एक्टर आदिल हुसैन ने बताया द कश्मीर फाइल्स संवेदनशीलता की कमी - बुरी तरह फूटा लोगों का गुस्सा, ट्वीट्स

अनुपम खेर स्टारर विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म द कश्मीर फाइल्स को लेकर एक विचारधारा है जो ये मानती है कि इस तरह की फिल्में केवल समाज को बांटने की कोशिश करती हैं। इसलिए हिंसा दिखान का भी एक तरीका होना चाहिए। अब एक्टर आदिल हुसैन ने भी इस बारे में बात की है।

लेकिन आदिल हुसैन ने जैसे ही अपने विचार, अपने सोशल मीडिया पर ट्वीट किए, ट्रोल्स का एक सैलाब उनकी तरफ बढ़ गया। ट्रोल होने से ज़्यादा, लोगों का गुस्सा आदिल हुसैन पर निकला जहां लोगों ने ये यह कहने में भी गुरेज नहीं किया कि आप तो मुसलमान हैं इसलिए आप तो आतंकवादियों का ही साथ देंगे।

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आदिल हुसैन ने एक ट्वीट करते हुए लिखा - सच ज़रूर सामने लाना चाहिए लेकिन उसका भी एक तरीका होना चाहिए। संवेदनशील तरीका। वरना फिर सच कहने का सारा उद्देश्य, सारी खूबसूरती धरी की धरी रह जाती है। और जो असर होता है वो प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं से भरा होता है। ना कि अनुकूल। हमें ज़ाहिर सी बात है कि एक प्रतिकूल समाज नहीं बनाना है बल्कि एक ज़िम्मेदार और अनुकूल समाज बनाए रखना है। कला को कभी भी प्रतिकूल नहीं होना चाहिए।

हालांकि, आदिल हुसैन ने अपनी इस ट्वीट में ना किसी फिल्म का ज़िक्र किया और ना ही किसी एक्टर या डायरेक्टर का। लेकिन लोगों को ये समझते देर नहीं लगी कि वो द कश्मीर फाइल्स से जुड़ी बात कर रहे हैं। इसके बाद देखिए लोगों ने किस तरह, आदिल हुसैन की बात का विरोध किया।

माना तो सही

माना तो सही

एक यूज़र ने आदिल हुसैन की बात का जवाब देते हुए लिखा - चलिए अच्छा है, कम से कम आप ये कभी हुआ ही नहीं बोलते बोलते ये बोलने पर तो आए कि ऐसा हुआ है लेकिन ढंग से बताओ।

सच स्वीकारना सीखिए

सच स्वीकारना सीखिए

एक और यूज़र ने अपना गुस्सा दिखाते हुए लिखा - संवेदनशीलता? जो कश्मीरी पंडितों के साथ हुआ वो ना ही संवेदनशील था और ना ही खूबसूरत। ये कला के नाम पर लोगों के दिमाग से कड़वी यादें मिटाना असंभव है। कला के नाम पर लोगों को कुछ भी दिखाना बंद करिए। ये कोई लव स्टोरी या ड्रामा नहीं है। ये झकझोर देने वाला कड़वा सच है जो उतना ही भयानक है जितना इसे परदे पर दिखाया गया है। सच स्वीकार करना सीखिए।

जिन्होंने नरसंहार किया उनके साथ संवेदनशीलता?

जिन्होंने नरसंहार किया उनके साथ संवेदनशीलता?

एक और यूज़र ने आदिल हुसैन की बातों को खारिज करते हुए लिखा तो जिसने ये नरसंहार झेला है, वो उन लोगों के प्रति संवेदनशीलता बरते जिन्होंने ये संहार किया। जबकि वो 30 साल बाद अपने दुख, दर्द, गुस्से और पीड़ा के बारे में खुलकर बात कर रहे हों।

केवल ज़ोरदार तमाचे की ज़रूरत है

केवल ज़ोरदार तमाचे की ज़रूरत है

एक और यूज़र ने आदिल हुसैन की बातों से अहसमति जताते हुए लिखा - कड़वा सच कभी भी खूबसूरत या कला के अनुरूप नही होता है। सच केवल कड़वा होता है। सच केवल चीख चीथ कर कहना पड़ता है। सच केवल उन चेहरों के ऊपर एक ज़ोरदार थप्पड़ होना चाहिए जिससे वो बनावटी और नकली नींद से जाग पाएं।

सोच इतनी कैसे बदल गई?

सोच इतनी कैसे बदल गई?

एक यूज़र ने तुलना करते हुए लिखा - जब जय भीम जैसी फिल्म, संवेदनशीलता और नरम तरीके से नहीं बनाई गई और इस फिल्म ने लोगों की प्रतिक्रिया और गुस्सा साफ देखा तब आपका क्या कहना था? आप तो ऐसी फिल्मों को ऑस्कर लिस्ट में देखकर उत्साहित हुए थे। सोच रहा हूं कि हाल फिलहाल किस क्रिएटिव फिल्म ने आपकी सोच इतनी बदल दी।

असंवेदनशीलता होती क्या है?

असंवेदनशीलता होती क्या है?

एक्टर सुमीत राघवन ने भी आदिल हुसैन की बात का विरोध करते हुए पूछा - तो मैं इसे यूं समझाना चाहूंगा। गांधी फिल्म में जब महात्मा गांधी को गोली लगी तो क्या वो सीन नहीं दिखाना चाहिए? संवेदनशीलता और नरम तरीके से काम लेना चाहिए? क्योंकि अगर आप वो दिखाते हैं तो आप कला को अनुकूल प्रतिक्रिया दे रहे हैं जो कि कला के खिलाफ है? कला को संवेदनशील होना चाहिए और सच दिखाना असंवेदनशील है?

लोग अभी भी आदिल हुसैन से सुमीत राघवन की इस ट्वीट का जवाब मांग रहे हैं। वहीं कुछ लोगों ने आदिल हुसैन के साथ कुछ वीडियो शेयर करते हुए उनका जवाब मांगा है।

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