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    'हसीन दिलरुबा' रिव्यू: प्यार, धोखा और मर्डर का पुराना फॉर्मूला- रोमांच पैदा करने से चूकती है फिल्म

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    Rating:
    2.5/5

    निर्देशक- विनिल मैथ्यू
    कहानी, पटकथा और संवाद- कनिका ढिल्लों
    कलाकार- तापसी पन्नू, विक्रांत मैसी, हर्षवर्धन राणे, आदित्य श्रीवास्तव
    प्लेटफार्म- नेटफ्लिक्स

    "पागलपन की हद से ना गुजरे तो प्यार कैसा, होश में तो रिश्ते निभाए जाते हैं.." फिल्म की पूरी कहानी इस एक संवाद में उलझी है। अपने पति की हत्या में एक संदिग्ध के रूप में जांच के तहत, रानी (तापसी पन्नू) अपनी शादीशुदा जिंदगी का ऐसा खुलासा करती है जो कि सच्चाई को और धुंधला करता जाता है।

    रानी कश्यप (तापसी पन्नू) को साहित्य से लगाव है और वह उपन्यासकार दिनेश पंडित की फैन हैं। कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म में दिनेश पंडित भी एक 'अदृश्य' किरदार की तरह हैं, जिसका प्रभाव रानी और रिशु (विक्रांत मैसी) की जिंदगी पर दिखता है।

    Haseen Dillruba review

    प्यार, पागलपन, जुनून और जिद की यह कहानी काफी दिलचस्प शुरुआत लेती है। लेकिन एक मर्डर- मिस्ट्री कहानी का सबसे अहम पहलू क्या होता है? क्लाईमैक्स.. और 'हसीन दिलरुबा' यहीं निराश करती है। रानी, रिशु और नील (हर्षवर्धन राणे) की त्रिकोणीय प्रेम कहानी के बीच लेखक- निर्देशक ने संवादों के जरीए फेमिनिज़्म जैसे मुद्दों को भी छुआ है, जो कि काफी जबरदस्ती ढूंसा गया लगता है।

    कहानी

    कहानी

    "मैं आउटगोइंग हूं, माडर्न हूं लेकिन फिर भी होमली हूं, बस पकोड़े तलने नहीं आते मुझे.." शादी की दूसरी रात पति से लड़ते हुए रानी कश्यप कहती है। ज्वालापुर के इंजीनियर ऋषभ सक्सेना उर्फ रिशु और दिल्ली की रानी की धूमधाम से अरेंज मैरिज होती है। लेकिन अगले ही दिन दोनों समझ गए कि उन्हें जो "खूबियां" अपने लाइफ पार्टनर में चाहिए थी, वह उन्हें नहीं मिली। फिर भी दोनों रिश्ता मजबूत की कोशिश करते हैं, लेकिन कुछ ना कुछ कमी रह जाती है। ऐसे में एक दिन घर आता है रिशु का मौसेरा भाई नील त्रिपाठी। और फिर बनता है प्रेम त्रिकोण। रानी को एक पार्टनर में जो जुनून चाहिए था, वह उसे नील में मिलता है। लेकिन कुछ अनहोनी घटनाओं के बाद वह रिशु की तरफ आर्कषित हो जाती है। रिश्ते सुलझने ही वाले होते हैं कि.. होता है एक धमाका।

    पुलिस की जांच में पता चलता है कि रिशु की मौत हो चुकी है। पति के हत्या के आरोप में रानी पुलिस के शक में दायरे में सबसे पहले आती है। पूछताछ के दौरान रानी इंस्पेक्टर किशोर रावत (आदित्य श्रीवास्तव) से कहती है- "हर कहानी के बहुत पहलू होते हैं, फर्क बस ये होता है कि कहानी सुना कौन रहा है.."।

    इंस्पेक्टर पूरे जी जान से इस केस पर काम करता है, लेकिन रानी की कहानी उसे उलझाती जाती है। उसे आभास होता है कि यह केस इतना आसान नहीं, जितना दिख रहा है। इस उलझन से उसे कौन और कब बाहर निकालता है, इसी के इर्द गिर्द कहानी बुनी गई है।

