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    'शेरनी' फिल्म रिव्यू- पितृसत्ता के जंगल राज में 'सुपरमैन' बनकर उभरती हैं विद्या बालन

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    Rating:
    3.0/5

    निर्देशक- अमित मसुरकर

    कलाकार- विद्या बालन, नीरज काबी, शरत सक्सेना, विजय राज, बिजेन्द्र काला, मुकुल चड्डा

    प्लेटफॉर्म- अमेज़न प्राइम वीडियो

    "आपसे पहले यहां विद्या मैडम थीं, ऑफिस में सबको टाइट करके रखती थीं, बहुत ही जबरदस्त थीं वो, एकदम सुपरमैन.." विभाग में आए नए अफसर को वहां के मौजूदा अधिकारी चेहरे पर मुस्कार और गर्व के साथ जानकारी देते हैं। इस संवाद तक पहुंचने का सफर कितना महत्वपूर्ण और लंबा रहा, फिल्म में यह देखना काफी दिलचस्प है।

    sherni

    अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई फिल्म 'शेरनी' पर्यावरण से लेकर पितृसत्ता तक के विषय को घेरती है। फैलते क्रंक्रीट के जंगलों के बीच सिकुड़ते हरे वन और उसमें रह रहे पशुओं का संघर्ष, इंसानों और पर्यावरण की एक दूसरे पर निर्भरता, और इन सबसे बीच पितृसत्तात्मक समाज द्वारा निर्धारित सामाजिक बाधाओं के जंगल से गुजरती महिलाएं। वन अधिकारी विद्या विन्सेंट (विद्या बालन) के सफर के जरीए निर्देशक ने सभी पक्षों को समेटने की कोशिश की है।

    कहानी

    कहानी

    6 साल डेस्क के पीछे बैठने के बाद अब विद्या विन्सेंट बतौर संभागीय वन अधिकारी बिजशपुर पहुंची हैं। बिजशपुर के हरे- भरे जंगलों के विस्तृत दृश्य के साथ विद्या का नए अधिकारियों के साथ परिचय होता है। साथ ही मिलती है जिम्मेदारी, एक आदमखोर 'शेरनी' को पकड़ने की, जिसने आस पास के गावों में आतंक मचाया हुआ है। गांव वालों के पास मवेशियों को चारा खिलाने के लिए एक ही क्षेत्र है, जहां हर समय शेरनी के शिकार का खतरा बना रहता है। कई मवेशी और गांव वाले इसमें अपनी जान खो चुके हैं।

    कहानी

    कहानी

    जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, हम देखते हैं कि कैसे विद्या अपनी टीम और स्थानीय सहयोगियों की मदद से पर्यावरण में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती है। विद्या कहती है- "कोई भी शेरनी आदमखोर नहीं, भूखी होती है।" गांव वाले भी पर्यावरण की महत्ता को समझते हैं। जंगल के जानवरों से सतर्क रहने की हिदायत देने आए प्रोफेसर हसन (विजय राज) को गांव का एक बच्चा कहता है- "टाईगर है तभी तो जंगल है, और जंगल है तभी तो बारिश है, बारिश है तो पानी है और पानी है तो इंसान है.."

    लेकिन विद्या के इस मिशन के रास्ते में कई बाधाएं हैं। वह शिकारियों, गांव की राजनीति, विभागीय राजनीति, पितृसत्ता सोच के साथ लगातार लड़ती है। वह अंतर्मुखी है, लेकिन कमजोर नहीं.. शायद कुछ कुछ जंगल के शेरनी जैसी। शेरनी को अपना रास्ता मालूम है, लेकिन मनुष्यों द्वारा निर्मित बाधाएं हैं। वहीं, विद्या के सामने सामाजिक बाधाएं हैं। क्या 'शेरनी' इन बाधाओं से पार जा पाएगी? इसी के इर्द गिर्द घूमती है फिल्म की कहानी।

    निर्देशन

    निर्देशन

    'न्यूटन' फेम अमित मसुरकर ने शेरनी का निर्देशन किया है। फिल्म का विषय इतना तगड़ा था कि इससे अपेक्षाएं भी काफी बढ़ चुकी थीं। एक इंफोटेनमेंट के नजरीए से फिल्म कसौटी पर पूरी तरह से खरी उतरती है। लेकिन एंटरटेन करने में थोड़ी पीछे छूटती है। जंगल और इंसानों की एक दूसरे पर निर्भरता और संघर्ष, वनों से जुड़ी राजनीति, विकास की वजह से पर्यावरण हो रही हानि से लेकर पितृसत्ता के घने जंगल से होकर गुजरती महिलाओं को दिखाने की कोशिश की गई है। निर्देशक कुछ हद तक सफल भी रहे हैं। लेकिन फिल्म की लेखन में कसावट की कमी दिखी है।

