..................... Panchayat Season 2 review web series on Amazon Prime Video wins high on emotions | पंचायत सीज़न 2 रिव्यू - इमोशनल कर देगी अमेज़ॉन प्राइम की ये वेब सीरीज़ - Hindi Filmibeat

पंचायत सीज़न 2 रिव्यू: हंसी से शुरू होकर आखिरी एपिसोड में आंखें नम कर जाती है ये सीरीज़, पूरे नंबरों से पास

Rating:
4.0/5

पंचायत सीज़न - 2
डायरेक्टर - दीपक कुमार मिश्रा
प्रोड्यूसर - अरूणाभ कुमार
लेखक - चंदन कुमार
स्टारकास्ट - जितेंद्र कुमार, रघुबीर यादव, चंदन रॉय, फ़ैसल मलिक, नीना गुप्ता, सान्विका, दुर्गेश कुमार, सुनीता राजवर व अन्य
एपिसोड / अवधि - 8 एपिसोड/ 30 मिनट प्रति एपिसोड

'दुनिया में दू तरह का आदमी शराबी बनता है - पहला वो अपने काम से ज़्यादा कमाता है और दूसरा वो जो काम से कम कमाता है।
मैं पैसे कम कमाता हूं पर शराबी नहीं हूं - ऐसा हमको भी यही लगता था, पर लोग बन जाते हैं। जब शादी होगा, बच्चा होगा और 20 हज़ार में जब घर चलाना होगा ना तो बन जाइएगा।’

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ग्राम फुलेरा के पंचायत सचिव को जब एक आम सा शराबी ये बात बोलता है तो सचिव जी एक बार फिर अपनी उसी उलझन भरी दुनिया से दर्शकों को बिना कुछ बोले ही रूबरू करवा देते हैं।

सीज़न 1 ये बता चुका है कि कैसे गांव के नए सचिव अभिषेक त्रिपाठी को जल्दी से जल्दी एक अच्छी प्राईवेट नौकरी पानी है और 20 हज़ार रूपये की इस ग्राम सचिव की सरकारी नौकरी को छोड़ कर, गांव को छोड़कर ऐश और आराम की ज़िंदगी जीनी है।

लेकिन गांव से बाहर निकलने की आतुर कोशिशों के बीच भी ये सचिव अपना काम पूरी ज़िम्मेदारी और ईमानदारी से करना नहीं भूलता है। तो क्या ये गांव उसका परिवार बन पाता है? क्या वो अपनी चकाचौंध की ज़िंदगी में वापस जाने का सपना पूरा कर पाएगा? क्या ये गांव उसे अपनाएगा? क्या सचिव इस गांव को अपना बना पाएगा? इन सारे सवालों का जवाब लेकर लौटा है पंचायत का सीज़न 2।

जहां कहानी खत्म, वहीं से कहानी शुरू

जहां कहानी खत्म, वहीं से कहानी शुरू

पंचायत के पहले सीज़न में ग्राम के सचिव अभिषेक त्रिपाठी (जीतेंद्र कुमार ) का सबने स्वागत किया था और हर कोई उन्हें गांव के बारे में बताते हुए पानी की टंकी पर जाने की बात ज़रूर करता था। पानी की टंकी से पूरा गांव साफ दिखता है। पिछले सीज़न के आखिरी एपिसोड में जब सचिव जी टंकी पर चढ़े तो उनकी मुलाकात हुई रिंकी से जो कि ग्राम के प्रधान की बेटी है। सीज़न 2 की शुरूआत भी इसी पानी की टंकी से होती है जहां से सचिव जी उतरते हैं। पिछले सीज़न में जो सचिव जी हमेशा परेशान और खिसियाए हुए रहते थे, इस सीज़न के पहले ही सीन से काफी खुश मिज़ाज़ दिखाई देते हैं।

पंचायत का प्लॉट

पंचायत का प्लॉट

दर्शकों को उम्मीद थी कि पंचायत सीज़न 2 का फोकस होगा रिंकी और सचिव जी। लेकिन ऐसा नहीं है। पंचायत सीज़न 2 का भी मूल फोकस है फुलेरा गांव। इस गांव की प्रधान (नीना गुप्ता), प्रधान पति (रघुबीर यादव), उप प्रधान (फ़ैसल मलिक), सहायक सचिव (चंदन रॉय) और सचिव जी (जीतेंद्र कुमार)। इन पांच लोगों की टीम मिलकर, हर एपिसोड में फुलेरा गांव की कोई ना कोई नई दिक्कत सुलझाएगी और साथ ही इनके निजी संबंध एक दूसरे से कुछ इस तरह जुड़ते जाएंगे कि ये एक परिवार बनते जाएंगे।

