REVIEW: मज़ेदार.. लेकिन गालियों से भरपूर है 'सात उच्चके' की कहानी
मनोज बाजपेयी, केके मेनन, विजय राज़ स्टारर फिल्म सात उच्चके का रिव्यू पढ़े यहां। फिल्म के निर्देशक संजीव शर्मा हैं।
फिल्म के डॉयलोग्स में पुरानी दिल्ली की छाप साफ सुनाई देगी, खासकर गालियों में। खैर, जब एक साथ स्क्रीन पर मनोज बाजपेयी, केके मेनन, विजय राज और अनुपम खेर हों, तो आप सिर्फ और सिर्फ अभिनय की गहराई में ही डूबते हैं। निर्देशक ने अपने कास्ट और संवाद पर खासा ध्यान दिया है।
हालांकि फिल्म की शुरुआत में आप ध्यान देंगे कि कुछ शब्दों को mute किया गया है। लेकिन फिर शायद सेंसर बोर्ड ने रहने दिया.. क्योंकि यदि पूरी फिल्म में अपशब्दों को mute किया जाता तो, सात उच्चके एक मौन फिल्म होती।

कहानी
कहानी है पुरानी दिल्ली के निचले तबके के 'सात उचक्कों' की। जिनकी जिंदगी में सब सही चल रहा होता है, छोटी मोटी चोरियों से इनका गुजर बसर होता है.. लेकिन फिर इन्हें कुछ बड़ा करने की सूझती है। इन सात उच्चकों का हेड होता है- पप्पी (मनोज बाजपेयी).. इनकी मुलाकात होती है बच्ची (अन्नू कपूर) से.. जहां से कुछ बड़ा लूटने का प्लान शुरु होता है।
इस कोशिश में सात उच्चकों से गलतियां भी होती हैं और वे लगातार फंसते चले जाते हैं। उनके निजी हित और स्वार्थ भी यहां शामिल हो जाते हैं। वहीं, साथ ही शुरु हो जाती है प्रेम कहानी.. पप्पी और सोना(अदिति शर्मा) की.. फिल्म में भले ही ये किरदार चोर बने हैं, लेकिन कहीं ना कहीं इनकी कुछ मासूमियत पर आपको हंसी भी आएगी।
निर्देशन
निर्देशक संजीव शर्मा ने सात उचक्को को अच्छे से संभाला है। फिल्म हल्की फुल्की, गुदगुदाने वाली है, लेकिन ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाएगी। दिल्ली की तंग गलियों को बड़े पर्दे पर सफलता से लाए हैं।
तकनीकी पक्ष
फिल्म का कैमरा वर्क कमाल का है। वहीं, साउंड डिजाइन पर भी काफी बेहतरीन तरीके से काम किया गया है।
अच्छी बात
फिल्म की बेहतरीन कास्ट, कहानी और कहानी कहने का अंदाज.. काफी दिलचस्प है। वहीं, पुरानी दिल्ली की झलक पाना चाहते हैं तो यह फिल्म आपके लिए है।
बुरी बात
फिल्म एक खास दर्शक वर्ग के लिए ही है। कई जगहों पर फिल्म आपको बोर कर सकती है। खासकर सेकेंड हाफ में। वहीं, फिल्म का क्लाईमैक्स भी काफी कमजोर रहा है।
देंखे या नहीं
यदि आपको हल्की- फुल्की कॉमेडी पसंद है, थोड़ी गालियों के साथ.. तो फिल्म एक बार तो जरूर देखी जा सकती है।


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