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    अमर अकबर एंथनी: रिलीज़ के 43 साल बाद पकड़ी गई ये Mistake, आप भी सुनकर लोटपोट हो जाएंगे

    By Staff
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    अमिताभ बच्चन की अमर अकबर एंथनी ने 7 जनवरी को अपनी रिलीज़ के 43 साल पूरे किए हैं। हाल ही में राजीव मसंद के डायरेक्टर्स राउंडटेबल में फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प वाकया शेयर किया गया जिसे सुनकर हर कोई हंस देगा। असल में ये फिल्म की सबसे बड़ी बेवकूफी या गलती है।

    डायरेक्टर अनुभव सिन्हा ने बताया कि सरोज खान ने उन्हें बताया था कि फिल्म के डायरेक्टर मनमोहन देसाई से सरोज खान ने पूछा कि फिल्म के क्लाईमैक्स में तीनों हीरो भेष बदलकर, किडनैप हुई हीरोइनों को छुड़ाने जाते हैं लेकिन गाना क्या गाते हैं - एक जगह जब जमा हो तीनों - अमर अकबर एंथनी।

    मनमोहन देसाई भी ये सुनकर थोड़ी देर के लिए चुप हो गए। अमर अकबर एंथनी एक ब्लॉकबस्टर फिल्म थी। उन्होंने सरोज खान से कहा कि आज तक मुझसे पूरे भारत ने ये सवाल नहीं पूछा।

    बात करें अमर अकबर एंथनी की तो फिल्म में सबकुछ था बस अगर कुछ मिसिंग था तो लॉजिक। यकीन नहीं आता तो यहां देख लीजिए -

    सत्तर के दशक में अगर फुलटू भ्रष्टाचार होता

    सत्तर के दशक में अगर फुलटू भ्रष्टाचार होता

    फिल्म बड़ी सादे लोगों की कहानी थी जो कमीने बनने की पूरी कोशिश करते हैं। शुरू में ही रॉबर्ट सेठ अपने ड्राइवप किशनलाल को खुद के किए हुए एक्सीडेंट का इल्ज़ाम अपने सर लेने को कहता है।

    पर ज़रा सोचिए अगर देश में थोड़ा करप्शन का लेवेल ज्यादा होता तो रॉबर्ट ड्राइवर से सेटिंग करने की बजाय थोड़ा ऊपरी जुगाड़ लगाता। आखिर हम सुबह से लेकर रात तक इसी जुगाड़ टेक्नोलॉजी में ही तो रहते हैं। अगर रॉबर्ट ऐसा करता तो किशनलाल जेल जाने की बजाय घर बैठकर बीबी के टीबी का इलाज करवा रहा होता!!

    बचपन में ही बच्चों का नाम रखते

    बचपन में ही बच्चों का नाम रखते

    तीन बच्चे। चलो एक तो छोटा था पर बाकी दोनों इतने बड़े थे कि उनके नाम हों। पर नाम केवल अमर का। क्यों भई। बाकी के नाम लायक नहीं थे। फिल्म जब भी जिसने भी बच्चों को याद किया बस अमर का नाम बुलाया।

    बाकी दोनों के साथ धोखा। तो फिर इन्होंने भी बदला लिया। अपना नाम किसी को बोला ही नहीं। पहले ही नाम होते तो फिल्म के पहले सीन में अमर अकबर एंथनी की जगह सब अपने नाम बताते अमर, राजू, सुरेश टाइप!!

    इन सबका ब्लड ग्रुप मैच ही नहीं होता

    इन सबका ब्लड ग्रुप मैच ही नहीं होता

    सबने इस फिल्म का ये मज़ाक उड़ा लिया कि एक बार में तीन पाइप लगाकर खून चढ़ा रहे हैं। किसी ने ये नोटिस क्यों नहीं किया कि इन सबका ब्लड ग्रुप एक ही क्यों था। सबका खून मां से मैच करवा दिया। वैसे गाना बज रहा था, खून है पानी नहीं, तो भइया खून है सेम टू सेम कितना मैच हुआ। पानी थोड़ी है कि सब H2O.

    ऊपर से खून चढ़ाना था ग्लूकॉन डी नहीं। कि दे दना दन बोतल डाले जा रहे थे। लेकिन अगर इतना ड्रामा नहीं होता तो अमर अकबर एंथनी का इंट्रोडक्शन फीका पड़ जाता!

