Sushant Singh Rajput
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    गुलाबो सिताबो फिल्म रिव्यू - मियां बीवी आयुष्मान और बच्चन साहब की नोकझोंक, लेकिन दिल जीतेगी माशूका

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    Rating:
    2.0/5

    फिल्म - गुलाबो सिताबो

    निर्देशक - शूजित सरकार

    स्टारकास्ट - आयुष्मान खुराना, अमिताभ बच्चन, फर्रूख जफर व अन्य

    प्लेटफॉर्म - अमेज़ॉन प्राइम

    लालच से आजतक कोई आदमी नहीं मरा। और 78 साल का एक बूढ़ा, जिसका आधा पैर कब्र में लटका हो वो जब ये बात बोले तो और भी मज़ेदार लग सकती है। लेकिन फिर जब वो बूढ़ा मिर्ज़ा एक जर्जर सी हवेली से अपनी मोहब्बत और उल्फत बयान करता है तो लगता है कि वाकई इश्क बस यही है। अपनी जगह से। शूजित सरकार की गुलाबो सिताबो की कहानी का मुख्य किरदार यही हवेली है।

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    हवेली जिसका नाम है फातिमा महल और जिसके किराएदार हैं बांके यानि कि आयुष्मान खुराना। जिसकी कंजूसी की कोई सीमा नहीं है। हवेली की मालकिन हैं बेगम (फर्रूख ज़फर) लेकिन हवेली का मालिक खुद को समझता है मिर्ज़ा (अमिताभ बच्चन) जो कि इतना लालची है कि बस खुद को नहीं बेच रहा है तो गनीमत है।

    गुलाबो सिताबो कहानी है इसी किराएदार और मकान मालिक की नोंक झोंक की। किराएदार जो इस फातिमा महल में सात पीढ़ियों से रहता है और किराए के नाम पर 30 रूपया देता है। वहीं मकान मालिक जो किराएदार को घर से निकाल देना चाहता है।

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    किराएदार मकान मालिक की नोंक झोंक इस पूरी फिल्म का सार बनती है लेकिन फिल्म आपका दिल जीतती है क्लाईमैक्स पर जहां पति पत्नी जैसे लड़ने वाले आयुष्मान और अमिताभ बच्चन के बीच दिल जीत ले जाएगी माशूका यानि कि बेगम!

    शूजित सरकार गुलाबो सिताबो को बेहद आसानी से दाल चावल और अचार की तरह परोस सकते थे। उन्होंने परोसा भी। बस दिक्कत ये कि वो अचार डालना ही भूल गए। और इसलिए गुलाबो सिताबो में सब कुछ है पर चटखारे नहीं हैं।

    मज़ेदार कहानी

    मज़ेदार कहानी

    फिल्म की कहानी है मज़ेदार। लेकिन इस मज़ेदार में मज़ा डालना शूजित सरकार भूल गए। एक पुरानी हवेली, एक दम तोड़ता मालिक, एक कंगाल किराएदार फिर भी ज़िंदगी में उतनी ही नोकझोंक। लेकिन फिर भी फिल्म सपाट अपने मुंह पर गिरती है जिसका कारण है फिल्म का लचर लेखन और इसकी पूरी ज़िम्मेदारी जाती है फिल्म की लेखिका जुही चतुर्वेदी पर।

     बिल्कुल धीमी गति

    बिल्कुल धीमी गति

    फिल्म की गति बेहद धीमी है। ऐसा लगता है कि दो घंटे चलने वाली इस फिल्म में 1.5 घंटे कुछ होता ही नहीं है। शुरू के 15 मिनट कहानी से जुड़ने में लग जाता है और आखिरी के 15 मिनट में कहानी में जान आती है। हो सकता है कि फिल्म अगर 1 घंटे की होती तो शायद दर्शक फिल्म से मज़बूती से जुड़ पाते।

    दम तोड़ देती है फिल्म

    दम तोड़ देती है फिल्म

    इंटरवल तक आते आते फिल्म दम तोड़ देती है। दिलचस्प कहानी होने के बावजूद ना ही दृश्य आपको लुभाते हैं और ना ही डायलॉग्स। आप चाहकर भी फिल्म को बंद नहीं कर पा रहे हैं तो केवल इसलिए कि स्क्रीन पर अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गज कलाकार कुछ करने की कोशिश करते दिख रहे हैं। और आप बस उन्हें उनकी कोशिशों के नंबर और सहानुभूति देना चाहते हैं।

