शिक्षा के व्यवसाय को दर्शाती 'पाठशाला'
फिल्म -पाठशाला
कलाकार- शाहिद कपूर, आयशा टाकिया, नाना पाटेकर, सौरभ शुक्ला, सुशांत सिंह, अंजन श्रीवास्तव, सुष्मिता मुखर्जी
निर्देशक- मिलिंद उके
स्कूलों में शिक्षा से ज्यादा पैसे का बोलबाला है। देश के कई बड़े स्कूल एक प्रॉडक्ट की तरह अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं। विज्ञापन के माध्यम से लोगों को रिझाने में तो ये स्कूल सफल हैं, लेकिन शैक्षिक गुणवत्ता के मामले में कहीं न कहीं जरूर पीछे हैं। ऐसे ही स्कूल जो शिक्षा को व्यवसाय बना चुके हैं, उनकी असली तस्वीर को फिल्म 'पाठशाला' में दर्शाया गया है।
फिल्म ने समाज से जुड़ा एक अहम मुद्दा उठाया है, जिसमें हर तरह से उन लोगों को टार्गेट किया गया है, जो पैसे के लिए शिक्षा को माध्यम बना रहे हैं। जिन लोगों के लिए पैसे के आगे बच्चों के करियर का कोई मोल नहीं होता। मिलिंद उके की इस फिल्म में अगर कोई खामी है तो वो है पटकथा, जिस वजह से बीच-बीच में दर्शकों को बोरियत झेलनी पड़ी। यही वजह है कि फिल्म बीच में अपनी राह से भटक गई।
फिल्म राहुल प्रकाश उद्यावर (शाहिद कपूर) पर आधारित है जो सरस्वती विद्या मंदिर स्कूल में अंग्रेजी व संगीत के शिक्षक हैं। स्कूल में होमसाइंस की टीचर अंजली (आयशा टाकिया) भी हैं। दोनों की अपनी-अपनी कहानियां हैं, लेकिन आर्थिक मामले में कमजोर होने के कारण दोनों का जीवन एक दूसरे से मिलता-जुलता है। ऐसे में स्कूल की माली हालत काफी खराब हो जाती है, जिस वजह से प्रबंधन नए फार्मूले अपनाने लगता है। वो फार्मूला है व्यवसायीकरण का, जो आज देश के कई स्कूल अपना रहे हैं।
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नाम की चाहत में अब स्कूल प्रबंधन यहां की गतिविधि को बाजार में बेचने लगता है। शहर के व्यापारियों से मिलकर प्रबंधन यह फरमान लागू कर देता है कि बच्चों को हर चीज स्कूल से ही खरीदनी होगी। यहां दाम बाजार से अधिक रखे जाते हैं। देखा जाए तो आज देश भर के हर छोटे-बड़े शहरों में ऐसा ही हो रहा है। स्कूलों की गाढ़ी कमाई के इन स्रोतों को फिल्म ने काफी अच्छे ढंग से दिखाया है। किताबें, ड्रेस, खेल की वस्तुआं से लेकर कैंटीन में खाने के सामान तक सबकुछ महंगा हो जाता है। यहां हम आपको बताना चाहेंगे कि यहां फिल्म ने उन स्कूलों की चर्चा की है, जो बाहर से किताबें-कॉपी खरीदने पर आय दिन बच्चों को सजा देते हैं।
फिल्म में शिक्षकों के चरित्र को एकदम वर्तमान से जोड़ कर दर्शाया गया है। आज अधिकांश शिक्षक स्कूल प्रबंधनों की मनमानी के आगे झुके हुए हैं। वो इसलिए क्योंकि उन्हें अपनी नौकरी प्यारी होती है। यह फिल्म मुद्दे तो उठाने में तो सफल रही लेकिन समस्या का हल पूरी तरह नहीं खोज पायी।
अदाकारी की बात करें तो शाहिद कपूर और आयशा ने अपने किरदार के साथ पूरी तरह इंसाफ किया है। फिल्म का आकर्षण बरकरार रखने में दोनों ने अहम भूमिका निभाई। नाना पाटेकर हर बार की तरह इस बार भी बेहतरीन भूमिका में नजर आए। सौरभ शुक्ला स्कूल मैनेजर के रूप में, अंजन श्रीवास्तव चपरासी काफी अच्छी अदाकारी दिखाई। कुल मिलाकर यह फिल्म अच्छी है। इस फिल्म की समीक्षा पढ़ने के बाद इसकी तुलना आमिर खान की 'तारे जमीन पर' और '3 इडियट्स' से मत करिएगा। क्योंकि उन दोनों का कॉन्सेप्ट पूरी तरह इससे अलग था।


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