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    'कामयाब' फिल्म रिव्यू - 'कैरेक्टर एक्टर' की ईमानदार कहानी, अब तो मत पूछिए कौन संजय मिश्रा?

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    Rating:
    3.0/5

    निर्देशक- हार्दिक मेहता

    कलाकार- संजय मिश्रा, दीपक डोबरियाल, ईशा तलवार

    हीरो के दोस्त हों या विलेन का साथी, डॉक्टर, पुलिस इंस्पेकटर, मां, पिता, भाई, पड़ोसी आदि.. फिल्मों में कितने ही ऐसे किरदार होते हैं जिन्हें सराहना तो मिल जाती है, लेकिन उनके नाम को पहचान नहीं मिलती। ये वो कलाकार हैं, जिन्हें देखकर हर बार आप और हम कहते हैं कि ये गजब का अभिनय करता है, नाम क्या है इनका? ये अलग अलग किरदारों से सालों साल दर्शकों का मनोरंजन करते जाते हैं, लेकिन हीरो की एक झलक, एक सेकेंड में उन पर हावी हो जाती है। हार्दिक मेहता ने इन्हीं कलाकारों की कहानी पर बनाई है 'कामयाब', जो इन कलाकारों की ज़िंदगी को काफी पास से दिखाती जाती है। फिल्म में सिर्फ दर्शकों की ही नहीं, बल्कि इंडस्ट्री के दृष्टिकोण पर भी काफी फोकस किया गया है।

    फिल्म की कहानी

    फिल्म की कहानी

    एक समय में बैक टू बैक फिल्मों में काम कर चुके चरित्र अभिनेता सुधीर मुंबई में एक पुराने से फ्लैट में रहते हैं.. अकेले। एक बॉलीवुड पत्रकार उनका इंटरव्यू लेने आई है। लेकिन उसके सवाल सुधीर को ऊबा रहे हैं। ना उन्हें अपने पुराने निभाए किरदारों में दिलचस्पी है, ना ही पत्रकार के सवालों में। एक जवाब में वह कहते हैं- 'चरित्र अभिनेताओं को आलू कहा जाता है, उसे बच्चन, कपूर, कुमार किसी के साथ भी मिला सकते हैं.. दर्शकों के दिलों में सिर्फ हीरो बसते हैं, साइड हीरो नहीं।' लेकिन अभिनेता की दिलचस्पी अचानक तब करवट लेती है, जब पत्रकार उन्हें अहसास दिलाती है कि अभिनेता ने अब तक 499 फिल्मों में काम किया है। जो कि अपने आप में एक काफी बड़ा आंकड़ा है। खैर, इंटरव्यू तो सफल नहीं होता, लेकिन सुधीर के दिमाग में 499 को 500 में बदलने की धुन सवार हो जाती है। वह शेविंग कर, विग लगाकर पूरे आत्म विश्वास के लिए दोबारा फिल्मों की दुनिया में लौटने को उत्साहित है। इस सफर में उनका साथ देते हैं साइड एक्टर से कास्टिंग डाइरेक्टर बने गुलाटी (दीपक डोबरियाल)। लेकिन अपनी 500वीं फिल्म को लेकर उत्साहित सुधीर का सफर कितना आसान या मुश्किल रहता है, इसी के इर्द गिर्द फिल्म की पूरी कहानी घूमती है।

    अभिनय

    अभिनय

    499 फिल्में कर चुके 'चरित्र अभिनेता' सुधीर के किरदार में संजय मिश्रा ने शानदार अभिनय किया है। संवेदनशीलता, आत्म विश्वास, जिद, हार, जुनून, प्यार सभी भाव उनके चेहरे पर साफ झलकते हैं। अपनी स्वर्गीय पत्नी की याद में पुराने टेप रिकॉर्डर पर गाने सुनना हो या पड़ोस की aspiring एक्ट्रेस के साथ उनका दोस्त वाला रिश्ता। इन भावनाओं को कहानी में बेहतरीन पिरोया गया है। वहीं, एक्टर से कास्टिंग डाइरेक्टर बने गुलाटी के किरदार में दीपक डोबरियाल ने पूरी तरह न्याय किया है। बतौर सह कलाकार ईशा तलवार, अवतार गिर, लिलिपुस ने अच्छा काम किया है।

