फैमिली ऑफ ठाकुरगंज फिल्म रिव्यू - वसेपुर - साहेब, बीवी और गैंगस्टर की कॉपी करने की बेहद खराब कोशिश

By Staff

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1.0/5

फैमिली ऑफ ठाकुरगंज में वो सब गलत है जो एक हिंदी फिल्म में नहीं होना चाहिए। यानि कि फिल्म है कहानी है, स्टारकास्ट हैं लेकिन किरदार नहीं, समय है लेकिन ड्रामा नहीं, हीरो है, हीरोइन है लेकिन विलेन नहीं। फैमिली ऑफ ठाकुरगंज डायरेक्ट की है मनोज झा ने और इसे लिखा है दिलीप शुक्ला ने लेकिन दोनों का ही अपरिपक्व काम परदे पर दिखता है।

कहानी है दो भाईयों की - नन्नू और मन्नू। दीवार के शशि कपूर और अमिताभ बच्चन की तरह। नन्नू घर की गरीबी दूर करने के लिए और सबका पेट पालने के लिए गलत रास्ते पर चलकर एक गैंगस्टर बन जाता है लेकिन मन्नू को लगता है ये रास्ता गलत है तो वो अच्छा आदमी बनकर समाज में अपना नाम कमाना चाहता है। बिल्कुल दीवार के शशि कपूर और अमिताभ बच्चन की तरह।

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फिल्म में दो भाईयों के किरदार में दिखाई देंगे जिमी शेरगिल जो अब गैंगस्टर बन बनकर अपना ब्लूप्रिंट बना चुके हैं। वहीं फिल्म में अच्छे भाई की भूमिका में हैं नंदीश सिंह। इन दोनों भाईयों की कहानी को लेकर फिल्म आगे बढ़ने की कोशिश करती है। इनकी मां की भूमिका में हैं सुप्रिया पिलगांवकर जो दोनों ही भाईयों का साथ देती हैं लेकिन उनका दिल गैंगस्टर नन्नू के साथ है।

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फिल्म में जिमी शेरगिल वही करते दिखाई देते हैं जो उन्होंने साहेब, बीवी और गैंगस्टर में किया था। उनकी भूमिका में और बोल चाल हाव भाव में ज़्यादा अंतर नहीं है। फिल्म में उनकी पत्नी शरबती के किरदार में दिखाई दे रही हैं माही गिल जिनके पास यहां भी ज़्यादा कुछ करने को नहीं है।

इस गैंगस्टर फिल्म में वो हर शख्स दिखाई देगा जो इन गैंगस्टर फिल्मों में दिखता है - सौरभ शुक्ला, मनोज पाहवा, यशपाल शर्मा, राज ज़ुत्शी, मुकेश तिवारी। अंत में फिल्म में पवन मल्होत्रा भी दिखाई देते हैं जो एक ऐसा पुलिस ऑफिसर बनकर आते हैं जो सब ठीक करेगा लेकिन फिल्म कहीं भी ठीक होती नज़र नहीं आती है।

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फिल्म में जिमी शेरगिल यानि कि नन्नू का किरदार हर उस गैंगस्टर की याद दिलाएगा जो एक समय बाद ह्रदय परिवर्तन कर लेता है। वहीं मुन्नू का किरदार उतना ही बोरिंग जितना कि कोई स्कूल की किताब। ये फिल्म छोटी गैंग्स ऑफ वसेपुर या साहेब बीवी और गैंगस्टर बनने की कोशिश करती है लेकिन औंधे मुंह गिरती है।

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फिल्म के पास एक ढंग का प्लॉट था और लेखक दिलीप शुक्ला, डायरेक्टर मनोज झा के साथ मिलकर इसे एक देखने लायक फिल्म में बदल सकते थे लेकिन कहानी के अभाव में ये फिल्म केवल आपको झेला देती है। हमारी तरफ से फिल्म को 1 स्टार।

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