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Review - अच्छी कोशिश लेकिन प्रभावित नहीं कर पाई 'इंदु सरकार'

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2.0/5

कास्ट- कृति कुल्हरी, तोता रॉय चौधरी, नील नीतिन मुकेश, अनुपम खेर
डायरेक्टर - मधुर भंडारकर
प्रोड्यूसर - भंडारकर एंटरटेनमेंट, भरत शाह
लेखक - मधुर भंडारकर
शानदार पॉइंट - कृति कुल्हरी 
निगेटिव पॉइंट - विषय के लिए सतर्क दृष्टिकोण, परिप्रेक्ष्य की कमी
शानदार मोमेंट - इंदु ( कृति कुल्हरी) और उसके पति (तोता रॉय चौधरी) के बीच वैवाहिक कलह काफी अच्छे से दिखाया गया है।

प्लॉट

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स्क्रीन पर फिल्म के टाइटल के साथ लिखा गया है "1975:इमरजेंसी", इसके बादे खाली इंडियन एक्स्प्रेस के खाली संपादकीय को दिखाया गया है। इंदु सरकार की शुरूआत एक क्रूर सीन से होती है जहांपंजाब हरियाणा के बॉर्डन स्थित मुबानपुर गांव में जबरदस्ती पुरूषों की नसबंदी की जा रही होती है। ये विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के काले अध्याय की झलक भर है। इसके अलावा एक अनाथ है इंदु (कृति कुल्हारी) जो हकलाती है और कविताओं से खुशी मिलती है। उसकी मुलाकात एक अति महत्वकांक्षी नौकरशाह नवीन सरकार (तोता रॉय चौधरी) से होती है और
दोनों की शादी हो जाती है।

 प्लॉट

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नवीन के बॉस चाहते हैं कि इंदु की कविताएं इमरजेंसी के पक्ष में हो और इंदु इसके लिए तैयार भी हो जाती है। इंदु की जिंदगी में नया मोड़ तब आता है जब वो अपनी आखों से तुर्कमन गेट दिल्ली में हिंसा होते देखती है। वहां वो दो अनाथ बच्चों को बचाती है और वो महसूस करती है कि उसके और उसके पति के आपातकाल को लेकर बिल्कुल अलग अलग विचार हैं। स्थिति ऐसी हो जाती है कि इंदु को कठोर कदम उठाना पड़ता है। वो अपनी आवाज दबने नहीं देती और नवीन से रिश्ता तोड़ देती है जो उसे बोलता है "हकलाते हकलाते हक मांगने चली"
क्या इंदु अपनी इरादों में कामयाब हो पाएगी?

डायरेक्शन

डायरेक्शन

जहां एक ओर बॉलीवुड राजनैतिक विषयों पर फिल्में बनाने से बचता है ताकि कंट्रोवर्सी का शिकार ना होना पड़े, वहीं मधुर भंडारकर ने भारती राजनीति के इतिहास के सबसे काले विषय को उठाकर निश्चित रूप से बहादुरी का काम किया है। बदकिस्मती से फिल्ममेकर इसपर एक बोल्ड कमेंट दिखाने में कामयाब नहीं होते हैं और भावनात्मक लड़ाई को अधिक दिखाते हैं।

फिल्म में इमरजेंसी के दौरान की कई असल घटनाओं को दिखाया गया है - जैसे जनसंख्या कम करने के लिए पुरुषों की नसबंदी, दिल्ली को खूबसूरत बनाने के लिए झुग्गी बस्तियों को हटा देना और मीडिया की आजादी छीन लेना।

मधुर भंडाकर कुछ राजनीतिक हस्तियों का नाम लेने से फिल्म में बचे हैं और इसका कारण जगजाहिर है। एक गर्ममिजाज अध्यक्ष (नील नीतिन मुकेश) संजय गांधी से प्रेरित किरदार है और प्रधानंत्री इंदिरा गांधी संदर्भित किरदार है। फिल्म में आप 'पंच सूत्र प्रोग्राम', MISA को भी देखेंगे।

परफॉर्मेंस

परफॉर्मेंस

इंदु सरकार पूरी तरह से कृति कुल्हारी की फिल्म है। उन्होंने पूरी फिल्म का भार अपने कंधे पर उठाया है। ये उनकी सबसे दमदार फिल्मों में से एक है।
तोता रॉय चौधरी भी इंदु के पति के किरदार काफी प्रभावित करते हैं। नील नितिन मुकेश का काफी हद तक संजय गांधी की तरह लगना आप इग्नोर नहीं कर सकते हैं। कैमियो में उन्होंने अपनी दमदार छाप छोड़ी है हालांकि फिल्म में वो टिपिकल बॉलीवुड डायलोग जैसे "सरकारें चैलेंज से नहीं..चाबुक से चलती है" और "इमरजेंसी में इमोशन नहीं..मेरे ऑर्डर चलते हैं"।
सुप्रिया विनोद के महज एक फ्रेम में हैं और इसकी वजह सेंसर बोर्ड है जिन्होंने फिल्म से कांट छांट की है।

तकनीकी पक्ष

तकनीकी पक्ष

काइको नाखड़ा की सिनेमेटोग्राफी बहुत ही शानदार है और देवेद्र मुर्देश्वर और धारदार एडिटिंग करते तो और बेहतर होता।

 म्यूजिक

म्यूजिक

इंदु सरकार के म्यूजिक में कुछ भी अलग नहीं है। हालांकि 'चंदा सूरज धीरे धीरे' के काफी अर्थभरे लिरिक्स हैं। ये फिल्म में बहुत ही अच्छी जगह डाला गया है।

 Verdict

Verdict

इंदु सरकार का विषय दमदार हो लेकिन फिल्म में इतना अधिक मेलोड्रामा है जो फिल्म की सबसे बड़ी निगेटिव प्वाइंट है। फिल्म में एक लाइन है "जब सब चुप हैं तो कोई तो चिखेगा"।

Indu Sarkar Public Review | Neil Nitin Mukesh | Kirti Kulhari | Anupam Kher | FilmiBeat
English summary
Indu sarkar review story plot and rating,know how the movie is.
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