जिंदगी बेहद हसीन हैः जोहरा सहगल

एक ओर हिंदी सिनेमा अपने सौ वर्षो के हसीन सफर की यादों में खोया हुआ है। वहीं दूसरी ओर अपनी उम्र के 100 वसंत देख चुकीं जोहरा अपने जीवन का लुत्फ उठा रही हैं। अपने जन्मदिन के मौके पर दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में केक काटती हुईं जोहरा की खुशी के अंदाज और ऊर्जा ने सबका दिल जीत लिया।
मौके पर उनकी बेटी किरण सहगल की लिखी किताब जोहरा सहगल फैटी का विमोचन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरण कौर ने किया। किताब में उनके जीवन से जुड़ी खट्टी-मीठी यादों का जिक्र है। केक काटने के बाद जोहरा जब लोगों से मुखातिब हुई तो उनके चेहरे पर अलग ही नूर था। अपने खुशमिजाज अंदाज के लिए मशहूर जोहरा ने वहां मौजूद सभी लोगों को अपनी बातों से खूब गुदगुदाया। लोगों को एहसास दिलाया कि जिंदगी एक खूबसूरत किताब है, जिसे खुशी के साथ पढ़ना चाहिए।
जोहरा ने अपने बीते दिनों को याद करते हुए बताया कि पृथ्वीराज कपूर श्रेष्ठ कलाकार होने के साथ साथ एक अच्छे इंसान भी थे, जिन्हें अपने साथी कलाकारों का भी पूरा ख्याल रहता था। वह पहले डांसर बनीं, फिर कोरियोग्राफर और तब जाकर कहीं अभिनेत्री बनी।
नई फिल्मों का जिक्र करते हुए उन्होंने गोविंदा के साथ अपने फिल्मी दृश्यों को याद किया। जोहरा सहगल का बचपन और जवानी देहरादून एवं अल्मोड़ा उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में गुजरा। उनका पूरा परिवार डालनवाला देहरादून में रहता था। स्कूलिंग देहरादून और चकराता में ही हुई।
अल्मोड़ा में विश्व प्रसिद्ध नर्तक उदयशंकर से उन्होंने बैले डांस सीखा और फिर लगभग दो दशक देश-दुनिया में इसकी छटा बिखेरी। जोहरा ने फिल्मी दुनिया की चार पीढि़यों के साथ सात दशक तक काम किया। उनका पूरा परिवार वर्ष 1912 के बाद सहारनपुर उत्तर प्रदेश से देहरादून आकर बसा।
प्रसिद्ध रंगकर्मी डॉ अतुल शर्मा बताते हैं कि सन् 1950 के आसपास पृथ्वीराज कपूर पृथ्वी थियेटर को देहरादून लाए। तब जोहरा व उनकी छोटी बहन उजरा भी थियेटर से जुड़ गई। थियेटर ने दो नाटक यहूदी की लड़की व दहेज का एतिहासिक मंचन किया। इनमें दोनों बहनों की अहम भूमिका थी। जोहरा डेढ़ दशक तक वह थियेटर से जुड़ी रहीं। करीब डेढ़ दशक पूर्व पहाड़ों की रानी मसूरी में एक था रस्टी की शूटिंग हुई। तब जोहरा भी मसूरी आई थीं। इस धारावाहिक में उनके अभिनय ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी।


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