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REVIEW: 'ट्यूबलाइट'.. बिखरी कहानी के बीच जगमगाते सलमान खान

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2.0/5

स्टारकास्ट- सलमान खान, सोहेल खान, स्व. ओम पुरी, झू झू, मोहम्मद ज़ीशान अयूब, मातिन रे तांगू, शाहरूख खान (कैमियो)

अवधि- 2 घंटा 16 मिनट

निर्देशक- कबीर खान

निर्माता- सलमान खान

लेखक- कबीर खान

अच्छी बातें- सलमान खान का कभी ना देखा गया अवतार, कुछ एक इमोशनल सीन्स, फिल्म के लोकेशन, शाहरूख खान कैमियो

बुरी बातें- फिल्म की पटकथा काफी बिखरी सी है, कई भावुक सीन हैं जो आपके दिल तक पहुंच नहीं पाएंगे, फिल्म का क्लाईमैक्स

प्लॉट –

प्लॉट –

महात्मा गांधी के आदर्शों (सत्य और अहिंसा) से भरपूर यह कहानी है ट्यूबलाइट की। नहीं, ट्यूबलाइट नहीं.. इनका नाम है लक्ष्मण सिंह बिष्ट (सलमान खान), जो कि कुमाऊं के छोटे से शहर जगतपुर में रहते हैं। लोग इन्हें चिढ़ाने के लिए ट्यूबलाइट कहकर बुलाते हैं क्योंकि लक्ष्मण को बातें थोड़ी देर से समझ में आती है। लेकिन लक्ष्मण का हर पल साथ देने के लिए है उसका छोटा भाई भरत सिंह बिष्ट (सोहेल खान)। इनके मां- पिता की बचपन में भी मृत्यु हो चुकी है। लिहाजा, ये एक दूसरे के लिए पूरी दुनिया हैं।

इस बीच दिखाया गया है कि लक्ष्मण के स्कूल में एक दिन महात्मा गांधी आते हैं, जहां लक्ष्मण उनके आदर्शों से काफी प्रभावित होता है.. और यहां से शुरु हो होता है सिलसिला यकीन का..

यदि इंसान के दिल में यकीन हो, तो वह चट्टान भी हिला सकता है..

दिन, मौसम गुजरते हैं और साल है 1962। भारत- चीन में युद्ध छिड़ी है और अब आता है कहानी में मोड़। लक्ष्मण के भाई भरत को फौज में रख लिया जाता है और उसे भारत- चीन युद्ध में सरहद पर भेज दिया जाता है। सरहद पर गए भरत को काफी समय हो जाता है और इधर लक्ष्मण को यकीन है कि उसका भाई जंग से जरूर वापस आएगा। इस यकीन में लक्ष्मण का समय समय पर साथ देते हैं बन्ने खान चाचा (ओम पुरी), जादूगर शाशा (शाहरूख खान) और शी लिंग (झू झू)।
लेकिन क्या लक्ष्मण का यकीन सही साबित होता है? क्या भरत जंग के मैदान से वापस आ पाता है.. यही है पूरी फिल्म की कहानी।

निर्देशन-

निर्देशन-

कबीर खान ने बॉलीवुड को न्यूयॉर्क और बजरंगी भाईजान जैसी फिल्में दी है। ऐसे में ट्यूबलाइट उनकी बेस्ट फिल्म नहीं कही जा सकती है। लचर पटकथा के साथ फिल्म का फर्स्ट हॉफ काफी ऐवरेज है, लेकिन समय समय पर आपको भावुक करता है। जबकि सेंकेड हॉफ में आपको कुछ एक सीन में बोर भी कर सकता है। कई इमोशनल सीन होने के बावजूद आप किरदारों से जुड़ता महसूस नहीं करेंगे। युद्ध के सीन्स बेहतरीन फिल्माए गए हैं। कुछ किरदारों को काफी ढूंसा सा महसूस होता है।
फिल्म के कुछ शुरूआती संवाद काफी प्रभावित करने वाले हैं। लेकिन जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है आप दोहराव महसूस करेंगे। हर अगले डॉयलोग में ‘यकीन' शब्द का प्रयोग उबा देने वाला है।

अदाकारी-

अदाकारी-

ट्यूबलाइट अका लक्ष्मण सिंह बिष्ट के किरदार में सलमान खान की मेहनत पर्दे पर साफ झलकती है। कहीं कहीं अपनी अदाकारी से सलमान प्रभावित करने में सफल रहे हैं। बन्ने चाचा के किरदार में ओमपुरी बेहतरीन हैं। सोहेल खान, मोहम्मद ज़ीशान अयूब ने अपने अपने किरदारों में सच्चाई दिखाई है। सलमान- मातिन की जोड़ी काफी प्यारी लगी है.. लेकिन झूझू के किरदार को अदाकारी दिखाने का ज्यादा मौका ही नहीं दिया गया।

तकनीकि पक्ष-

तकनीकि पक्ष-

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है। हालांकि ओपनिंग शॉट आपको बजरंगी भाईजान की याद दिला सकती है। हर फिल्म की तरह कबीर खान ने फिल्म के लोकेशंस को काफी देख परख पर चुना है। जो कि पर्दे पर कमाल दिख रहे हैं। स्क्रीनप्ले काफी बिखरी सी है, जो कि आपको किरदार से जुड़ने का मौका ही नहीं देती।

संगीत-

संगीत-

फिल्म का संगीत दिया है प्रीतम ने। रेडियो और तिनका तिनका गाना फिल्म रिलीज से पहले ही लोगों के जुबां पर चढ़ चुका है। लिहाजा, फिल्म में भी आप इन्हीं दो गानों पर ध्यान दे पाएंगे। लेकिन फिल्म की कहानी इतनी कमज़ोर है कि संगीत भी प्रभावी नहीं लगता।

देंखे या ना देंखे-

देंखे या ना देंखे-

यदि आप सलमान खान फैन हैं तो फिल्म जरूर देंखे (must watch) क्योंकि सलमान का यह नया अवतार काफी हैरान करने वाला है। यदि आप सलमान फैन नहीं है.. तो भी एक बार सिनेमाघर की ओर रूख करना ज्यादा अफसोसजनक नहीं होगा।

English summary
Read the review of Salman Khan's Tubelight here. Directed by Kabir Khan.
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