EXCLUSIVE INTERVIEW: संजय लीला भंसाली को असिस्ट करने से लेकर नेपोटिज्म तक, सिकंदर खेर से खास बातचीत

Sikander Kher: वासन बाला निर्देशित फिल्म 'मोनिका, ओ माय डार्लिंग' में अपने अभिनय के लिए तारीफ बटोरने वाले अभिनेता सिकंदर खेर अपने करियर में आए इस फेज़ को लेकर काफी उत्साहित हैं। फिल्मीबीट के साथ एक विशेष बातचीत के दौरान अभिनेता ने अपने किरदारों के चुनाव और करियर पर खुलकर बातें कीं।
मोनिका ओ माय डार्लिंग के बारे में बात करते हुए सिकंदर ने कहा, "यदि किसी फिल्म या किरदार को लोगों से इतना प्यार मिलता है, तो बहुत खुशी महसूस होती है। अंदाजा लगता है कि लोग मेरा काम देख रहे हैं, परफॉर्मेंस देख रहे हैं और पसंद कर रहे हैं।"
आर्या हो या मोनिका ओ माय डार्लिंग, सिकंदर खेर ने पिछले वर्षों में कुछ बहुत ही रोचक फिल्में और शोज चुने हैं। फिल्मीबीट से बात करते हुए सिकंदर ने वासन बाला के साथ काम करने के अनुभव को साझा किया। साथ ही बताया कि किस तरह संजय लीला भंसाली के सेट से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी।
यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

Q. वासन बाला के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? उनके प्रोसेस के बारे में कुछ बताएंगे?
A. हर डायरेक्टर का प्रोसेस अलग होता है। वासन बाला की बात करूं तो उनके साथ काम करना बहुत ही आसान है। वो एक्टर्स को बिल्कुल कंफर्टेबल कर देते हैं। उनका मानना है कि हमारे यहां कोई बुरा टेक नहीं होता है, हम सिर्फ अलग अलग टेक करते हैं। वो कोई प्रेशर नहीं देते हैं.. शायद इसीलिए परफॉर्मेंस भी अच्छे से निकलकर आता है। इस फिल्म में ही सभी के परफॉर्मेंस की बहुत तारीफ हुई है। तो ये सब उसी माहौल की वजह से है, जो वो सेट पर बनाकर रखते हैं। वो कमाल के इंसान हैं। मैं हमेशा उनके साथ काम करना चाहता था। सेट पर ही नहीं, मुझे ऑफ सेट भी उनके साथ वक्त गुजारना बहुत अच्छा लगा।
Q. किरदारों के चुनाव को लेकर आपकी प्रक्रिया क्या रही है?
A. जब कभी भी मैं कोई स्क्रिप्ट पढ़ता हूं, किसी किरदार के बारे में पढ़ता हूं, यदि मुझे उसमें दिलचस्पी लगती है, मैं उससे कनेक्ट कर पाता हूं.. तो मैं उस प्रोजेक्ट से जुड़ जाता हूं। फिल्म से बड़ा कुछ नहीं होता। इसीलिए सबसे ज्यादा अहमियत मेरे लिए स्क्रिप्ट ही रखती है। फिर मैं देखता हूं कि मेरे किरदार में परफॉर्मेंस का कितना स्कोप है, मैं उसे कितना प्रभावी बना सकता हूं। तो ये सब चीजें मेरे ज़हन में रहती हैं हमेशा।
Q. मल्टीस्टारर फिल्मों में अपने किरदार की स्क्रीन टाइम को लेकर प्रेशर महसूस करते हैं?
A. नहीं, नहीं। मैं ये नहीं सोचता हूं कि इतने सारे कलाकार हैं तो मैं अपनी जगह कैसे बनाउंगा। मेरा काम है कि मेरे किरदार को स्क्रिप्ट को हिसाब से लेकर चलना, स्क्रिप्ट के प्रति सच्चा रहना। बाकी पहचान बनाना हमारे हाथ में है ही नहीं। ये दर्शकों के हाथ में है। यदि कुछ क्लिक हो गया, तो गया। मैं सिर्फ अपना काम सच्चाई के साथ करता हूं।

