समीक्षा: राजधानी एक्सप्रेस नहीं पैंसेजर हैं

फिल्म: राजधानी एक्सप्रेस
कलाकार: लिएंडर पेस, प्रियांशु चटर्जी, सुंधाशु पांडे, पूजा बोस, जिम्मी शेरगिल, गुलशन ग्रोवर, मुकेश ऋषि
निर्देशक: अशोक कोहली

समीक्षा: कहते है ना अभिनय हर किसी के बस की बात नहीं है। यही हुआ है टेनिस खिलाड़ी लिंएडर पेस के साथ । विज्ञापनों की बात औऱ है, वहां बात कुछ सेकंड की होती है लेकिन फिल्म तो तीन घंटे की बात है और उसमें लिएंडर पेस बुरी तरह से फेल हो गये है। निर्देशक अशोक कोहली अपनी फिल्म राजधानी एक्सप्रेस में दिखाना क्या चाहते हैं, यह शायद उन्हें भी नहीं पता।

पुरानी टेलीफिल्म की तरह राजधानी एक्सप्रेस भी पैसेंजर ही साबित हुई है जिसमें ना तो पेस, ना ही प्रियांशु चैटर्जी और ना ही जिमी शेरगिल ने कोई कमाल किया है। फिल्म पूरी तरह से बकवास है क्योंकि कहानी नाम का कोई शब्द फिल्म में नहीं दिखता है। पेस तो फिर भी नौसिखिया थे लेकिन प्रियांशु और जिमी को क्या हो गया है यह समझ के परे हैं।

Rajdhani Express
अभिनेत्री पूजा बोस का ना तो ढंग से संवाद बोलना आता है औऱ ना ही एक्सपोज। अभी उन्हें बेहद मेहनत की जरूरत हैं। फिल्म की कहानी पूरी तरह से भटकी हुई है। संगीत भी बेकार ही है।कुल मिलाकर कहा जाये तो राजधानी एक्सप्रेस,एक्सप्रेस नहीं पैंसेजर हैं। जिसमें कोई मुफ्त में भी नहीं बैठना चाहेगा।

कहानी: फिल्म की कहानी शुरू होती है ट्रेन के फर्स्ट क्लास कोच से। जिसमें तीन यात्रियों की मुलाकात एक आयटम गर्ल से होती है।इन तीन यात्रियों में एक फैशन डिजाइनर हैं, एक लेखक है और एक क्रिमिनल है। जबकि आयटम गर्ल एक मंझी हुई चालाक महिला है जो कि यात्रा के दौरान ही गुंडे को पटा लेती है। इसी रोचक यात्रा को फिल्म में दिखाया गया है जो कि पूरी तरह से बोरिंग हो गया है।

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