    निर्देशन

    निर्देशन

    फिल्म का प्लॉट यानि की कथानक काफी दिलचस्प है, लेकिन निर्देशक विनिल मैथ्यू इस मर्डर- मिस्ट्री को रोमांचक बनाने में चूक गए। शुरुआत से अंत तक फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं, जो कहानी को गति देते हैं, कुछ ट्विस्ट देते हैं, लेकिन यह प्रभावी नहीं लगता। लगभग सवा दो घंटे की यह फिल्म क्लाईमैक्स तक जाते जाते काफी कमजोर होती जाती है। हालांकि फिल्म के तीनों मुख्य किरदारों की रूपरेखा मजबूत है, जो फिल्म को कुछ वक्त के लिए संभालती है।

    अभिनय

    अभिनय

    फिल्म की कहानी नवविवाहित जोड़े रानी और रिशु से शुरु होती है, जिसे निभाया है तापसी पन्नू और विक्रांत मेस्सी ने। प्यार, गुस्सा, नफरत, गफलत, पागलपन.. दोनों कलाकार को निर्देशक ने फिल्म में हर हाव भाव दिखाने का मौका दिया, जिसे उन्होंने बेहतरीन निभाया भी है। लेकिन कहना गलत नहीं होगा कि पूरी फिल्म जो ध्यान खींचते हैं वो हैं विक्रांत। उनके किरदार को कई परतों में लिखा गया है और अभिनेता ने उतनी ही संजीदगी से उसे निभाया भी है। इंस्पेकटर किशोर की भूमिका में आदित्य श्रीवास्तव ने अच्छा काम किया है। हर्षवर्धन राणे भी अपने किरदार में जंचे हैं।

    संगीत

    संगीत

    फिल्म का संगीत दिया है अमित त्रिवेदी ने और गाने लिखे हैं वरुण ग्रोवर और क्षितिज पटवर्धन ने। तापसी और विक्रांत पर फिल्माये गाने 'दिल मेल्ट करदा' और 'लकीरां' कहानी को आगे बढ़ाते हैं और अच्छे लगते हैं।

    तकनीकि पक्ष

    तकनीकि पक्ष

    फिल्म की पटकथा औसत है, जिसे कनिका ढिल्लों ने लिखा है। एक मर्डर- मिस्ट्री फिल्म के सबसे महत्वपूर्ण अंग होते हैं- पटकथा और निर्देशन, लेकिन इस फिल्म में दोनों ही पक्ष मजबूत नहीं दिखे हैं। हालांकि कनिका ढिल्लों द्वारा लिखे गए कुछ संवाद बेहद प्रभावी हैं। खासकर दिनेश पंडित के किताब की पंक्तियां आपको याद रहती हैं। श्वेता वेंटक मैथ्यू की एडिटिंग कमजोर है। लेकिन जया कृष्णा की सिनेमेटोग्राफी कहानी को एक सही फ्लेवर देती है, जो फिल्म के पक्ष में जाता है।

    क्या अच्छा क्या बुरा

    क्या अच्छा क्या बुरा

    फिल्म हिस्सों में अच्छी है। तापसी पन्नू और हर्षवर्धन अपने किरदारों में जंचे हैं, लेकिन पूरी फिल्म जो ध्यान खींचते हैं वो हैं विक्रांत मैसी। वहीं, फिल्म के कमज़ोर पक्ष में आती है फिल्म की कहानी। फिल्म में कई ट्विस्ट हैं, लेकिन सभी बेदम.. कोई भी ट्विस्ट थ्रिल महसूस नहीं कराता है।

    देखें या ना देखें

    देखें या ना देखें

    बॉलीवुड में इतनी बेहतरीन मर्डर मिस्ट्री फिल्में बन चुकी हैं। ऐसे में निर्माता- निर्देशकों कुछ पुराने फॉरम्यूले से आगे बढ़कर दर्शकों के सामने कुछ नया परोसना होगा। 'हसीन दिलरुबा' कुछ नया लेकर नहीं आई है, इसीलिए तापसी पन्नू, विक्रांत मैसी जैसे कलाकार भी लंबे समय तक ध्यान बांधे नहीं रख पाते हैं। फिल्म का अंत कोई प्रभाव नहीं छोड़ता है। फिल्मीबीट की ओर से 'हसीन दिलरुबा' को 2.5 स्टार।

    English summary
    Taapsee Pannu, Vikrant Massey and Harshvardhan Rane starring Haseen Dillruba is a mystery- thriller. Although the film have nothing new to offer, the average plot being saved by the captivating performances.
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