Exclusive- क्या हुआ जब गुलाबी नगरी से पूछा हसरत जयपुरी का नाम
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। दशहरे की छुट्टी पर मुझे जयपुर जाने का मौका मिला। जिस वक्त मैंने गुलाबी शहर में कदम रखा, उस वक्त मैं एक गीत गुनगुना रहा था, "जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहां कल क्या हो..." गुनगुनाते हुए मुझे इस गीत को लिखने वाले हसरत जयपुरी की याद आ गई। फिर मेरे मन में एक कौतूहल जाग उठा, कि चलो "जयपुर से पूछते हैं बता तेरी हसरत कहां है?" और मैंने महान गीतकार के बारे लोगों से पूछना शुरू कर दिया।

शायद आपको यकीन नहीं हो पर यह सच है जिस जयपुरी का नाम ऑल इंडिया रेडियो में प्रसारित होने वाले भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में अक्सर लिया जाता है, उसे यहां के तमाम लोग तो जानते ही नहीं हैं। रिक्शा चालक से लेकर पत्रकारों तक और टूरिस्ट गाइड से लेकर अधिकारियों तक, यही नहीं कला प्रेमियों से भी पूछने पर मुझे हसरत जयपुरी के बारे में कोई जानकारी हांसिल नहीं हो सकी।
अफसोस कि उन्हें अब उनके अपने शहर जयपुर में खोजना मुश्किल है। यानी कि अब वहां पर आप लाख कोशिश कर लें कि वे गुलाबी नगरी के किस इलाके में पैदा हुए थे, उनका बचपन कहां गुजारा आदि-आदि। आपको कोई सही जवाब नहीं देगा। उनके नाम पर शहर में किसी सड़क का नाम भी नहीं है।
जयपुर में लगातार तीन दिनों तक उनके गुलाबी शहर से संबंधों को जानने की चेष्टा बेकार गई। हमने शहर के पत्रकारों से लेकर रिक्शा चलाने वालों और अध्यापकों से लेकर होटल कर्मियों तक से हसरत जयपुरी साहब के पुश्तैनी घर के बारे में जानने की कोशिश की। पर कोई नतीजा नहीं निकला।
यादगार गीत लिखे
जरा गौर करें कि हसरत जयपुरी ने - दीवाना मुझको लोग कहें (दीवाना), दिल एक मंदिर है (दिल एक मंदिर), रात और दिन दीया जले (रात और दिन), तेरे घर के सामने इक घर बनाऊंगा (तेरे घर के सामने), ऐन इवनिंग इन पेरिस (ऐन इवनिंग इन पेरिस), गुमनाम है कोई बदनाम है कोई (गुमनाम), दो जासूस करें महसूस (दो जासूस) जैसे यादगार गीत लिखे।
हसरत जयपुरी का मूल नाम इकबाल हुसैन था। उन्होंने जयपुर में प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद अपने दादा फिदा हुसैन से उर्दू और फारसी की तालीम हासिल की। बीस वर्ष का होने तक उनका झुकाव शेरो-शायरी की तरफ होने लगा और वह छोटी-छोटी कविताएं लिखने लगे।
वर्ष 1940 मे नौकरी की तलाश में हसरत जयपुरी ने मुंबई का रुख किया और आजीविका चलाने के लिए वहां बस कंडक्टर के रुप में नौकरी करने लगे। इस काम के लिए उन्हे मात्र 11 रुपये प्रति माह वेतन मिला करता था। इस बीच उन्होंने मुशायरा के कार्यक्रम में भाग लेना शुरू किया। उसी दौरान एक कार्यक्रम में पृथ्वीराज कपूर उनके गीत को सुनकर काफी प्रभावित हुए और उन्होने अपने पुत्र राजकपूर को हसरत जयपुरी से मिलने की सलाह दी।
राजकपूर ने भेजा था न्योता
कहते हैं कि राजकपूर उन दिनों अपनी फिल्म बरसात के लिए गीतकार की तलाश कर रहे थे। उन्होंने हसरत जयपुरी को मिलने का न्योता भेजा। राजकपूर से हसरत जयपुरी की पहली मुलाकात रायल ओपेरा हाउस में हुई और उन्होने अपनी फिल्म बरसात के लिए उनसे गीत लिखने की गुजारिश की। इसे महज संयोग ही कहा जाएगा कि फिल्म बरसात से ही संगीतकार शंकर जयकिशन ने भी अपने सिने कैरियर की शुरुआत की थी।
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उनके कुछ और गीत भी देखें
छोड़ गए बालम मुझे हाय अकेला... (बरसात, 1949), हम तुम से मोहब्बत करके सनम... (आवारा, 1951), इचक दाना बीचक दाना... (श्री 420, 1955), आजा सनम मधुर चांदनी में हम... (चोरी चोरी, 1956), जाऊं कहा बता ए दिल... (छोटी बहन, 1959), एहसान तेरा होगा मुझपर... (जंगली, 1961), तेरी प्यारी प्यारी सूरत को... (ससुराल, 1961), तुम रूठी रहो मैं मनाता रहूं... (आस का पंछी, 1961), इब्तिदाए इश्क में हम सारी रात जागे... (हरियाली और रास्ता, 1962) बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है... (सूरज, 1966), दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई... (तीसरी कसम, 1966), कौन है जो सपनों में आया... (झुक गया आसमान, 1968), रूख से जरा नकाब उठाओ मेरे हुजूर... (मेरे हुजूर, 1968), पर्दे में रहने दो पर्दा ना उठाओ... (शिकार, 1968) जाने कहां गए वो दिन... (मेरा नाम जोकर, 1970) और जिंदगी एक सफर है सुहाना... (अंदाज, 1971)। अब जरा अंदाजा लगा लें कि जिस गीतकार ने हिन्दी सिनेमा को इतना समृद्ध किया, उसे उसके ही शहर में कोई नहीं जानता।


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