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    रक्तचरित्र समीक्षा भाग-2: नरसंहार की नई गाथा

    By Jaya Nigam
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    रेटिंग मीटर : 3/5

    समीक्षा - रक्तचरित्र अपने नाम के अनुरूप बॉलीवुड में निर्दयता के नये मापदंड गढ़ रही है। रक्तचरित्र के पहले भाग में रामू ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के खून में डूबी राजनीति के असली चरित्र को उजागर किया था। फिल्म का दूसरा भाग खूनी राजनीति के निर्दयी और भ्रष्ट चरित्र की कहानी पेश करता है। हिंदी सिनेमा हमेशा ही हिंसा और खूनी दृश्यों से सम्मोहित होता आया है। रक्तचरित्र का दूसरा भाग भी पहले भाग की कहानी को और अधिक वीभत्स अंदाज में पेश करता है। पारिवारिक दुश्मनी में राजनीति पिरोती ये फिल्म दर्शकों को कितना लुभा पाएगी ये कहना मुश्किल है।

    <strong>रक्तचरित्र के पहले भाग की फिल्म समीक्षा </strong>रक्तचरित्र के पहले भाग की फिल्म समीक्षा

    सिनेमा हॉल के बड़े पर्दे पर लाल रंग में लिखी गई इबारत को देखने, सुनने और महसूस करने वालों की चाह रखने वालों के लिए रक्तचरित्र एक दूसरा सुनहरा मौका है। दूसरे भाग में पहले भाग की तरह खूनी तरावट तो है ही इसके अलावा कहानी का निष्कर्ष भी है। पहला भाग देखने वालों के मन में ये जानने की इच्छा अवश्य होगी कि प्रताप जब भारतीय रॉबिनहुड में पूरी तरह बदल जाता है तो उसका हश्र क्या होता है?

    दर्शकों को लुभाने के पर्याप्त तत्व रखने वाली ये फिल्म पहले भाग से बेहतर बनी है। हालांकि फिल्म एक नाटकीय घटनाक्रम से अधिक कुछ भी नहीं है फिर भी रामू की ज्यादातर फिल्मों की तरह इस फिल्म से भी दर्शक खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है। जबकि फिल्म देखते हुए भी वह इस बात से पूरी तरह वाकिफ रहता है कि ये सिर्फ कल्पना है, उसके बावजूद वह कहानी में खो जाता है। रामू अपनी दोनों फिल्मों को एक सूत्र में पिरोने में सफल रहे हैं।

    रक्तचरित्र में रामू का काम देखने के बाद ये कहा जा सकता है कि उन्होने हिंसक कहानियों पर विशेषज्ञता हासिल कर ली है। वह दूसरी कहानियों के मुकाबले अपराध गाथाओं को बेहतर तरीके से सिनेमाई पर्दे पर साकार करते हैं। कंपनी और सरकार ने उन्हे विषय पर गहराई और हॉरर फिल्मों ने क्राइम स्टोरी में नाटकीयता लाना सिखा दिया है। रक्तचरित्र भाग 2 पहले भाग को समेटते हुए रामू की अन्य फिल्मों की तरह समाज का काला सच दर्शकों के सामने लाने का दावा करते हुए प्रतीत होती है।

    फिल्म की कहानी में कोई दम नहीं है इसके बाद भी फिल्म का आकर्षण बना रहता है। यहां रामू का चमत्कार दिखता है। जैसे भंसाली अपनी फिल्मों में संवादों से ज्यादा फिल्म के कलात्मक सेट और संवेदनशीलता से खुद को बयान करते हैं, उसी तरह रामू उनके ठीक विपरीत आक्रामक दृश्यों और अपाराधिक चरित्रों की संवेदनाओं से दर्शकों को प्रभावित करने की कोशिश में रहते हैं। रामू की इस फिल्म को पहले भाग की तरह 5 में से 3 अंक दिये जा सकते हैं।

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