Daas Dev Review: कहानी, किरदार और आइडिया सब जबरदस्त, बस यहां मात खा गई दास देव
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विलयम शेक्सपियर ने कहा था कि 'नाम में क्या रखा है?'.. वहीं राहुल भट्ट, ऋचा चढ्ढ़ा और अदिती राव हैदरी स्टारर सुधीर मिश्रा की दास देव भी शेक्सपियर की यही बात दोहराती है। ये फिल्म सरत चंद्र चैटर्जी की नॉवेल दासदेव का मॉर्डन वर्जन है। नहीं, ये फिल्म दो प्यार करने वाले लोगों की कहानी नहीं है। बल्कि सुधीर मिश्रा ने राजवंश राजनीति की कहानी बताने के लिए दासदेव का कुछ हिस्सा लिया है और शेक्सपियर की हेमलेट का कुछ हिस्सा लिया है। ये आइडिया स्क्रिप्ट और पेपर पर भले ही अच्छा लगता हो लेकिन स्क्रीन पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाया।
प्लॉट की बात करें तो, सुधीर के वर्जन में नशे में धुत रहने वाले देव (राहुल भट्ट) को समझाबुझा कर सही रास्ते पर ला दिया जाता है ताकि वो अपने अंकल अवधेश (सौरभ शुक्ला) के बीमार होने के बाद राजवंश राजनीति में उनकी जगह ले सके। वहीं उसकी बचपन की प्रेमिका पारो(ऋचा चढ्ढ़ा) उससे गुजारिश करती है कि वो 'असली मुद्दे' पर ध्यान दे।

वहीं ट्विस्ट तब आत है जब वो अनजाने में ही कई गलतियां कर देता है। जिसके बाद उसे पता चलता है कि राजनीति अंत की ओर जा रही है। इसी बीत, दास की जिंदगी में दूसरी औरत चांदनी (अदिती राव हैदरी) सबकुछ ठीक करने का काम करती है। इसके बदले वो राजनीतिक लाभ मांगने हिचकिचाती नहीं है। उसी वक्त वो खुद को देव की ओर आकर्षित महसूस करती है। इसके बाद पूरी फिल्म इन्हीं तीन किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। ये फिल्म सरत चंद्र चैटर्जी की पुरानी कहानी से इतर एक नया ट्विस्ट लेकर आई है।
सुधीर मिश्रा के दासदेव की कहानी काफी दिलचस्प है, परर्फोमेंस अच्छे हैं, लेकिन इसका लेखन बहुत कमजोर है, जिसके चलते फिल्म को काफी नुकसान हुआ है। वे इस फिल्म में देव की राजनीति में एंट्री को विस्तार से समझाने में काफी वक्त जाया कर देते हैं। किस तरह अवधेश अपने राजनीतिक पद को राजवंश में ही रखना चाहता है। जिसके चलते, लवस्टोरी पिछड़ जाती है। प्लॉट में कई परतें जोड़ने के लिए डायरेक्टर ने अपने कैरेक्टर को कई चेहरे दे दिए। इसी के चलते ऑडिएंस इन किरदारों से कनेक्ट नहीं हो पाई।


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