    निर्देशन

    निर्देशन

    हार्दिक मेहता ने इस फिल्म की कहानी बहुत ही सच्चाई से लिखी है और उतनी ही सच्चाई से इसका निर्देशन किया है। उन्होंने फिल्म के लिए एक ऐसे विषय को चुना, जिस पर कहानी बुनना आसान नहीं रहा होगा। इसके लिए निर्देशक की तारीफ बनती है। चरित्र अभिनेताओं की यह कहानी संवेदनाओं से भरी हुई है। निर्देशक ने लिलिपुट, विजू खोटे, अवतार गिल जैसे कई नए- पुराने 'साइड एक्टर्स' को फिल्म में शामिल कर इसे वास्तविकता से करीब रखा है। हालांकि फिल्म को थोड़ा और बांधा जा सकता था। फिल्म का सेकेंड हॉफ धीमा है, जिस वजह से आप धीरे धीरे कहानी से जुड़ाव खोने लगते हैं और क्लाईमैक्स का इंतज़ार करते हैं।

    तकनीकि पक्ष

    तकनीकि पक्ष

    फिल्म की कहानी और संवाद भी हार्दिक मेहता ने ही लिखे हैं, जिसमें उनका साथ दिया है राधिका आनंद ने। फिल्म के संवाद काफी दिलचस्प और दमदार है। एक दृश्य में सुधीर (संजय मिश्रा) एक पत्रकार से कहते हैं- 'कैरेक्टर एक्टर को आलू कहा जाता है, वह बच्चन, कपूर, कुमार किसी के साथ भी फिट हो जाता है'.. फिल्म में किरदार कम हैं, लिहाजा, उनके बीच किया जा रहा संवाद काफी मायने रखता है। पियूष पूटी की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है और कहानी को गढ़ने में निर्देशक का पूरा साथ देते हैं। मुंबई की सड़कों से लेकर ऑडिशन रूम तक, फिल्म से एक जुड़ाव महसूस होता है। वहीं, प्रशांत रामचंद्रन की एडिटिंग थोड़ी और चुस्त हो सकती थी। खासकर क्लाईमैक्स को और प्रभावशाली बनाया जा सकता था, जिससे फिल्म का संदेश दर्शकों तक सीधे पहुंच सके।

    संगीत

    संगीत

    फिल्म का संगीत दिया है रचिता अरोड़ा ने। फिल्म में तीन गाने हैं, जो कहानी के साथ साथ ही आगे बढ़ते जाते हैं। लेकिन अफसोस फिल्म का संगीत आपके दिल- दिमाग पर छाप नहीं छोड़ता। फिल्म का संगीत इस कहानी को एक अलग ऊंचाई पर ले जा सकता था, लेकिन यहां निर्देशक चूक गए।

     देंखे या ना देंखे

    देंखे या ना देंखे

    यह एक अलग तरह की फिल्म है। चरित्र अभिनेताओं के काम को तो हमने खूब सराहा है, लेकिन शायद ही किसी के नाम याद रहे हों। हार्दिक मेहता ने 'कामयाब' से उन अभिनेताओं के काम को एक पहचान, एक ऊंचाई देने की कोशिश की गई है। संजय मिश्रा की बेजोड़ अदाकारी के लिए यह फिल्म एक बार जरूर देखी जानी चाहिए।

    English summary
    Sanjay Mishra and Deepak Dobriyal starring film Kaamyaab is a heartfelt ode to the character actors. Film directed by Hardik Mehta.
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