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फिल्म समीक्षा - इट्स ए वंडरफुल आफ़्टरलाइफ़

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भावना सोमाया, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

इट्स ए वंडरफुल आफ़्टरलाइफ़

शादी लायक उम्र की एक बेटी और उसकी परेशान माँ की कहानी है. बेटी मोटी है और सुंदर नहीं है जिसकी वजह से लड़के उसे बार-बार नकारते रहते हैं. ये उसकी माँ यानी शबाना आज़मी को गवारा नहीं और वो उन सब लोगों को एक खतरनाक सबक सिखाती है जो उनकी बेटी की आलोचना करते हैं.

ऐसे विषय को लेकर हमने पहले भी कई नाटकीय और गंभीर फ़िल्में देखी हैं जैसे रेखा की मुसाफ़िर और उर्मिला की ख़ूबसूरत. मगर ये एक नए जॉनर की कॉमेडी फ़िल्म है और वो भी एनआरआई नज़रिए से. निर्देशक गुरिंदर चड्ढा की सारी फ़िल्में पहचान के बारे में होती हैं- चाहे वो बेंड इट लाइक बेकम हो या ब्राइड एंड प्रेजुडिस. इट्स ए वंडरफुल आफ़्टरलाइफ़ भी एक बेटी के अस्तित्व की कहानी है जो शायद एक बाज़ार में बिकना नहीं चाहती. एक माँ की ख़्वाहिश की कहानी है जो बेटी का ब्याह किए बगैर मरना नहीं चाहती.

शबाना आज़मी को हम अलग-अलग किरदारों में देख चुके हैं. फ़िल्म मकड़ी में वो डायन बन चुकी हैं. इस फ़िल्म में वो सिरीयल किलर हैं. गुरिंदर हमेशा ब्रिटेन में बसे एशियाई समुदाय पर फ़िल्में बनाती हैं और हर बार कुछ नया करने की कोशिश करती हैं. इस फ़िल्म में गुरिंदर हमें पाँच आत्माओं से मिलाती हैं जो पूरी फ़िल्म में शबाना के इर्द-गिर्द रहती हैं और उससे बातें करते रहते हैं.

फ़िल्म बिल्कुल अलग दुनिया है और बिल्कुल अलग ही सोच की है. मैं कहूँगी थोड़ी हँसाती है, थोड़ी डराती है और कुछ परेशान और कुछ मायूस भी करती है. शबाना आज़मी का काम तो अच्छा है ही मगर उनकी बेटी बनी गोल्डी नोटे भी बिल्कुल लाजवाब हैं. गुरिंदर की अब तक की सारी फ़िल्मों से कमज़ोर है ये फ़िल्म मगर अपनी अलग तरह की सोच के लिए इट्स ए वंडरफुल आफ़्टरलाइफ़ देखनी चाहिए.

बदमाश कंपनी

चार दोस्तों की कहानी है जो बहुत जल्द और बहुत ज़्यादा अमीर बनना चाहते हैं. और ये सपना पूरा करने के लिए वो बड़े से बड़ा खतरा उठाते हैं. उनका मानना है कि अमीर बनने के लिए बहुत ज़्यादा पैसों की नहीं बल्कि एक आइडिया की ज़रूरत होती है. और उनको ये आइडिया मिलता है. वो अमीर बन जाते हैं और जैसा अकसर होता है वो अपना ज़मीर खो देते हैं. दोस्तों में दरारें पड़ जाती हैं, प्यार खो जाता है और कुछ समय के लिए सब एक दूसरे से रूठ जाते हैं और बिछड़ जाते हैं.

और फिर उनको मिलता है एक और बड़ा आइडिया. इस बार वो चालाकी के बजाए समझदारी और ईमानदारी से काम करते हैं. एक सीन में शाहिद अपने मामू से पूछता है- क्या इज़्ज़त ऐसे कमाई जाती है. फ़िल्म का संदेश नेक है, सब कलाकारों का काम ठीक है ख़ासतौर पर अनुष्का काफ़ी आत्मविश्वास से भरी हुई नज़र आती हैं. शाहिद हमेशा की तरह संवेदनशीलता से किरदार को निभाते हैं.

मगर फ़िल्म लंबी लगती है, कहानी में दोहराव नज़र आता है. कुछ दृश्य हमें दिल चाहता है की याद दिलाते हैं. शाहिद ठीक उसी तरह से फ़ोन पर रो पड़ते हैं जैसे आमिर अपने पिता से बात करते हुए रोए थे. अनुपम खेर का पुरस्कार लेने वाला दृष्य हमें अमिताभ बच्चन की बाग़बान की याद दिलाता है. इन सारी कमियों के होते हुए भी निर्देशक परमीत सेठी की पहली फ़िल्म के लिए उन्हें दाद देनी चाहिए.

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