Drishyam 2 Movie Review: अपने जबरदस्त रोमांच और रहस्य से बांधकर रखती है अजय देवगन स्टारर फिल्म

Rating:
3.5/5

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निर्देशक - अभिषेक पाठक
कलाकार - अजय देवगन, तब्बू, अक्षय खन्ना, श्रिया सरन, इशिता दत्ता, मृणाल जाधव

"सवाल ये नहीं है कि आपकी आंखों के सामने क्या है.. सवाल ये है कि आप देख क्या रहे हो!" चौथी फेल विजय सलगांवकर का यह संवाद एक बार फिर एक आम आदमी के साहस, सूझबूझ, कपट और दुविधा की याद दिलाता है। एक आम आदमी, जो अपने परिवार को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। दृश्यम 2 की कहानी ठीक वहीं से शुरु होती है, जहां पहली खत्म की गई थी.. लेकिन यहां 7 सालों का अंतराल है।

फिल्म मुख्य तौर पर दो किरदारों के जिद और विश्वास के इर्द गिर्द घूमती है.. एक है आईजी मीरा देशमुख (तब्बू), जो अपने बेटे की हत्या करने वालों को किसी भी हाल में जेल की सलाखों के पीछे देखना चाहती हैं। और दूसरा है विजय सलगांवकर (अजय देवगन), जो किसी भी हाल में अपने परिवार पर आंच नहीं आने देना चाहता है।

पहली फिल्म में विजय सलगांवकर ने अपनी सूझबूझ से दर्शकों को हैरान किया था। लेकिन अब जबकि हम उन्हें जान पहचान चुके हैं, यहां आपको विजय के हर अगले कदम का इंतजार रहेगा। फिल्म की पटकथा, इसके ट्विस्ट एंड टर्न्स बेहद प्रभावी हैं।

कहानी

कहानी

विजय सलगांवकर की बेटी के हाथों गलती से आईजी मीरा देशमुख के बेटे की हत्या हो जाती है। अपने परिवार को पुलिस से बचाने के लिए विजय लड़के की लाश को दफना देता है। पुलिस हर संभव प्रयास करती है, लेकिन उन्हें लाश नहीं मिलती है.. और यहीं 'दृश्यम' खत्म हुई थी। अब कहानी 7 साल आगे बढ़ चुकी है। विजय सलगांवकर का परिवार सब कुछ भूलकर जीने की कोशिश में लगा है। वह अब एक फिल्म थियेटर का मालिक भी है और अपनी लिखी एक कहानी पर फिल्म भी बनाना चाहता है। उसने पटकथा भी लिख ली है, लेकिन क्लाईमैक्स से खुश नहीं है। ये फिल्म सिर्फ विजय का पैशन है या इसके पीछे उसकी कोई और मंशा है.. इसका खुलासा एक कहानी में जबरदस्त ट्विस्ट लाता है।

बहरहाल, वह एक लेखक मुराद अली (सौरभ शुक्ला) के साथ फिल्म पर काम कर ही रहा होता है कि पुलिस सात साल पुराने केस को फिर से री-ओपन करती है।

एक बार फिर विजय सलगांवकर, अपनी पत्नी नंदिनी (श्रिया सरन) और बेटियों अंजू (इशिता दत्ता) और अनु (मृणाल) के साथ पुलिस स्टेशन में पकड़ कर लाया जाता है। इस बार पुलिस के पास गवाह और सबूत भी है और केस की जिम्मेदारी उठाई है नए आईजी तरूण अहलावत (अक्षय खन्ना) ने। वह मीरा (तब्बू) के साथ मिलकर विजय को पूरे परिवार सहित जेल की सलाखों के पीछे देखना चाहता है। लेकिन क्या वो अपने मकसद में कामयाब हो पाएंगे? या विजय अपने सूझबूझ से एक बार फिर अपने परिवार को कानून की गिरफ्त से बचा ले जाएगा?

