शहर की चकाचौंध में खोती इंसानियत की कहानी- सिटिलाइट्स फिल्म रिव्यू
स्टार- 4
निर्माता- महेश भट्ट
निर्देशक- हंसल मेहता
कलाकार- राजकुमार राव, पत्रलेखा, मानव कौल
संगीत- जीत गांगुली
महेश भट्ट हमेशा से ही अपनी लीक से हटकर और समाज का छुपा हुआ चेहरा दिखाने वाली अपनी फिल्मों के चलते बॉलीवुड में काफी मशहूर रहे हैं। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब महेश भट्ट इस तरह की फिल्मों से हटकर रोमांटिक, म्यूसिकल हिट्स और हॉरर जोनर की फिल्में बनाने लगे। हालांकि इन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर काफी अच्छी कमाई की और भट्ट कैंप को काफी नाम, शौहरत से नवाज़ दिया। लेकिन भट्ट साहब के दिल में हमेशा से उन फिल्मों के लिए ज्यादा जगह रही जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर कमाई भले ना की लेकिन लोगों के दिलों को जीता और शायद यही वजह रही कि महेश भट्ट एक बार फिर से समाज के निम्न वर्ग की जिदंगी और उसकी मजबूरियों से जुड़ी खूबसूरत फिल्म सिटिलाइट्स लेकर आए हैं।
कहानी- सिटिलाइट्स कहानी है दीपक (राजकुमार राव) और उसकी पत्नी राखी (पत्रलेखा) की। दोनों एक गांव में रहते हैं और एक दिन अपने सपनों को एक नयी ऊड़ान देने के लिए दीपक अपनी बेटी और पत्नी के साथ मुंबई आ जाता है। जहां पर दीपक उधार लेकर एक दुकान खोलता है और बाद में उसे पता चलता है कि उसे ठग लिया गया है। उसके ऊपर कर्ज का बोझ बढ़ जाता है और साथ ही अपनी पत्नी और बच्ची के साथ वो सड़क पर किसी तरह से गुजारा करता है। बड़ी मुश्किलों के बाद दीपक को नौकरी मिल जाती है लेकिन ये नौकरी दीपक को एक अलग ही दुनिया में ले जाती है जहां इंसानियत की जज्बातों की कोई जगह नहीं।
सिटिलाइट्स इंसानी जज्बातों और मानवता से भरी एक बहुत ही खूबसूरत फिल्म है। फिल्म में राजकुमार राव और पत्रलेखा की अदाकारी भी बेहतरीन है। गानों की बात करें तो भट्ट कैंप की फिल्मों का संगीत अपने आप में ही काफी हिट व बेहतरीन होता था। सिटिलाइट्स के भी गाने बहुत ही खूबसूरत और जुबां पर चढ़ जाने वाले हैं। फिल्म का पहला भाग बहुत ही बेहतरीन है हालांक दूसरे भाग में थोड़ा ढीलापन नज़र आया है। लेकिन एक्टरों की अदाकारी ने फिल्म को कहीं भी बोरिंग नहीं होने दिया।


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