    गिरकर अंत में उठती है

    गिरकर अंत में उठती है

    फिल्म शुरू के 15 मिनट में ही सपाट गिर जाती है और इसके बाद पूरी फिल्म में इतने किरदार आते जाते हैं लेकिन फिल्म ऐसा गिरती है कि उठ ही नहीं पाती है। आप इंतज़ार करते हैं कि अब शायद फिल्म में कुछ आएगा लेकिन कुछ नहीं आता। यहां तक कि जो मुस्कुराहट हंसी में तब्दील हो सकती थी वो भी नहीं हो पाती है।

    औसत सा अभिनय

    औसत सा अभिनय

    जहां आयुष्मान खुराना खुद को एक लखनवी किराएदार के किरदार में ढालने की कोशिश करने में पहली बार जूझते दिखाई देते हैं वहीं अमिताभ बच्चन का सारा जादू उनका मेकअप ले जाते हैं। इतने भारी मेकअप के आगे अमिताभ बच्चन भी बस संघर्ष करते दिखाई देते हैं। शायद उनके किरदार की सबसे बड़ी कमी उनका लुक है।

    काम नहीं आती सपोर्टिंग कास्ट

    काम नहीं आती सपोर्टिंग कास्ट

    फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट बिल्कुल भी काम नहीं आती है। चाहे वो मिर्ज़ा के वकील के किरदार में बृजेंद्र काला हों या फिर पुरातत्व विभाग के अफसर के किरदार में विजय राज़ हो। ऐसा लगता है कि हर किरदार फिल्म को और बोझिल बनाता जाता है।

    दिल जीतती बेगम

    दिल जीतती बेगम

    अगर फिल्म में कुछ पॉज़िटिव है तो वो हैं मिर्ज़ा की बेगम। उनका ट्रैक जहां आपको पसंद आएगा वहीं फिल्म के दो चार अच्छे डायलॉग केवल उन्हीं के हिस्से आए। वो जब स्क्रीन पर आती हैं दिल जीत लेती हैं और कुल मिलाकर कहानी की जान बेगम ही हैं जो फिल्म के आखिरी 10 मिनट में जान फूंकती हैं।

    बेहतरीन प्रदर्शन करतीं सृष्टि

    बेहतरीन प्रदर्शन करतीं सृष्टि

    फिल्म में आयुष्मान की बहन के किरदार में दिखाई दीं कलाकार सृष्टि भी फिल्म को अपने कंधों पर लेकर इसे थोड़ी मज़बूती देने की कोशिश करती है। उनके हिस्से आए सीन अच्छे हैं और वो उन्हें बखूबी निभाती हैं।

    कहां है गहराई

    कहां है गहराई

    फिल्म की सबसे बड़ी कमी है लखनऊ से प्यार ना करवा पाना। लखनऊ तहज़ीब का शहर है, नज़ाकत भरी बोली का शहर है, गूंजती इमारतों का शहर है। दिलचस्प ये है कि फिल्म में सब कुछ है पर किसी चीज़ से मोहब्बत नहीं होती। लोग लखनवी हैं पर कोई और ही भाषा बोलते हैं। अमिताभ बच्चन तो सीधा इलाहाबादी ही बोलते दिखाई देते हैं और ये सारी चीज़ें आपको फिल्म से दूर करती जाती हैं।

    समय देखकर देख सकते हैं

    समय देखकर देख सकते हैं

    कुल मिलाकर फिल्म को हमने दिए हैं 2 स्टार जिसमें आधा स्टार केवल बेगम के इश्क में दे दिया है हमने। अगर आपके पास बहुत समय है तो फिल्म देख सकते हैं वरना इंतज़ार कर लीजिए, कुछ अच्छा आ ही जाएगा।

    English summary
    Gulabo Sitabo film review - Ayushmann Khurrana and Amitabh Bachchan’s film has released on Amazon prime. Read the full review of the film.
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