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फिराक़: आम आदमी का दर्द

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Firaaq Review
निर्देशक: नंदिता दास
कलाकार: नसीरुद्दीन शाह, संजय सूरी, दीप्ति नवल, शहाना गोस्वामी, टिस्‍का चोपड़ा और परेश रावल

नंदिता दास की फिल्‍म फिराक़ गुजरात राज्य में हुए कुख्यात गोधरा कांड के 24 घंटे और एक महीने बाद हुए भीषण सांप्रदायिक नरसंहार में आम आदमी के दर्द को दिखाने का सशक्‍त प्रयास करती है।

फिराक़ उर्दू का शब्‍द है जिसका अर्थ होता है अलगाव और प्‍यास। गुजरात 2002 में हुए साम्‍प्रदायिक दंगों में 3000 से अधिक मुस्लिमों की हत्‍या की गई थी, हजारों बेघर हो गए थे और बहुत सी मुस्लिम महिलाओं का बलात्‍कार किया गया था। फिल्‍म में कई सच्‍ची कहानियों को एक साथ पेश करने की कोशिश की गई है।

फिल्‍म की पात्र आरती (दीप्ति नवल), एक मुस्लिम महिला छवि को भुला नही पाती है जो दंगो के समय उससे संरक्षण की भीख मांगती है लेकिन वह उसके मुंह पर दरवाजा बंद कर देती है। खान साहब (नसीर) एक मशहूर संगीतकार है जो कि हिदू बहुल इलाके मे रहते है। वह अपने चारो आरे हो रही तबाही को समझ नही पा रहे है। उन्‍हें लगता है कि दो समुदाय एक साथ शांतिपुर्वक रह सकते है। मुनीरा (शाहाना) दंगो के दौरान कुछ लोगों के साथ बच पाने में कामयाब हो जाती है।

वह वापस अपने घर लौटती है जहां उसे अपना घर जमीन तक जला हुआ मिलता है। समीर (सूरी) एक युवा, साहसी व अमीर मुस्लिम है जिसने एक हिंदु अनुराधा (टिस्‍का चोपड़ा) से शादी की है जो अहमदाबाद में रहने और न रहने के द्धंद में फंसा हुआ है। उसे लगता है कि किसी और शहर में जाकर उसका परिवार सुरक्षित रहेगा। इसके अलावा एक असहाय मुस्मिल लड़का जो दंगो गायब हुए अपने पिता को ढूढने का प्रयास करता है।

नंदिता ने अपने प्रथम निर्देशकीय प्रयास में जितने बड़े विषय को चुना है उसे उतने ही संवेदनशीलता व तकनीकी रूप से पेश करने में सफल रही है। भारत के बेहतरीन तकनीशियनों से एक रवि के चंद्रन और संपादक श्रीकर प्रसाद की सहायता से प्रतिभाशाली कलाकारो के बीच बेहतरीन संवाद स्‍थापित किया गया है जिसके लिए नंदिता प्रशंसा के योग्‍य है। फिल्‍म के पात्रों की जिंदगिया आपस में कहीं नही मिलती है फिर भी एक दूसरे से गहराई से संवाद स्‍थापित करती है।

फिराक़ का सबसे मजबूत पक्ष दंगो से प्रभावित साधारण हिंदू व मुस्लिम पात्र है जो कि आम आदमी है। नंदिता ने पर्दे पर हिंसा को ग्राफिक रूप में न दिखाकर अपने पात्रों के भययुक्‍त चेहरों, गुस्‍से और व्यग्रता से दिखाने की कोशिश की है जो अपने आप में कई भायवह घटनाएं कह जाता है।

परेश रावल को लम्‍बे समय बाद गंभीर भूमिका में देखना अच्‍छा लगेगा। संजय सूरी ने अब तक की सबसे कठिन भूमिका निभाई है। उसकी पत्‍नी की भूमिका में टिस्‍का ने अपने पति की मनदशा को समझने का प्रयास करती हिंदू महिला की मनोस्थिति को बखूबी दिखाया है। रॉक आन के बाद शाहाना गोस्‍वामी ने एक और पुरस्‍कार पुरस्कार योग्य प्रदर्शन किया है। लम्‍बे समय बाद दिख रहे नसीर और दीप्‍ती नवल की भूमिका आपको लम्‍बे समय तक सोचते रहने पर मजबूर करेगी।

यह फिल्‍म संवेदना शुन्‍य लोगो या फिर दो घंटे टाइम पास करने वालों के लिए बिल्‍कुल नही है। यह हमारे देश के उस असुविधाजनक व दर्दनाक हकीकत को दिखाने की कोशिश करती है जिसमें हम रहने को अभिशप्‍त है।

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