जय गंगाजल रिव्यू: हर गंगाजल में अजय नहीं होते...हर खाकी सिंघम नहीं!
जय गंगाजल, आपको गंगाजल - सिंघम के बीच फंसी एक एंग्री यंग वूमन की कहानी लगेगी। प्रियंका चोपड़ा खाकी अवतार में अच्छी लग रही हैं। फिल्म में उन्हें हीरो की तरह इंट्रोड्यूस नहीं किया गया है। यही आभा माथुर की सबसे बड़ी खासियत है। आभा माथुर, जिले की पहली महिला एसपी है और वो कुर्सी पर बैठने नहीं आई है।
फिल्म के हीरो हैं - प्रकाश झा। जो फिल्म में आपको प्रियंका चोपड़ा से ज़्यादा दिखेंगे और नाना पाटेकर की एक्टिंग और डायलॉग डिलीवरी के साथ दिखेंगे। जय गंगाजल शुरू होती है भ्रष्टाचार से और धीरे धीरे पॉलिटिक्स, किसान, भू माफिया जैसे यूपी बिहार के सारे परेशानी भरे मुद्दे इसमें जुड़ते चले जाते हैं। थोड़ी देर बाद कहानी ऐसी खो जाती है कि अंत तक आप उसे ढूंढने की कोशिश करते हैं पर असफल रहेंगे।

फिल्म में एक नया कॉन्सेप्ट निकाला गया है - मर्डर सुसाइड का। और फिल्म में कुल 8 - 10 लोगों का मर्डर सुसाइड होता है जो शायद वर्तमान कानून व्यवस्था पर चोट करने की विफल कोशिश करता है। हास्यास्पद ये कि कानून भी इसका सहभागी होता है।
फिल्म में प्रियंका चोपड़ा की एंट्री बिल्कुल गंगाजल में अजय देवगन की स्टाइल में होती है। पर इस फिल्म में उस गंगाजल जैसा कुछ नहीं है। कहने का मतलब ये है कि एक बार जब वो सब पवित्तर कर चुके थे तो दोबारा बिना कहानी या प्लॉट के उसी लाइन पर फिल्म बनाने की कोई आवश्यकता नहीं थी।
जानिए फिल्म की पूरी समीक्षा -


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