अभिनय

अभिनय

विजय सलगांवकर के किरदार में अजय देवगन दोबारा जितनी सरलता से रच बस गए हैं, वो सराहनीय है। कहानी सात साल आगे बढ़ चुकी है, लिहाजा अभिनेता के लुक में बदलाव आया है। लेकिन अपनी आखों से और अपने स्टाइल से अजय देवगन जितनी बातें कह जाते हैं, वह बड़े पर्दे पर देखना काफी दिलचस्प होता है। अक्षय खन्ना के साथ उनका आमना सामना काफी कम दृश्यों में रहा है, लेकिन जितना रहा, काफी रोमांचक रहा है। आईजी तरूण अहलावत के किरदार में अक्षय खन्ना ने अपने सहज अभिनय से प्रभावित किया है। इस बार पूरी जांच उनके जिम्मे है, लिहाजा इस फिल्म में तब्बू की स्क्रीन टाइम काफी कम है, जो थोड़ा खलता है। वहीं, रजत कपूर, श्रेया सरन, इशिता दत्ता और मृणाल जाधव ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

निर्देशन

निर्देशन

दृश्यम का निर्देशन निशिकांत कामत ने किया था। जिनका साल 2020 में निधन हो गया। अब सीक्वल को बड़े पर्दे पर उतारा है अभिषेक पाठक ने। पहली फिल्म ने दर्शकों के बीच जो रोमांच और हाइप बनाया था, निर्देशक ने पूरी कोशिश की है कि सीक्वल में उसे बरकरार रखा जाए.. और उसमें वो सफल भी होते हैं। खासकर सेकेंड हॉफ में फिल्म काफी तेजी से आगे बढ़ती है और सीन दर सीन आपको रोमांचित करती जाती है। फिल्म में कई सब- प्लॉट के होते हुए भी निर्देशक ने कहानी को एक सिरे से बांधकर रखा है।

तकनीकी पक्ष

तकनीकी पक्ष

दृश्यम 2 इसी नाम से बनी मलयालम फिल्म की हिंदी रीमेक है। लिहाजा, फिल्म की स्क्रीनप्ले के लिए जीतू जोसेफ की तारीफ होनी चाहिए, जिन्होंने ओरिजनल कहानी लिखी है। जबकि इसे हिंदी में ढ़ाला है आमिल कीयन खान ने। फिल्म के डायलॉग्स काफी बेहतरीन है। तकनीकी पक्ष की बात करें, तो संदीप फ्रांसिस की एडिटिंग कसी हुई है और देवी श्री प्रसाद का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की गति के साथ मेल खाता है।

क्या अच्छा क्या बुरा

क्या अच्छा क्या बुरा

फिल्म की पॉजिटिव बातों में है इसका स्क्रीनप्ले। खासकर सेकेंड हॉफ में जो ट्विस्ट एंड टर्न्स हैं, वो जबरदस्त है और आपको कहानी से लगातार बांधे रखते हैं। जबकि फिल्म का फर्स्ट हॉफ धीमा है। इंटरवल तक फिल्म नए किरदारों और कहानी को स्थापित करने में लगाती है। और इसका प्रभाव कलाकारों के अभिनय में भी दिखता है। कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है, कलाकारों के अभिनय में मजबूती भी बढ़ती जाती है। अजय देवगन और अक्षय खन्ना को आमने सामने देखना दिलचस्प लगा है।

रेटिंग

रेटिंग

'दृश्यम' को मेकर्स ने एक ऐसे मोड़ पर खत्म किया था, जहां दर्शकों को महसूस हुआ कि विजय सलगांवकर की जीत हो चुकी है। लेकिन दृश्यम 2 की कहानी उसी मोड़ से वापस शुरु होती है। सीक्वल बनाने के लिए एक मजबूत स्क्रीनप्ले का होना काफी जरूरी होता है.. और यहां मेकर्स ने निराश नहीं किया है। फिल्म में कुछ कमियां भी हैं, लेकिन कोई शक नहीं कि विजय सलगांवकर की जिंदगी में एक बार फिर शामिल होना काफी दिलचस्प रहा है। फिल्मीबीट की ओर से 'दृश्यम 2' को 3.5 स्टार।

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