रण: मीडिया का कड़वा सच

By Ajay Mohan

Rann
फिल्‍म - रण
निर्देशक - राम गोपाल वर्मा
स्टार कास्ट - अमिताभ बच्‍च्‍न, सुदीप, रितेश देशमुख, मोहनीश बहल, रजत कपूर, परेश रावल, नीतू चंद्रा, सुचित्रा कृष्‍णमूर्ति, गुल पनाग
निर्माता - शीतल विनोद तलवार, मधु तलवार
रिलीज डेट - 29 जनवरी 2010
रेटिंग मीटर - 3/5

समीक्षा- बॉलीवुड के सुपर स्‍टार अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍म रण जिसका आपको बेसब्री से इंतजार था वो पर्दे पर आ गई है। मीडिया पर बनी इस मल्‍टी स्‍टार फिल्‍म में राम गोपाल वर्मा की मेहनत साफ झलकती है। आप उन्‍हें उनकी इस मेहनत के लिए जरूर सराहेंगे। हो सकता है फिल्‍म की घिसीपिटी कहानी शायद आपको पसंद नहीं आए, लेकिन जिन्‍हें गंभीर मुद्दों पर फिल्‍में देखना पसंद है, उन्‍हें यह फिल्‍म बहुत अच्‍छी लगेगी। क्‍योंकि रण आपको कहीं न कहीं सोचने पर जरूर मजबूर कर देगी। यह फिल्‍म उन लोगों के लिए बिलकुल नहीं है, जो आमतौर पर फिल्‍मों में मसाला ढूंढ़ते हैं।

रण में मीडिया के उन बड़े खेलों को प्रदर्शित करने के प्रयास किए गए हैं, जो मीडिया जगत में होते हैं। वो खेल जिनकी कमान बड़ी हस्तियों के हाथ में होती है। यही इस फिल्‍म का मुख्‍य आकर्षण भी बने हैं। फिल्‍म ने टीवी चैनलों के न्‍यूज़ रूम के अंदर ही नहीं बल्कि रूम के पीछे भी झांकने के सफल प्रयास किए हैं। इसमें दिखाया गया है कि आज का मीडिया किस प्रकार राजनेताओं और उद्योगपतियों के हाथों की कठपुत्‍ली बनता जा रहा है। यही नहीं मीडिया जगत के दिग्‍गजों, राजनेताओं और उद्योगपतियों की सांठ-गांठ के चलते किस तरह कोई साधारण खबर बड़ी खबर बन जाती है, यह दिखाया गया है। इसके अलावा टीआरपी बटोरने के लिए न्‍यूज़ चैनल किस हद तक गिर सकते हैं इसका खुलासा भी फिल्‍म में किया गया है।

रण में दिखाया गया है कि आज हर क्षेत्र में बुरे और अच्‍छे दोनों प्रकार के लोग होते हैं। रण ने खास तौर से मीडिया की उस परत को कुरेदा है, जिसके नीचे कई खूंखार कीड़े छिपे रहते हैं। ये कीड़े सिर्फ पैसा बनाने के लिए खबर का इस्‍तेमाल करते हैं। यही नहीं सफलता की सीढि़यां चढ़ने के लिए किस तरह मीडिया कर्मी खबर को तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं। इस बात पर भी फोकस किया गया है।

समाज के विकास में मीडिया की भूमिका हमेशा से अहम रही है। यही कारण है कि रण एक गंभीर फिल्‍म मानी जा रही है। राम गोपाल वर्मा भी यह जानते हैं कि यह समय की डिमांड है। रण देखते समय आपको राम गोपाल वर्मा की ही 'सरकार' याद आएगी। फिल्‍म के कई अंश मिलते जुलते हैं, लेकिन दोनों का ट्रैक बिलकुल अलग हैं। हालांकि दोनों फिल्‍में गंभीर मुद्दे पर बनी हैं। यह फिल्‍म भी दर्शकों को कुर्सी से बांध कर रखने में सफल रहेगी।

फिल्‍म के किरदारों की बात करें तो अमिताभ बच्‍चन ने एक निजी न्‍यूज़ चैनल इंडिया 24/7 के संस्‍थापक विजय हर्षवर्धन की भूमिका निभाई है। ये वो चैनल है, जो पत्रकारिता के मूल्‍यों पर चल रहा है। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि पैसा कमाने के लिए आज तमाम चैनल नैतिक मूल्‍यों को ताक पर रख चुके हैं, लेकिन इंडिया 24/7 ऐसा नहीं है। शायद यही कारण है कि घाटे में चल रहा यह चैनल अपने अस्तित्‍व को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।

