Missing Review: दिलचस्प कहानी, दमदार कास्ट लेकिन फिर भी कुछ तो 'मिसिंग' है

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Missing Movie Review: Manoj Bajpayee | Tabu | Annu Kapoor | FilmiBeat

Rating:
2.0/5
Star Cast: तब्‍बू, मनोज बाजपेयी, अन्नू कपूर
Director: मुकुल अभ्यंकर

मिसिंग एक गुस्सैल इंवेस्टिगेशन ऑफिसर का किरदार निभा रहे अनु कपूर अपने जूनियर को कहते हैं 'बहुत लूपहोल्स हैं'.. कुछ ऐसा ही ये फिल्म आपको शुरूआत से आखिर तक महसूस करवाती है। मनोज बाजपेयी और तब्बू स्टारर ये फिल्म इंटरेस्टिंग बेस और दमदार कास्ट के बावजूद एक शानदार सस्पेंस थ्रिलर नहीं बन पाती। दिलचस्प मोड़ से शुरू होने वाली इस फिल्म में लॉजिक अचानक ही गायब हो जाता है और आगे क्या होने वाला है इसका अंदाज पहले ही होने लगता है। फिल्म में ट्विट काफी जल्दी और तेजी से दिखा दिया गया और आपको पता चलता है कि बिना लॉजिक के आपको भटकाने के लिए ही फिल्म में बहुत कुछ दिखा दिया गया था।

प्लॉट की बात करें तो मिसिंग की शुरूआत होती है बीवी से झूठ बोलते सुशांत (मनोज बाजपेयी) से, जिसी पत्नी उसके महिलाओं से संबंधों को लेकर अपसेट है और उसके साथ बिजनेस ट्रिप पर मॉरीशस जाना चाहती है। अचानक उसके पैरों के पास एक टॉय कार आती है और वो एक बच्चे से बात करने लगता है कि मम्मी-पापा झगड़ा नहीं कर रहे, बल्कि ये तो एक गेम खेल रहे हैं।

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वहीं फिल्म के अगले सीन में सुशांत एक शिप से उतरता हुआ दिखता है, उसके साथ में एक महिला है जिसका नाम अर्पणा (तब्बू) है। ये महिला एक बच्चे को गोद में लिए है जो कि कंबल में लिपटा हुआ है। ये कपल एक पोर्ट लुईस के एक शानदार रिजॉट में चेकइन करता है। उनकी तीन साल की बेटी तितली को तेज बुखार है और वो अर्पणा की गोद में ही सोई रहती है।

इसके बाद शुरू होता है वारदातों का सिलसिला, अगली सुबह अर्पणा को पता चलता है कि तितली अपने कमरे से गई है। जहां एक तरफ अर्पणा पागल हो जाती है, वहीं दूसरी तरफ सुशांत को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता बल्कि उसे अपनी और रिजॉट के रेप्यूटेशन की फिक्र होती है। अपनी खोई हुई बेटी को ये कपल हर जगह खोजने की कोशिश करता है लेकिन कोई फायदा नहीं होता। आखिरकार अर्पणा को पुलिस बुलानी ही पड़ती है।

अब एंट्री होती है पुलिस अधिकारी राम खुलावन बुद्धू aka देसी शर्लाक होल्म्स की, जो मौका मिलते ही फ्रेंच के शब्द बोलने से नहीं चूकता। वहीं जल्द ही सुशांत अपने कारनामों को सही बताने के लिए झूठ बोलने का सिलसिला शुरू करता है। लेकिन इंतजार करें, क्योंकि जो दिख रहा है सच्चाई उससे काफी दूर है।

मुकुल अभ्यंकर के हाथ में एक जबरदस्त कॉन्सेप्ट था लेकिन उनका कमजोर और बेहद खराब निर्देशन इस फिल्म को काफी निराशाजनक बनाकर छोड़ देता है। एक समय के बाद प्लॉट काफी बेहूदा और बेढंगा साबित होता जाता है। फिल्म धीमी पड़ जाती है और फिल्म से थ्रिल भी जाता रहता है, ऐसे में प्लॉट भी बकवास जो जाता है। वहीं इन सबके साथ-साथ फिल्म का घटिया क्लाइमैक्स बेहद निराशाजनक है।

परफॉरमेंस की बात करें तो, मनोज बाजपेयी अपने कैरेक्टर में एकदम फिट बैठे हैं। वे आपको कई जगहों पर अपने अजीब सी हरकतों की वजह से आपको सकते में भी डालने में कामयाब होंगे। वहीं कहीं-कहीं मनोज फिल्म कौन की याद भी दिलाते हैं।

वहीं तब्बू इस फिल्म में सबसे ज्यादा शानदार लगी हैं। जहां वे अपने कैरेक्टर में फिट बैठी हैं वहीं वे अपने कैरेक्टर की मिस्ट्री को भी शानदार तरीके से निभा पाई हैं।
वहीं अनु कपूर ने निराश किया है। फिल्म में सस्पेंस क्रिएट करने के बजाए वे मात्र एक मजाकिया कैरेक्टर बनकर रह गए हैं।

सुदीप चैटर्जी की शानदार सिनेमैटोग्राफी ने कमाल कर दिया है। वहीं श्री नारायण सिंह की एडिटिंग ठीक-ठाक है।
अब बात करें पूरी फिल्म की तो मुकुल अभ्यंकर की मिसिंग मनोज बाजपेई और तब्बू की शानदार परफॉर्मेंस के चलते वन टाइम वॉच है। इन दोनों ने फिल्म के एक-एक सीन में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। फिल्म ऑडिएंस को स्क्रीन से चिपकाए नहीं रख पाती है। जिसका कारण मिसिंग थ्रिल्स है। इस हफ्ते अगर आपके पास बहुत सारा खाली वक्त है तो ये फिल्म देखने जाएं।

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