'अफ़ग़ान सरकार रंगमंच से नफ़रत करती है'

By Super

'अफ़ग़ान सरकार रंगमंच से नफ़रत करती है'
तालेबान की धमकियों, लोगों की शंकाओं, उपेक्षाओं के बीच कैसे आगे बढ़ रहा है अफ़ग़ानिस्तान में रंगमंच और क्या सरकार इसे लेकर गंभीर हो सकी है...?

पर साथ ही वो सरकार को भी आड़े हाथों लेते हुए कहती हैं कि अफ़ग़ानिस्तान सरकार थिएटर और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना, समर्थन और सहयोग देना तो दूर, इन चीज़ों से नफ़रत करती है.

तो फिर इन परिस्थितियों में अफ़ग़ानिस्तान में रंगमंच कैसे संभव हो पाता है. क्या हैं चुनौतियां और किन मुद्दों पर बात हो रही है, हमने यह सवाल किया मुनीरे हाशिमी से ताकि अफ़ग़ानिस्तान में रंगमंच को और समझा जा सके. उनसे हमारी मुलाक़ात पिछले दिनों तब हुई जब वो दिल्ली आईं अपने एक नाटक लेटर्स ऑफ़ क्राई के साथ.

पढ़िए, इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश--

आप अफ़ग़ानिस्तान से एक ऐसा नाटक लेकर दिल्ली आईं जिसकी पटकथा नारीवाद पर आधारित है. नारी की बात करना, महिलाओं के सवालों को उठाकर लोगों के बीच जाना, क्या सोचकर यह फ़ैसला लिया आपने

अफ़ग़ानिस्तान में सामाजिक स्थितियां ऐसी हैं जिसमें महिलाओं को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. महिलाएं पर्दे में छिपकर रहने के लिए मजबूर हैं. वे घर की दहलीज से बाहर नहीं निकल सकतीं. उन्हें लिखने-पढ़ने तक का हक़ नहीं है. उनके साथ नौकरों की तरह बर्ताव किया जाता है.

अफ़ग़ानिस्तान का समाज रंगमंच को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि आपको लगता है कि तालेबान ख़त्म हो गया पर तालेबान की सोच समाज में फैली हुई है. तालेबान के शासनकाल की मान्यताओं और उनके विचारों में कई लोगों का विश्वास आज भी क़ायम है. कई परिवार इन ग़लत धारणाओं को मानते हैं और ग़लत रीति-रिवाजों का पालन करते हैं मुनीरे हाशिमी

इन स्थितियों की ओर हमारे समाज में लोग ध्यान ही नहीं देते. वे इसे देखकर भी अनदेखा करते हैं. कुछ लोग देखते हैं पर करते कुछ नहीं और कुछ हैं जो देखते हैं पर हंसने के लिए. उपहास उड़ाने के लिए.

पर मुझे यह भी लगता है कि ऐसा केवल अफ़ग़ानिस्तान में नहीं है. हर समाज में महिलाओं की स्थिति इस तरह की है.

पर क्या ऐसे नाटक या यूं कहें कि रंगमंच को अफ़ग़ानिस्तान का समाज स्वीकार कर रहा है. तालेबान के शासन के दौरान तो रंगमंच को जैसे उखाड़ फेंका गया था. अब इसे लेकर क्या माहौल देखने को मिलता है अफ़ग़ानिस्तान में.

अफ़ग़ानिस्तान का समाज रंगमंच को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि आपको लगता है कि तालेबान ख़त्म हो गया पर तालेबान की सोच समाज में फैली हुई है. तालेबान के शासनकाल की मान्यताओं और उनके विचारों में कई लोगों का विश्वास आज भी क़ायम है. कई परिवार इन ग़लत धारणाओं को मानते हैं और ग़लत रीति-रिवाजों का पालन करते हैं.

ख़ासकर रंगमंच में महिलाओं का काम करना बहुत ही कठिन है. उन्हें समाज से उपेक्षा झेलनी पड़ती है. परिवार रास्ता रोकता है. तालेबान और अनजान लोग भी उनके लिए संकट पैदा करते हैं.

