ग्रैंड मस्ती ने ABCD को भी वल्गर बना दिया- फिल्म रिव्यू
2004 में आई फिल्म मस्ती ने लोगों को नॉनवेज कॉमेडी का ऐसा डोज दिया था कि लोग हंसते हंसते पागल हो गये थे और साथ ही फिल्म में कॉमेडी के साथ साथ कुछ सेंसिबल चीजें भी थीं जिन्होंने लोगों को फिल्म से बांधकर रखा था। लेकिन इस बार मस्ती के सीक्वल के चक्कर में लोगों को कॉमेडी का ग्रैंड डोज देने के लिए फिल्म के निर्देशक ने फिल्म ग्रैंड मस्ती को कुछ ज्यादा ही वल्गैरिटी दे दी जिसने फिल्म को सिर्फ और सिर्फ नॉनवेज जोक बनाकर रख दिया। हालांकि फिर भी लोगों को ये फिल्म देखकर काफी हंसी भी आई लेकिन वहीं कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म में कुछ ज्यादा ही मस्ती के चक्कर में फिल्म को वल्गर बना दिया गया है।
ग्रैंड मस्ती में आफताब शिवदासानी, रितेश देशमुख और विवेक ऑबरॉय अपने उसी पुराने मूड में दिखे और कई जगह बहुत ही बेहतरीन एक्स्प्रेशन के जरिये लोगों को हंसने पर मुजबूर कर दिया। लेकिन एडल्ट कॉमेडी के साथ ही एक फैमिली टच और इमोशन्स का कनेक्शन जो कि मस्ती में था कहीं ना कहीं ग्रैंड मस्ती में मिसिंग था। फिल्म के किरदार वही हैं और उनकी प्रॉबल्म वही है लेकिन बस फिल्म में लड़कों की पत्नियां और उनकी गर्लफ्रैंड्स बदल गयी हैं। फिल्म में अधिकर वही जोक्स यूज किये गये हैं जो कि मोबाइल मैसेजेस के जरिये यंग जेनरेशन एक दूसरे के साथ शेयर करती है।
हालांकि ये कहा जा सकता है कि फिल्म कलेक्शन अच्छा करेगी लेकिन फिल्म की ऑडियंस की पहुंच इस बार काफी कम होगी। क्योंकि कुछ ज्यादा ही इस बार खुलापन दिखा दिया गया है। एबीसीडी से लेकर रिश्तों की परिभाषा भी बिल्कुल बदल दी गयी है।


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