज गणित के सवालों को हल करने वाली इंसान के तौर पर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में उनका नाम अंकित हुआ। जिसके बाद दुनिया उन्हें 'ह्यूमन कंप्यूटर' के नाम से जानने लगी। लेकिन जितनी आसानी से वो गणित के सवाल हल कर लेती थीं, उनकी व्यक्तिगत जीवन उतनी ही जटिल रही। उन्हें 'नॉर्मल' रहना समझ नहीं आया। उनका मानना था कि इंसान और पंड़ों में यही फर्क है कि इंसान एक जगह टिक कर नहीं रह सकता, जबकि पेड़ जड़ों से जकड़े होते हैं। इस थ्योरी की वजह से व्यक्तिगत जीवन में अपनी बेटी से वह प्यार, सम्मान ना पाना उन्हें खलता रहा। उनके भीतर लगातार द्वंद चलता रहता है- सिद्धांतों, कर्तव्य और आकांक्षाओं के बीच। जिससे वह किस तरह उबरती हैं, यह फिल्म में दिखाया गया है।

    अभिनय

    अभिनय

    शकुंतला देवी के किरदार में विद्या बालन रच बस गई हैं। उन्होंने किरदार को शुरुआत से अंत तक इतना कसकर पकड़ा है कि आपकी नजरों के साथ साथ वह सोच को भी बांधे रखती हैं। एक क्षण में गुस्सा, दूसरे ही क्षण में हंसी.. विद्या के हाव भाव बतौर दर्शक रोमांचित करते हैं। जवानी से लेकर प्रौढ़ावस्था तक, उन्होंने हर उम्र को सहजता से पेश किया है। शकुंतला देवी के पति के किरदार में जीशु सेनगुप्ता अपनी सादगी और सहजता से दिल जीत लेते हैं। वहीं, बेटी के किरदार में सान्या मल्होत्रा जंची हैं। बेटी के मन में चल रही भावनाएं, प्यार, गुस्सा, आवेग.. हर भाव को सान्या ने बखूबी दिखाया है। अमित साध और सान्या की जोड़ी बढ़िया लगी है। अमित साध छोटे से किरदार में भी अपनी बेहतरीन अदाकारी से ध्यान खींचते हैं।

    निर्देशन व तकनीकि पक्ष

    निर्देशन व तकनीकि पक्ष

    बॉयोपिक बनाना आसान नहीं है। लेकिन निर्देशक अनु मेनन शकुंतला देवी के जीवन को स्क्रीन पर सटीक तरीके से दिखाने में सफल रही हैं। हालांकि कहीं कहीं पर कहानी भागती सी लगती है, शायद उनकी सारी उपल्बधियों को समेटने की कोशिश में यह किया गया है। राजनीति और ज्योतिष शास्त्र की तरफ उनके झुकाव को थोड़ा और सम्मिलित किया जा सकता था, क्योंकि उस भाग को लेकर कुछ सवाल रह जाते हैं। फिल्म की कहानी अतीत और वर्तमान के बीच घूमती रहती है। लेकिन आपको कंफ्यूज नहीं करती। शकुंतला का अपनी मां और फिर अपनी बेटी के साथ रिश्ता भावनात्मक उधेड़बुन लाता है। कहानी कई परतों में कही गई है, और हर परत अपने साथ नई भावनाओं का पूल लाती है।

    अंतरा लाहिरी की एडिटिंग कुछ हिस्सों में फिल्म को प्रभावी बनाती है। वहीं, इशिता मोईत्रा ने संवाद लिखे हैं, जो कि जबरदस्त हैं। एक दृश्य में शंकुतला देवी अपनी नाराज बेटी से कहती हैं, 'मैंने अपनीं मां को शायद हमेशा मां के रूप में ही देखा, एक महिला के तौर पर समझने की कोशिश नहीं की।' फिल्म रोचक संवादों से भरपूर है।

    संगीत

    संगीत

    फिल्म का संगीत सचिन- जिगर ने दिया है, जो कि कहानी के साथ बेहतरीन आगे बढ़ती जाती है। लिरिक्स लिखे हैं वायु और प्रिया सरैया ने। फिल्म में कुल 4 गाने हैं। गानों में एक उत्साह है। लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद वह प्रभावी नहीं रह पाते।

    क्या अच्छा, क्या बुरा

    क्या अच्छा, क्या बुरा

    फिल्म देखते देखते एक समय ऐसा आता है, जब आप भूल जाते हैं कि आप एक बॉयोपिक देख रहे हैं। बल्कि आपको फिल्म में दिलचस्पी विद्या बालन और उनके दमदार अभिनय की वजह से रहती है। लिहाजा, अभिनय कहानी से ऊपर का स्थान ले लेता है। खासकर एक विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ की बॉयोपिक को इससे बचाया जा सकता था।

    देंखे या ना देंखे

    देंखे या ना देंखे

    शकुंतला देवी का यह दिलचस्प सफर प्रेरणा योग्य है। विश्व में ऐसी विलक्षण प्रतिभा देखने को काफी कम ही मिली है। प्रतिभा से अलग उनकी आकांक्षा और निर्भीक स्वभाव काफी कुछ सिखाता है।

    वहीं, विद्या बालन के बेजोड़ अभिनय के लिए फिल्म 'शकुंतला देवी' जरूर ही देखी जानी चाहिए। कहना गलत नहीं होगा कि विद्या अपनी हर फिल्म के साथ अभिनय का एक नया मापदंड सेट करती हैं।

    English summary
    Vidya Balan starring Shakuntala Devi is high on emotions and performance, brilliantly portrayed the life journey of Human Computer. Film directed by Anu Menon.
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