तो फिर समाज की उपेक्षा और नापंसदी के बीच थिएटर करने के लिए जो आर्थिक ज़रूरतें होती हैं, उन्हें आप लोग कैसे पूरा करते हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में रंगमंच से जुड़े लोग, कलाकारों आदि के लिए अपनी जीविका या थिएटर का खर्च इसी काम से खोज पाना संभव नहीं है. इसीलिए अधिकतर लोग ऐसे हैं जो कुछ और काम भी कर रहे हैं और साथ ही साथ थिएटर भी कर रहे हैं.

सरकार की इस ओर कोई ध्यान ही नहीं है. वे तो बस अपनी राजनीतिक गतिविधियों में ही लगे रहते हैं.

आपको बताउं, अगर आप अफ़ग़ानिस्तान में थिएटर कर रहे लोगों को आर्थिक स्थिति को देखेंगे तो पाएंगे कि कम आमदनी और औसत आर्थिक स्तर वाले लोग ही इसमें जुड़े हुए हैं.

दरअसल, अधिकतर लोग संतुष्टि के लिए थिएटर कर रहे हैं, न कि पैसों के लिए.

इस वर्ष अफ़ग़ानिस्तान से दो थिएटर समूह अपनी प्रस्तुतियाँ लेकर भारत आने वाले थे. पिछले वर्ष अफ़ग़ानिस्तान से थिएटर के भारत आने का सिलसिला आपने ही शुरू किया था. इसबार भी आप मुश्किल से आ सकीं और बाकी के दो समूह तो भारत पहुँच ही नहीं पाए. इनमें से एक समूह तो उस दिन प्रस्तुति देने वाला था जिस दिन आपके राष्ट्रपति हामिद करज़ई साहब दिल्ली आए हुए थे. क्या लगता है आपको... सरकार थिएटर, कला संस्कृति के मुद्दे पर कितनी गंभीर है.

मुझे लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान की सरकार थिएटर से नफ़रत करती है. उन्हें सांस्कृतिक गतिविधियों से नफ़रत है. वे ऐसी गतिविधियों से जुड़े लोगों को कोई मदद नहीं करना चाहते.

हम उनसे पैसे नहीं चाहते. हम बस उनका समर्थन चाहते हैं. हमें अक्सर अपरिचित अनजान लोगों से धमकियाँ मिलती रहती हैं. हमें इन हालातों में भी सरकार से मदद नहीं मिल रही है.

तो क्या आपको लगता है कि अभावों और सरकारी उपेक्षा के बीच आप अफ़ग़ानिस्तान में थिएटर को जमा पाएंगी, महिलाओं की ज़िंदगी पर आपके रंगमंच का, आपके प्रयासों को कुछ असर होगा...

मुझे लगता है कि जैसे-जैसे हम लोगों के बीच जाकर प्रस्तुतियाँ करेंगे, बदलाव आएगा. हालांकि इस बदलाव में सबसे बड़ी बाधा खुद वो समाज खड़ी करेगा जिसके बीच हम थिएटर करने जाएंगे.

पर इसके लिए थिएटर और सिनेमा जगत के लोग भी ज़िम्मेदार हैं. अफ़ग़ानिस्तान जिस तरह के समाज का देश है, जो यहाँ की परंपरा और मान्यताएं हैं, उसको ध्यान में रखते हुए परिवारों के लिए लड़कियों को बाहर भेजना या थिएटर जैसी बातों को स्वीकारना मुश्किल काम है.

सिनेमा और थिएटर के लोग भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं. अधिकतर लड़कियों ने, जो इस क्षेत्र में आई हैं, निर्देशकों, निर्माताओं के शोषण को झेला है. इससे भी असर पड़ा है.

दरअसल, अफ़ग़ानिस्तान में थिएटर, सिनेमा अपना चरित्र, अपनी पहचान खो चुके है. यहाँ सिनेमा और थिएटर को अन्य देशों और उनके फ़ैशन का अनुसरण नहीं करना चाहिए. अपने समाज को जानना चाहिए. इसपर ध्यान न देने का ख़ामियाजा यह है कि नई पीढ़ी को परिवार, समाज इससे जुड़ने नहीं देना चाहता है.

इस बार मुनीरे के समूह ने लेटर्स ऑफ़ क्राई का मंचन किया.

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