Q. मैंने कहीं पढ़ा था कि आपने अपने करियर की शुरुआत में कई फिल्मों में बतौर असिस्टेंट काम किया था। इसमें कितनी सच्चाई है?
A. (हंसते हुए) हां, मैं 13-14 साल का था, जब मैंने 'दिल तो पागल है' में काम किया था। मैं उस वक्त सिर्फ क्लैप देता था। फिर संजय लीला भंसाली की देवदास में मैंने पूरी फिल्म के लिए असिस्ट किया।
Q. उस वक्त आपने सेट पर जो अनुभव बटोरा, फिल्मों के काम करने के दौरान कितना उपयोगी रहा?
A. मैं आपको सच बताऊं तो उस वक्त मेरी उम्र बहुत कम थी तो मुझे ज्यादा समझ में नहीं आता था। उस वक्त मैं एक्टिंग के बारे में कुछ सोच ही नहीं रहा था, इसीलिए मैं ये नहीं कह सकता हूं कि उस अनुभव से बतौर एक्टर मैं कभी प्रभावित रहा हूं। फिल्में करते करते मैंने एक्टिंग सीखी है। सेट पर देख देखकर सीखा हूं। एक्टिंग के बारे में यदि कुछ सीखना चाहता मैं तो शाहरुख के साथ बैठकर शायद उनसे प्रोसेस पूछता। लेकिन मैंने कभी उसका फायदा उठाया ही नहीं। माधुरी के साथ या ऐश के साथ.. मेरे पास भी मौके थे, लेकिन मैंने कोई फायदा नहीं उठाया। उस वक्त क्योंकि मैं उस स्टेट ऑफ माइंड में ही नहीं था। लेकिन हां, संजय लीला भंसाली हमेशा मेरे गुरु रहेंगे। देखा जाए तो उनके साथ मैंने अपना पहला काम किया है। फिल्मों के साथ उनका जो लगाव है, वो मैंने देखा है। और सच है कि उनके जैसी फिल्में कोई नहीं बनाता। अपने काम के साथ लगाव, पैशन और ऑब्सेशन होना क्या चीज है.. वो संजय सर से ही मैंने सीखा है।

Q. आपकी डायरेक्टर बनने की ख्वाहिश है?
A. कभी नहीं। मैं हमेशा सोचता हूं कि मैं असिस्टेंट डायरेक्टर क्यों बना। (हंसते हुए) शायद मुझे कॉलेज नहीं जाना था इसीलिए मैं असिस्टेंट डायरेक्टर बन गया।
Q. एक्टर ही बनना है, ये इरादा कब पक्का किया?
A. मुझे लगता है कि 6- 7 साल की उम्र में ही ये ख्याल आ गया था कि एक्टिंग ही करनी है। फिल्में देखने में मुझे बहुत मजा आता था। एक्टर्स को देखता था, बैकग्राउंड म्यूजिक ध्यान से सुनता था.. तो मुझे लगता था कि मैं भी यही करना चाहता हूं। और ये है कि मैं फिल्म फैमिली में पैदा हुआ हूं तो इंडस्ट्री के लोगों के साथ ही हमारा उठना बैठना था। यश चोपड़ा जी हमारे फैमिली फ्रेंड थे, उनके घर आना जाना होता था। मैं सेट्स पर काफी जाता था। तो अपनी जिंदगी का ज्यादा से ज्यादा वक्त मैंने फिल्म या फिल्म से जुड़े लोगों के बीच में ही गुजारा है। तो जाहिर सी बात है कि एक्टर बनने के निर्णय पर इन बातों का भी बड़ा प्रभाव था।