दिल जीतते हैं किरदार

दिल जीतते हैं किरदार

पंचायत का हर किरदार आपके दिल में बस जाता है। सचिव अभिषेक त्रिपाठी के किरदार में जीतेंद्र कुमार पहले ही सीज़न से लोगों के दिल पर राज कर रहे हैं। पिछले सीज़न जहां वो गांव के नए मेहमान थे, इस सीज़न ये गांव उनका हो चुका है। वो यहां की गलियां पहचानते हैं और जब वो अपने ही दोस्त को कहते हैं कि यहां बाहर वालों को गांव वाले घूरते हैं तो कहीं ना कहीं वो दर्शकों के चेहरे पर ऐसी मुस्कान छोड़ जाते हैं मानो दर्शक भी फुलेरा के ही रहने वाले हों। इसका श्रेय जितना जीतेंद्र कुमार को जाता है, उतना ही लेखक चंदन कुमार को भी जाता है। बात करें प्रधान पति रघुबीर यादव की तो उनका गुस्सा, उनकी दोस्ती, उनकी विडंबनाएं, उनकी चाटुकारिता, हर रंग रघुबीर यादव गिरगिट की तरह बदलते हैं और हर सीन उन पर फबता है। सीरीज़ में इस बार मुख्य रूप से सामने आते हैं, प्रहलाद चच्चा बने फ़ैसल मलिक और सचिव अभिषेक त्रिपाठी के सहायक विकास (चंदन रॉय) जो इस छोटे से गांव में अभिषेक के नए दोस्त और परिवार के रूप में जगह बनाते हैं। आखिरी एपिसोड में इन चार दोस्तों का एक परिवार बनना आपको भावुक करता है और आंखें नम कर जाता है।

किरदारों में ढल जाती है पूरी कास्ट

किरदारों में ढल जाती है पूरी कास्ट

इन चार मुख्य किरदारों के अलावा इस सीज़न में प्रधान जी नीना गुप्ता थोड़ा पीछे छूटती हैं। नीना गुप्ता के किरदार पर इस सीज़न में लेखन के स्तर पर कमियां हैं और यही कारण है उनका स्क्रीन टाईम कम है और किरदार संघर्ष करता है। पिछले सीज़न जहां नीना गुप्ता का किरदार मंजू देवी प्रधान के रूप में ऊपर उठता दिखता है, इस सीज़न वो किरदार वापस एक मां और पत्नी के बीच झूलता नज़र आता है। हालांकि, कई सीन, ये उम्मीद जगाते हैं कि अब नीना गुप्ता के अंदर का प्रधान जागेगा लेकिन ऐसा होता नहीं है। बात करें दूसरे किरदार रिंकी की तो सान्विका इस किरदार के साथ सीरीज़ को ताज़ा बनाए रखने की सफल कोशिश करती हैं। उनके और जीतेंद्र कुमार के बीच की केमिस्ट्री, सीरीज़ की उत्सुकता बनाए रखती है।

सहायक कास्ट करती है पूरा सहयोग

सहायक कास्ट करती है पूरा सहयोग

वैसे तो ये सीरीज़ मुख्य किरदारों के दम पर ही काफी हद तक सफल होती है। लेकिन बची हुई कसर पूरी करते हैं सीरीज़ की सहयोगी कास्ट। विलेन ना सही पर इस बार सीरीज़ में कुछ शरारती तत्वों की एंट्री भी होती है। पिंटू और उनकी पत्नी के किरदारों में दुर्गेश कुमार और सुनीता राजवर, फुलेरा में सिंहासन पलट करने की फिराक में है और इसके लिए वो हर एपिसोड में एक समस्या खड़ी करने की पूरी कोशिश करते हैं जिसे सुलझाने में ही ज़्यादातर एपिसोड्स निकलते हैं। वहीं एक एपिसोड के लिए सिद्धार्थ के किरदार में सतीश रे गांव और शहरों के बीच का बैलेंस बनाने की कोशिश करते दिखते हैं। MLA के किरदार में पंकज झा की एंट्री प्रभावी है और गांव में वो क्या उथल पुथल करते हैं ये अगले सीज़न में देखना दिलचस्प होगा।