    कुछ दृश्य बहुत शानदार बन पड़े रहे हैं। एक दृश्य में विद्या की सास हंसते हुए उससे कहती है- "अच्छा किया बिल्ली पाल लिया, प्रैक्टिस हो जाएगी फ्यूचर के लिए।" जिसके जवाब में विद्या कहती है- "कैसी प्रैक्टिस मम्मी? मेरा टफी (बिल्ली) बहुत इंटिपेंडेंट है। ना डायपर, ना स्कूल फील, ना कोई झंझट।" इस पर सास हंसते हुए बेटे से कहती है- "तुम्हारी वाइफ ना बहुत टफ है.." जिस चतुराई के साथ निर्देशक ने यह सीन घुसाया है, वह तारीफ के काबिल है।

    अभिनय

    अभिनय

    कोई शक नहीं कि यह फिल्म का सबसे दमदार पक्ष है। विद्या विन्सेंट के किरदार में विद्या बालन ने शानदार काम किया है। उनके एक- एक भाव आपको ध्यान खींचते हैं। खुशी, हैरानी, गुस्सा, बेबसी, दुख.. हर भाव के जरीए वह दर्शकों से कनेक्ट करती हैं। लेकिन फिर भी हम कहना चाहेंगे कि विद्या जिस स्तर की अभिनेत्री हैं, निर्देशक उनके किरदार को थोड़ी और मजबूती दे सकते थे। बहरहाल, सहायक किरदारों में विजय राज, नीरज काबी, बिजेन्द्र काला, शरत सक्सेना खूब जमे हैं। निर्देशक ने सभी सहायक किरदारों को उचित ग्राफ दिया है, जिसे सबसे ईमानदारी से निभाया है।

    तकनीकी पक्ष

    तकनीकी पक्ष

    निर्देशन के अलावा फिल्म के संवाद पर भी अमित मसुरकर ने काम किया है। यहां उनका साथ दिया है यशस्वी मिश्रा ने। फिल्म की कहानी और पटकथा लिखी है आस्था तिकु ने। इन सभी पक्ष में फिल्म काफी दमदार हो सकती थी, लेकिन पटकथा में रोमांच की कमी खलती है। यह एक ऐसी फिल्म है, जो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचनी चाहिए। अपनी कहानी में फिल्म पर्यावरण और पितृसत्ता से जुड़ी कई बातें कहना चाहती है। लेकिन वास्तविकता से जोड़े रखने की कोशिश में यह आम दर्शकों से दूर जाती है। कई सवाल, कई दृश्य दर्शकों पर छोड़ दिये गए हैं। बहरहाल, राकेश हरिदास की सिनेमेटोग्राफी दिल जीतती है। जंगल और गांव के बीच घूमता उनका कैमरा बिना संवाद के भी कहानी कहता है। फिल्म की एडिटिंग की है दीपिका कालरा ने, जो कि अच्छी है। हालांकि फिल्म को कुछ मिनट और छोटा किया जा सकता था।

    क्या अच्छा, क्या बुरा

    क्या अच्छा, क्या बुरा

    फिल्म शुरु से लेकर अंत तक एक ही लय में चलती है और यही फिल्म की खासियत भी है और कमजोरी भी। अंदर हरे घने वन के बीच शेरनी और बाहर पितृसत्ता के घने जंगल के बीच एक महिला अफसर.. दोनों के बीच के संबंध को निर्देशक ने बेहतरीन दर्शाया है। फिल्म कुछ हिस्सों में धीमी चलती है और दोहराती हुई भी लगती है, लेकिन विद्या बालन समेत सभी कलाकारों ने इतना उम्दा काम किया है कि आपकी नजर नहीं हटेगी। फिल्म का सबसे अच्छा पक्ष इसके कलाकार और इसका विषय है। जो पक्ष परेशान करती है वो है लेखन। चूंकि विषय इतना बेहतरीन है कि इसे बहुत ज्यादा रोमांचक बनाया जा सकता था, लेकिन निर्देशक ने इसे इंफोटेनमेंट की तरह प्रस्तुत किया है।

    देखें या ना देखें

    देखें या ना देखें

    ये फिल्म विद्या बालन की सर्वश्रेष्ठ नहीं है, लेकिन कोई शक नहीं कि ये उनकी बेहतरीन फिल्मोग्राफी में शामिल होने योग्य है। सीधी और स्पष्ट कहानी के साथ दमदार कलाकारों से लैस फिल्म 'शेरनी' को आप एक बार जरूर देखना चाहेंगे। फिल्मीबीट की ओर से शेरनी को 3 स्टार।

    English summary
    Directed by Amit Masurkar, the film Sherni is laced with satire on social barrier set by the patriarchal society. Film stars Vidya Balan in the lead, with mix of actors like Sharad Saxena, Mukul Chaddha, Vijay Raaz, Ila Arun, Brijendra Kala and Neeraj Kabi in key roles.
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