बासी और थकी हुई 'ये साली जिंदगी'
निर्देशक - सुधीर मिश्रा
निर्माता- प्रकाश झा
गीतकार- स्वानंद किरकिरे
संगीत - निशांत खान
कलाकार - चित्रांगदा सिंह, इरफान खान, अरुणोदय सिंह, अदिति राव
समीक्षा - पूर्व मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह के पोते अरुणोदय सिंह और नवोदित अभिनेत्री अदिति राव के 22 किसंग सीन्स के चलते चर्चा में आई ये फिल्म अपराध जगत से चुनी गई एक और कथा है। क्राइम और सेक्स पर आधारित ये कहानी सुधीर मिश्रा के प्रयोगधर्मी सारत्तव को खुद में समेटे हुए है। कहानी के हर पहलू पर उनके व्यक्तित्व और इससे पहले बनाई गई फिल्मों की भरपूर छाप दिखाई देती है। सुधीर मिश्रा बॉलीवुड के उन गिने-चुने निर्देशकों में से एक हैं जो फिल्में बनाते समय व्यवसायिकता को भुनाने वाले नुस्खे तो भरपूर इस्तेमाल करते हैं लेकिन उसे फिल्म की कथ्य पर भारी नहीं पड़ने देते। यूं कहें कि फिल्म की आत्मा नई ही होती है।
'ये साली जिंदगी' भी कुछ ऐसी ही कहानी है जिसे अपराध कथा कहा जाए या रोमांस गाथा, ये आपको ही तय करना होगा। फिल्म देख कर राम गोपाल वर्मा की फिल्मों की बेसाख्ता याद आती है। इरफान खान और अरुणोदय सिंह की महबूबा और पत्नी को पाने के लिए लड़ी जा रही अलग-अलग जंग के तार आपस में कब एक-दूसरे की कहानियों से गुंथते हैं, ये ना तो मिश्रा जी ठीक से दिखा पाएं और ना ही उन्होने इसे स्पष्ट करने की कोशिश की है। फिल्म की कहानी में सब कुछ समझने के लिए आपको अपने दिमाग पर लगातार जोर डालना पड़ेगा। हालांकि अगर आप ये कर सकें तो इस कीचड़ भरे समंदर से मनोरंजन के कुछ मोती अपने लिए जरूर चुन सकेंगे।
चित्रांगदा सिंह, सुधीर मिश्रा की पहली पसंद हैं, इसलिए फिल्म में उनका केंद्रीय किरदार नज र आता है। इरफान खान और चित्रांगदा सिंह दोनों ही अपनी भूमिकाओं में खरे उतरे हैं। कहानी के मूड के हिसाब से ही सुधीर ने किरदारों का चयन किया है। अरुणोदय सिंह की बॉलीवुड में यह पहली फिल्म है लेकिन अब तक सिर्फ इसी फिल्म में उनके किरदार को महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। इससे पहले उनकी फिल्म आईं सिकंदर, आएशा और मिर्च। इन सारी ही फिल्मों में अरुणोदय सिंह की भूमिका कुछ खास नहीं थी। फिर भी मिर्च में उनके काम की सराहना की गई थी। उम्मी द है कि ये साली जिंदगी अरुणोदय के करियर की महत्वपूर्ण फिल्म साबित होगी।
गीत स्वानंद किरकिरे ने लिखे हैं जो सुधीर मिश्रा की पटकथा को स्वरों में बेहतर ढंग से बांधने में सक्षम हुए हैं। लेकिन कहानी का बासीपन दर्शकों को रास नहीं आएगा। फिल्म की कहानी ट्रीटमेंट में प्रयोगधर्मी जरूर दिखाई देती है। लेकिन कहानी में वही उकताहट और थकान है जो बॉलीवुड की ज्यादातर ऑफबीट फिल्मों की पहचान है। सुधीर 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' या 'इस रात की सुबह नहीं' का जादू इस फिल्म में नहीं दिखा सके। कहना ना होगा कि अगर आप सुधीर के काम के प्रशंसक हैं तभी इस फिल्म को देखने का जोखिम उठाएं। एक बासी मगर रोमांचक अपराध गाथा है, 'ये साली जिंदगी'।


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