Paltan Movie Review: पलटन के जरिए असली वॉर हीरोज के साथ नाइंसाफी कर बैठे जेपी दत्ता
जेपी दत्ता बॉलीवुड में वॉर मूवीज का पर्याय के तौर पर जाने जाते हैं। उन्होंने बॉर्डर और LOC: कार्गिल जैसी फिल्मों से ये साबित भी किया है। हालांकि हाल ही में आई में रिलीज हुई फिल्म पटलन को देखकर ऐसा मालूम होता है कि जेपी दत्ता का वो मैजिक खो चुका है। ये फिल्म काफी थकी हुई नजर आती है। ये वाकई जेपी दत्ता के फैंस के लिए निराशाजनक है। सच्ची घटनाओं पर आधारित जेपी दत्ता की पटलन 1967 में भारत-चीन के बीच हुए नाथू ला मिलिट्री क्लैश पर बनी है।
पलटन की शुरूआत होती है 1962 से होती है जहां चीनी सैनिकों ने भारतीय जवानों पर अरुणाचल प्रदेश स्थित नमका चू लेक पर हमला किया था। इस हमले में 1383 जानें चली गई थीं। इसके बाद सीन 1967 में शिफ्ट होता है जहां ऑडिएंस को रूबरू करवाया जाता है सिक्किम के नाथू ला बॉर्डर पर चल रहे भारत-चीन के तनाव से। फिल्म भारतीय जवानों की कहानी दिखाती है कि कैसे उन्होंने चीनी लोगों के खिलाफ ये संगीन लड़ाई लड़ी। इसी बीच ऑडिएंस को उन भारतीय जवानों की निजी जिंदगी के बारे में फ्लैशबैक भी दिखाए जाते हैं।

जहां एक तरफ इतिहास की सबसे खतरनाक और रोमांचक घटना को दोहराए जाने का आइडिया पेपर पर काफी अच्छा लगता है वहीं दूसरी तरफ जेपी दत्त इस कहानी को अपने तरीके से कहने में बुरी तरह असफल हो जाते हैं। फिल्म का नैरेशन काफी खोखला लगता है। आपको लगता है कि फिल्म में कुछ रोमांचक होने के लिए आप सदियों से इंतजार में बैठे हैं।
फिल्म का स्क्रीनप्ले काफी ढ़ीला है और फिल्म में 'the more you sweat in peace, the less you bleed in war' जैसी लाइनें असर विहीन लगती हैं।


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