    निरूपा आंटी अंधी नहीं होतीं

    निरूपा आंटी अंधी नहीं होतीं

    फिल्म में सबके साथ सेम चीज़े बार बार हुईं। पहले इन बच्चों के पापा का एक्सीडेंट हुआ फिर मम्मी का और मम्मी की बीमारी टीबी से बदलकर मोतियाबिंद। मतलब मम्मी की आंखे बेकार।

    अगर ऐसा नहीं होता तो मम्मी अपने बच्चे को देखते ही पहचान लेती और वो दोनों मिलकर बाकियों तो ढूंढते और कहानी का नाम होता अमर, समर, उमर!

    Whatsapp पे ग्रुप चैट कर लेते

    Whatsapp पे ग्रुप चैट कर लेते

    अगर टेक्नोलॉजी थोड़ी सी भी एडवांस्ड होती तो ये सब भाई बैठकर वॉट्सऐप पर ग्रुप चैट कर रहे होते या फेसबुक पर स्टेटस अपडेट करते। या सीधा ट्वीट ही कर देते Bro Missing। फिल्म छोटी भी, बेतुकी भी और बोरिंग भी।

    ये लड़की चोर थी और कैरेक्टर भी ढीला, प्यार कैसे हुआ DUDE!

    ये लड़की चोर थी और कैरेक्टर भी ढीला, प्यार कैसे हुआ DUDE!

    वैसे चोर और पुलिस का चोली दामन का साथ है पर आगे पीछे, ऊपर नीचे। साथ साथ नहीं। अगर विनोद खन्ना को इससे प्यार नहीं हआ होता तो लड़की जेल के अंदर पुलिस जेल के बाहर। लड़की चक्की पीसिंग एंड पीसिंग एंड पीसिंग। पुलिस मेडल बटोरिंग एंड बटोरिंग एंड बटोरिंग।

    उसी समय शंकराचार्य को कहना था साईं भगवान नहीं है

    उसी समय शंकराचार्य को कहना था साईं भगवान नहीं है

    हालांकि शंकराचार्य की बात कितने मानते ये तो पता नहीं पर अगर वो इसी टाइम पर कह देते कि साईं की पूजा नहीं होनी चाहिए क्योंकि वो भगवान नही है तो अकबर इलाहाबादी उन के दर पर जाकर टाइम वेस्ट नहीं करता। न ही मां भी मरते जीते बाबा के दर्शन करने पहुंचती। #JustSaying!

    बाबा चमत्कार नहीं करते

    बाबा चमत्कार नहीं करते

    बाबा बड़े प्रभावशली थे। उनकी आंखों से कुछ निकला और निरूपा आंटी की आंखें ठीक हो गईं। लेकिन अगर ऐसे अंधविश्वासी लोग नहीं होते तो न मम्मी की रोशनी आती, न वो फोटो में अपने बेटे को पहचानती।

    बच्चे दो ही अच्छे लागू कर देते

    बच्चे दो ही अच्छे लागू कर देते

    अगर इस परिवार ने फैमिली प्लानिंग की होती तो किशनलाल के दो ही बच्चे होते। ऐसे में कहानी ज़्यादा मज़ेदार नहीं होती। राम लखन, करन अर्जुन, सीता गीता टाइप एक और कहानी बढ़ जाती। थैंक गॉड किशनलाल ने फैमिली प्लानिंग नहीं की!

    इन बच्चों को किसी ने अडॉप्ट नहीं किया होता

    इन बच्चों को किसी ने अडॉप्ट नहीं किया होता

    सारी कहानी ही शुरू हुई इन तीन बच्चों को तीन लोगों के अडॉप्ट करने से। अगर इन बच्चों को कोई अडॉप्ट ही नहीं करता तो शायद ये भीख मांगते या फिर गुंडे और मिल्खा की तरह चोरी वोरी करने लगते । कुछ भी होता ये बच्चे अमर अकबर एंथनी तो नहीं होता!

    English summary
    Anubhav Sinha in Directors' roundtable with Rajeev Masand narrated how Saroj Khan pointed Amar Akbar Anthony's biggest mistake.
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