विजय हर्षवर्धन के पुत्र जय (सुदीप) को यह बर्दाश्‍त नहीं होता है कि उसके प्रतिद्वन्‍द्वी मोहनीश बहल का चैनल उससे आगे निकल चुका है। एक समय बाद उसे अपने पिता के आदर्श और पत्रकारिता के मूल्‍य बेकार लगने लगते हैं। इसी दौरान एक भ्रष्‍ट नेता मोहन पाण्‍डेय (परेश रावल) इंडिया 24/7 को अपने हित के लिए इस्‍तेमाल करने लगता है, वो भी हर्षवर्धन के दामाद नवीन (रजत कपूर) के माध्‍यम से। नवीन एक ऐसा व्‍यक्ति है, जिसे लगता है कि उसका करियर सुरक्षित नहीं है। लेकिन वो देश का सबसे बड़ा उद्योगपति बनना चाहता है। इसी चाहत में वो हर्षवर्धन के पुत्र जय को पाण्‍डेय के साथ जोड़ लेता है। आगे क्‍या होता है, इसके लिए आप फिल्‍म जरूर देखने जाएं। क्‍या हर्षवर्धन भी अपने चैनल की तरक्‍की के लिए पाण्‍डेय से हाथ मिला लेता है, या फिर वो अपने बेटे व दामाद की करनी को बर्दाश्‍त नहीं कर पाता है। या इंडिया 24/7 भी अन्‍य चैनलों की तरह स्‍तरहीन हो जाता है। इन सभी सवालों के जवाब ही आपको हॉल में कुर्सी से बांध कर रखेंगे।

फिल्‍म में अभिनय की बात करें तो राम गोपाल वर्मा ने कहीं न कहीं अभिनेताओं के चयन में गलती की है। फिल्‍म में सिर्फ अमिताभ बच्‍चन ही दमदार रोल में दिखे हैं। परेश रावल और अमिताभ के अलावा कईयों ने अपना किरदार निभाने में पूरी ईमानदारी नहीं दिखाई है। शायद यही फिल्‍म को पीछे खींचती है। फिल्‍म की पटकथा काफी अच्‍छी है। कहीं भी भटकाव जैसा नहीं दिखा है। फिल्‍म के बीच में रितेश देशमुख के कुछ सीन बोर करने वाले हैं, लेकिन फिल्‍म के बेहतरीन अंत इन सबकी भरपाई कर देता है।

फिल्‍म के डायलॉग दमदार हैं, सिनेमाटोग्राफी बेहतरीन है और संपादन भी काफी अच्‍छे ढंग से किया गया है। बैकग्राउंड म्‍यूजि़क भी काफी अच्‍छा है, जो कई सीन को दमदार बनाने में सफल रहा है। अमिताभ ने एक बार फिर बेहतरीन अभिनय दिया है। खास तौर से वो सीन जिसमें उन्‍होंने एक भाषण दिया है।

जिस ढंग से उन्‍होंने वो भाषण दिया है वाकई काबिल-ए-तारीफ है। मोहनीश बहल, सुदीप और रजत कपूर ने भी अपना किरदार पूरी ईमानदारी के साथ निभाया है। वहीं परेश रावल के अभिनय का भी कोई जोड़ नहीं है। रितेश देशमुख की बात करें तो पिछली फिल्‍मों की तुलना में उनके अभिनय में काफी इंप्रूवमेंट हुआ है। वहीं गुल पनाग और सीमोन सिंह का अभिनय ठीक-ठाक रहा, जबकि सुचित्रा कृष्‍णमूर्ति ने काफी अच्‍छा काम किया है। वहीं नीतू चंद्रा अपने किरदार को ठीक ढंग से नहीं निभा पायीं हैं। राजपाल यादव एक बार फिर लोगों को गुदगुदाने में सफल रहे हैं।

कुल मिलाकर रण एक बेहतरीन फिल्‍म है। गंभीर मुद्दे पर बनी यह फिल्‍म आज की जरूरत है, समाज को एक दिशा प्रदान करती है और हमसे, आपसे और सभी से जुड़ी है। यह फिल्‍म आपको जरूर देखनी चाहिए। यह निश्‍चित ही आपको वर्तमान मीडिया की भूमिका के बारे में सोचने पर मजबूर कर देगी।

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