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    हॉट एंड स्पाइसी 'क्रूक'

    By अंकुर शर्मा
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    crook
    निर्देशक : मोहित सूरी
    निर्माता : मुकेश भट्ट
    संगीत : प्रीतम चक्रवर्ती
    कलाकार : इमरान हाशमी, नेहा शर्मा, अर्जन बाजवा
    रेटिंग: 2.5/5

    समीक्षा : क्रूक इट्ज गुड टू बी बैड। जीं हा यही नाम है भट्ट कैंप की फिल्म का जो आज प्रदर्शित हुई है। जिन्दीग में कभी कभी लोग सफलता किसी भी भी कीमत पर चाहते हैं। बॉय हुक आर बॉय क्रूक लोगों को तरक्की चाहिएय यही दिखाया गया है फिल्म क्रूक में। फिल्म में मूलत: एक समस्या को दिखाया गया है, और वो है आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हुए नक्सलीय हमले। ताली एक नहीं दो हाथों से बजती है, इसी को माना है डायरेक्टर मोहित सूरी ने और हमले का जिम्मेदार आस्ट्रेलिया को नहीं बल्कि भारत को बताते हुए एक अच्छा काम किया है।

    वैस फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी है, इसलिए कहीं-कहीं आप बोर भी हो सकते हैं। भट्ट कैंप हमेशा एक स्माल बजट पर काम करते हुए एक समस्या को उजागर करते हैं, और वो ही उन्होंने यहां भी किया है। इमरान हाशमी का किरदार आपक उनकी ही फिल्म जन्नत की याद दिलाता है। नेहा शर्मा सुंदर और सेक्सी नजर आयीं हैं। फिल्म में उनके लिए कुछ खास नहीं है, लेकिन उन्होंने प्रेमिका को रोल बखूबी निभाया है। आस्ट्रेलियन बाला के साथ इमरान के सेक्स सीनों की भरमार है, कुल मिला कर इस फिल्म में सारे मसाले मौजुद हैं। अर्जन बाजवा उम्मीद जगाते हैं, बेहतरीन अभिनय है उनका। पंजाबी गीत छोड़कर फिल्म का संगीत औसत हैं। कुल मिलाकर कर कहा जा सकता है कि फिल्म क्रूक एक एवरेज मूवी है। फिल्म में हर तरह से हॉट मसाले मौजुद है। खासकर युवाओं के लिए बनायी गई ये फिल्म पूरी तरह हॉट एंड स्पाइसी है।

    पढ़े : 'क्रूक' से 'सेक्स सीन' नहीं हटेंगे : महेश भट्ट

    कहानी : जय (इमरान हाश्मी) को लगता है की हर चीज़ में एक पैंच होता है तो फिर उसे सीधे तरीके से क्यों किया जाए। यानी वो किसी भी काम को सही तरीके से करने में यकीन नहीं रखता। उसकी चाहत करोड़पति बनने की है और इसके लिये उसे कोई भी रास्‍ता अपनाना मंजूर है। फिर चाहे वो गलत हो या सही इस बात की उसे कोई परवाह नहीं है। नेहा शर्मा (सुहानी) एक भारतीय छात्रा की भूमिका में हैं जो ऑस्‍ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हो रहे नस्लीय हमलों के खिलाफ आवाज़ उठाती है। इमरान को नेहा से प्यार हो जाता है। इसी दौरान भारतीय और ऑस्ट्रेलियन छात्रों के दो गुटों में झगड़ा हो जाता है।

    अर्जुन बाजवा भारतीय गुट के लीडर बने हैं। उनकी कोशिश मेलबर्न शहर में भारतीय संस्‍कृति को बसाने की है। वहीं यहीं मोहित सूरी ने परंपरा तोड़ने का प्रयास किया है। वे लीक पर चलकर भारतीयों को पूरी तरह से सही दिखाने से बचे हैं और उन्‍होंने इस हालात के लिये भारतीय और ऑस्‍ट्रेलियाई दोनों छात्रों को बराबर रूप से गलत दिखाया है, हालांकि यह एक बहुत बड़ा खतरा है, लेकिन यही फिल्‍म का सबसे तगड़ा प्‍वाइंट भी है। हां यहां जय दोनों गुटों में सुलह कराने की कोशिश करता नजर आता है।

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