क्या करता है निराश

क्या करता है निराश

पंचायत का सीज़न 2 केवल अपनी गति से निराश करता है। जहां पहला सीज़न हर पंच और वन लाईनर के साथ दिल जीतता था वहीं ये सीज़न डायलॉग्स और लेखन में कहीं पीछे छूट जाता है। यही कारण है कि आठ एपिसोड की इस सीरीज़ में आपको बहुत कम सीन या डायलॉग्स याद रह जाते हैं। इसलिए पूरी कहानी भले ही प्रभावित करे लेकिन कमज़ोर लेखन इसकी गति छूटने पर मजबूर करता है और कहीं ना कहीं, इस वजह से सीरीज़ से थोड़ी निराशा ज़रूर होती है।

क्या करता है खुश

क्या करता है खुश

लेकिन पंचायत का क्लाईमैक्स पूरी सीरीज़ की खामियां भर देता है। इमोशन और ड्रामा से भरा हुआ आखिरी एपिसोड आपकी आंखें नम कर जाता है। परिवार की कमी कैसे कभी आपको गांव में नहीं महसूस होती है और कैसे सुख हो या दुख, पूरा गांव एक परिवार हो जाता है, ये आपको इस आखिरी एपिसोड में भरपूर देखने को मिलता है। पंचायत वो दंतकथाएं हैं जो इस ज़माने के हर शख्स ने किसी बड़े - बुज़ुर्ग से किसी ना किसी गांव - देहात के बारे में सुनी हैं। लेकिन शायद अनुभव ना की हों। उन्हीं दंतकथाओं को जामा पहनाते हैं इस सीरीज़ के डायरेक्टर दीपक कुमार मिश्रा।

कहानी की सुपरहीरो है इसका म्यूज़िक

कहानी की सुपरहीरो है इसका म्यूज़िक

सुपरहीरो फिल्में और कहानियां तो आपने सुनी और देखी ही हैं। सुपरहीरो के पास वो शक्ति होती है बस एक छड़ी घुमाकर दुनिया में सब कुछ ठीक कर देता है। अनुराग सैकिया का म्यूज़िक इस सीरीज़ की वही सुपरहीरो वाली छड़ी है। सारी खामियों को और सारी कमियों को बस इस सीरीज़ का म्यूज़िक छ़ड़ी घुमाकर दूर कर देता है। संगीत शायद इस सीरीज़ का सबसे मज़बूत पक्ष है। सुदीप्त, अतीश, अंकिता और शांतनु का साउंड, कहानी के पकवान में स्वादानुसार नमक वाला काम करता है।

पूरे के पूरे नंबर

पूरे के पूरे नंबर

फुलेरा गांव की इस कहानी को आप पूरे नंबरों से पास कर सकते हैं।प्रियदर्शिनी मुजुमदार के कॉस्ट्यूम और नवीन लोहारा - सायली नायकवडी सिंह की प्रोडक्शन डिज़ाइन फुलेरा का माहौल बनाने में पूरी मदद करती है। कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि आप वाकई किसी गांव के किसी फलाना दिन की कहानी नहीं देख रहे हैं। अमिताभ सिंह के लेंस से जब आप फुलेरा की टूटी सड़कें या फकौली का बाज़ार देखते हैं तो सब कुछ वो गांव की यात्रा वृत्तांत जैसा लगता है जो आपके ज़ेहन में कहीं ना कहीं बसा होगा। हर्षित शर्मा की एडिटिंग कहानी को और कसा हुआ और मज़बूत बनाने की गुंजाइश रखती है। चंदन कुमार की कहानी को आठ एपिसोड की इस सीरीज़ में तब्दील कर टीवीएफ के लिए प्रोड्यूसर किया है अरूणाभ कुमार ने और उनकी टीम कहीं भी आपको निराश नहीं करती है।

सीज़न 3 का भी टीज़र

सीज़न 3 का भी टीज़र

पंचायत का आखिरी सीन, सीज़न 3 की ड्रामा से भरी शुरूआत की नींव रख चुका है। अब देखना है कि इस सीज़न में शौचालय से लेकर गांव की बकरियां और खोई चप्पल ढूंढने के बाद अगले सीज़न में सचिव जी को ये गांव और यहां के लोग कौन से नए रंग दिखाते हैं।

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