'अतिथि..'को देखकर भागेंगे नहीं आप

कलाकार: परेश रावल, अजय देवगन, कोंकणा सेन, शर्मा
संगीत: प्रीतम
2.5/5
आजकल की दौड़ती-भागती जिंदगी में अपने लिए वक्त निकालना ही काफी मुश्किल होता है फिर ऐसे में कोई मेहमान घऱ में आ जाए और जाने का नाम ही ना ले तो कोई भी परेशान हो जाएगा। ये ही कहानी है 'अतिथि तुम कब जाओगे' फिल्म की।
मुंबई में रहने वाले एक मध्यम वर्गीय विवाहित जोड़े पुनीत (अजय देवगन) और मुनमुन (कोंकणा सेन) की। उनकी लाइफ में तब टि्वस्ट आता है जब अचानक उनके घर में एक दूर का ऱिश्तेदार बिना बताए धमक जाते है औऱ जाने का नाम ही नहीं लेता। इस बिन बुलाए मेहमान को भगाने के लिए दोनों खूब जतन करते हैं। 'अतिथि..' एक हल्की फुल्की किस्म की हास्यप्रधान फिल्म है। जो विशुद्ध मनोरंजन करती है। ये ऐसी फिल्म नहीं है जो ओछे संवादों के जरिए हास्य पैदा करने की कोशिश करे बल्कि इसमें इस तरह से परिस्थितियां बनाईं गई हैं कि खुद ब खुद हंसी आ जाती है।
'अतिथि..' की कहानी अजय, कोंकणा और परेश के किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म के निर्देशक हैं पंकज धीर, टीवी के लिए ऑफिस-ऑफिस जैसा पॉपुलर धारावाहिक बना चुके हैं। उनकी टीम रोबिन भट्ट औऱ तुषार हीरानंदानी ने भारतीयों की आस्था का पूरा-पूरी ख्याल रखते हुए एक बढि़या स्क्रीनप्ले लिखा है। मां की आरती औऱ गणेश चतुर्थी जो कि किसी भी भारतीय की श्रद्धा जगाने के लिए काफी होते हैं, उनका बेहतरीन उपयोग फिल्म के अंदर किया गया है। लेकिन कुछ जगह ऐसी सीन्स भी डाले गए हैं जिनसे बचा जा सकता था।
ऐसे दृश्य फिल्म की लंबाई बढा़ने औऱ दृर्शकों को उबाने के अलावा कुछ नहीं करते। परेश रावल भी कहीं कहीं जरूरत से ज्यादा या कह लें ओवर एक्टिंग करते नजर आते हैं। हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि वो एक बेहतर एक्टर हैं। कोंकणा सेन जितनी संजीदगी से गंभीर फिल्मों में अभिनय करती हैं उतना ही दिल खोल के हंसाती भी हैं। अजय देवगन पिछले कुछ समय से ज्यादातर कॉमेडी फिल्में कर रहे हैं औऱ इस विधा में बेहतर होते जा रहे हैं। कुल मिलाकर एक मनोरंजक फिल्म है अतिथि.. जिसे आप सपरिवार देखने जा सकते हैं।


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