बोरिंग हैं 'लफंगे परिंदे'

By अंकुर शर्मा

lafangey parindey
प्रदीप सरकार ने लंफंगे परिंदे की जो कहानी लोगों के समक्ष पेश की है उसमें न तो लफंगई नजर आती है और न ही परिंदों की उड़ान ही दिखायी देती हैं। अगर लफंगई का मतलब ये है कि चंद मुंबईया छाप डॉयलॉग को डबल मीनिंग के रूप में पेश करना है तो वो गलत साबित हुए हैं, उनका फिल्माया एक्शन भी लोगों को आकर्षित नहीं करता है। कहानी में नयापन नहीं है, अगर इस सब्जेक्ट को वो कुछ बेहतर ढंग से पेश करते तो शायद फिल्म और अच्छी बन सकती थीं।

देखें : लफंगे-परिंदे की तस्वीरें

अभिनय के तौर पर नील नीतिन मुकेश बौने साबित हुए हैं, जनाब को डॉयलॉग बोलने में अभी ज्यादा मेहनत करनीं होगी। फिल्म में मुख्य आकर्षण थीं दीपिका जिन्होंने कोई कमाल तो नहीं किया हां इतना जरूर किया हर तरफ से निराशा पाने वाले दर्शकों को उन्होंने थोड़ी ही देर सही थोड़ी राहत जरूर दी है, उनका स्केटस पर डांस करना उनके चाहने वालों को थोड़ी देर के लिए लुभा सकता है, लेकिन इतना कहना जरूर होगा कि एक्टिंग में उनके भी दम नहीं हैं। फिल्म का संगीत भी कोई खास नहीं हैं, गाने ऐसे हैं जिन्हें हॉल के बाहर गाया या याद नहीं जा सकता है। आदित्य ने ऐसी फिल्म क्यों बनायी ये सवाल हर किसी के मन में हैं, कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि लफंगे-परिंदे ने उम्मीदों पर पानी फेरा है।

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