Q. आपने एक दफा कहा था कि आपने कभी अपने मम्मी- पापा के द्वारा किसी मेकर को अप्रोच नहीं किया है? आज भी ऐसा ही है?
A. मुझे कभी कहने की जरूरत ही नहीं पड़ी। हमारे बीच में घर पर कभी इस टॉपिक को लेकर कोई चर्चा हुई ही नहीं है। ज्यादातर लोग जो बाहर से अंदर देखते हैं, उनको लगता है कि शायद ऐसा होता होगा। लेकिन घर पर कभी भी बात ही नहीं उठी। मेरे माता- पिता ने अपनी जगह बनाई है, उन्होंने थियेटर किया है, फिल्में की हैं, नाम कमाया है। उनकी अपनी जर्नी है। मैं भी अपना काम कर रहा हूं।
Q. जब नेपोटिज्म और उससे मिलने वाले privilege के बारे में बात होती है, आप क्या सोचते हैं?
A. मुझे लगता है कि करियर एक छोटी सी चीज होती है जिंदगी में। मेरे लिए जरूरी है कि मैं खुश रहूं। मेरे लिए सबसे जरूरी इंसान मैं खुद हूं। हर सुबह उठकर खुद को आइने में देखना और खुद से खुश रहना बहुत जरूरी है। इसके अलावा मेरे मां और पिता ने हमेशा मुझे सपोर्ट किया है। मैं हमेशा उन्हें खुश देखना चाहता हूं। जहां मैं पैदा हुआ हूं, वो भगवान की देन है, वो नसीब है मेरा। मेरे सिर पर छत है, मेरे टेबल पर खाना है, मुझे रेंट भरने की नौबत नहीं आती है, इन सबके लिए मैं हमेशा सिर झुकाकर भगवान का शुक्रिया अदा करता हूं। और मैं ये सब सिर्फ सुनाने के लिए नहीं बोल रहा हूं। ये वाकई मेरा मानना है क्योंकि इससे मुझे खुशी मिलती है। दूसरों लोगों से ईर्ष्या नहीं होती। जैसे मैं कह रहा था कि मेरे लिए सबसे जरूरी है कि मैं अंदर से खुश और शांत रहूं।

Q. करियर में आए उतार- चढ़ाव से कितने प्रभावित हैं? कैसे डील करते हैं?
A. मैं यही सोचता हूं कि.. भगवान ने बहुत कुछ दिया है दोस्त, मैं काम के लिए इंतजार कर सकता हूं। ये मेरे मां- बाप की देन है कि मैं मुंबई जैसे शहर में रह सकता हूं। करियर में ऊपर और नीचे जाना तो चलता रहेगा। जब नीचे गिरते हैं तो उससे भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है। दुख होता है, लेकिन उसे भी समझते हैं। जब तारीफें मिलती हैं तो भी लगता है कि ज्यादा उत्साहित ना हो जाऊं। मैं सिर्फ बैलेंस बनाकर चलना चाहता हूं।
Q. बतौर एक्टर इतने सालों में खुद में कितना बदलाव पाते हैं?
A. अनुभव से बड़ा कोई टीचर नहीं होता है। जितना काम करते जाता हूं, उतना सीखते जाता हू। साथ ही मेरा मानना है कि हमेशा आपके आंख और काम खुले रहना चाहिए। लोगों की सलाह लेनी चाहिए। मानना या नहीं मानना , वो आपके हाथ में है। लेकिन सलाह लेने में क्या जाता है! क्या पता कभी कोई सही बात आप तक पहुंच जाए। जैसे जैसे आप आगे बढ़ते हैं, आप सीखते जाते हैं, आप कोशिश करते हैं, फेल होते हैं, सफल होते हैं।

Q. आने वाले प्रोजेक्ट्स के बारे में कुछ शेयर करना चाहेंगे?
A. 'मंकी मैन', जो देव पटेल की फिल्म है, वो नेटफ्लिक्स पर आएगी। फिर 'दुकान' एक फिल्म है, और फिर एक नीरज पांडे के साथ एक फिल्म मैंने खत्म की है। इसके अलावा एक शो है एमएक्स प्लेयर की, जिसका नाम है 'चिड़िया उड़', जिसमें जैकी श्रॉफ जी भी हैं। एक और शो है नेटफ्लिक्स का। तो हां, ये कुछ प्रोजेकेट्स हैं, जो आने वाले हैं। उम्मीद करता हूं लोगों को पसंद आए।
Q. सफलता के साथ व्यस्तता बढ़ती गई है, बतौर एक्टर खुशी होती है?
A. मेरी मां ने कहा कि एक एक्टर के लिए सबसे बड़ी दुआ यही होती है कि आप बिजी रहो। और कुछ नहीं चाहिए। बस बिजी रहना है, जिंदगी भर।
Q. मां (किरण खेर) की किन बातों से प्रेरणा मिलती है?
A. मां passionate हैं, इमोशनल हैं, पॉजिटिव रहना जानती हैं और बहुत मजबूत हैं.. उनकी ये सारी बातें मुझे बहुत प्रेरणा देती हैं।


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