Pihu Movie Review: खतरों के बीच अकेली बच्ची, हिला कर रख देने वाले सीन, इसलिए जरूर देखें ये फिल्म
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एक महिला बेड पर बेहोश पड़ी है। घर में मौजूद दो साल की बच्ची, पीहू (मायरा विश्वकर्मा) ये मानती है कि उसकी मम्मी सो रही और अपने डेली रूटीन करने की खुद ही कोशिश करने लगती है। पीहू अपनी मम्मी को जगाने की कोशिश करती है, उसे भूख लगती है तो वो खुद ही माइक्रोवेव ऑन करती है और खुद को फ्रिज में लॉक भी कर लेती है। फिल्म में ये सारे सीन चल रहे हैं और पीहू को खतरे आस-पास देखकर ऑडिएंस के तौर पर आप खुद की सांस रुकी हुई पाते हैं।
विनोद कापरी की पीहू एक ऐसी ऊंची बिल्डिंग की कहानी है जहां एक दो साल की बच्ची घर में अकेली रह जाती है.. न कोई फैमिली मेंबर और न ही कोई देखभाल करने वाली नौकरानी। वो दो साल की बच्ची जब कुछ समझ नहीं पाती तो नासमझी में ऐसे-ऐसे काम करने लगती है कि ऑडिएंस का कलेजा मुंह को आ जाता है।

पीहू जब दोस्तों से मिलने के लिए बालकनी की रेलिंग क्रॉस करने की कोशिश करती है तो देखने वालों के पसीने छूट जाते हैं। वहीं पीहू आपको कई ऐसे धड़कनें रोक देने वाले सीन देती है। इस फिल्म में दिखाए जाने वाला एक-एक सीन हर पेरेंट्स के लिए के लिए किसी बुरे सपने की तरह है। इतनी छोटी बच्चीकी शानदार परफॉर्मेंस देखकर आप भी चौंक जाएंगे और इसके लिए विनोद कापरी को तारीफें मिलनी चाहिए।
वहीं दूसरी तरफ फिल्म में जितना कुछ दिखाया गया वो सब हमें पहले ही ट्रेलर में पता चल चुका है। हालांकि कुछ शानदार सीन्स फिल्म में देखने लायक हैं। फिल्म एक-एक सीन को पूरे सब्र के साथ देखने हर किसी के बस की बात नहीं है। जहां पर भी नैरेटिव ढ़ीला पड़ता है या रिपीट होता मालूम होता है वहीं पर दो साल की पीहू अपनी मासूमियत से संभाल लेती है।
इस फिल्म के जरिए मायरा विश्वकर्मा के तौर पर ऑडिएंस को एक ऐसी स्टार मिलती है जो इतनी कम उम्र में भी शानदार परफॉर्मेंस से एक-एक सीन में जान डाल देती हैं। पहले फ्रेम से लेकर आखिर तक मायरा को ऑडिएंस बस देखती ही रह जाती और फिल्म खत्म होने के बाद भी उनका चेहरा नहीं भूलता। मायरा का एक-एक इमोशन हंसना, रोना या फिर बातें सीन को और भी बेहतरीन बना देता है। विनोद कापरी ने भी शानदार तरीके से फिल्म में भयावह सीन्स डाले हैं।
अपने निर्देशन के जरिए डायरेक्टर आज के वक्त पर न्यूक्लियर लाइफस्टाल और अर्बन रिलेशनशिप के संघर्ष को बारीकी से दिखाने की कोशिश करते हैं। शानदार तरीके से गढ़ी गई ये फिल्म फिर भी सही मैसेज देने में नाकामयाब होती है।
फिल्म के सीन की फ्रेमिंग ठीक-ठाक है। वहीं एडिटिंग भी अच्छी है। बैकग्राउंड स्कोर भी फिल्म की थीम के साथ सटीक बैठता है।
मायरा विश्वकर्मा की प्यारी और हिलाकर रख देने वाली परफॉर्मेंस के लिए पीहू जरूर देखने जाएं। विनोद कापरी ने एक-एक सीन ऐसा शानदार रखा है कि ऑडिएंस पलकें भी नहीं झपका पाती। छोटी सी उम्र में भी मायरा का टैलेंट किसी मंझे हुए एक्टर से कम नहीं है। आपको बार-बार बस इस बच्ची को देखने का मन करेगा। हमारी तरफ से इस फिल्म को 3 स्टार।


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