'..साली..' से क्यों नाराज सेंसर बोर्ड?
'शीला की जवानी' और 'मुन्नी की बदनामी' को चुपचाप अपनी सहमति के प्रमाणपत्र थमाने वाला सेंसर बोर्ड आखिरकार 'ये साली जिंदगी' से क्यों खफा है? ये प्रश्न लाख टके का है जिसका सही जवाब शर्मिला टैगोर को हर हाल में जनता को देना ही होगा। शर्मिला टैगोर ने प्रयोगधर्मी फिल्मकार सुधीर मिश्रा की नई फिल्म 'ये साली जिंदगी' के शीर्षक से अपनी असहमति जताई है और उन्हे इसे बदलने की ताकीद की है।
इधर सेंसर बोर्ड के दोहरे मापदंडों से खफा सुधीर का कहना है कि हर बार सेंसर बोर्ड उनके साथ ही ऐसा क्यों करता है? मालूम हो कि
हजारों ख्वाहिशें ऐसी जैसी फिल्म के मशहूर निर्देशक की लगभग हर फिल्म सेंसर बोर्ड की आपत्तियों के बगैर पास नहीं होती। बोर्ड का अध्यक्ष चाहे जो हो सेंसर बोर्ड और सुधीर का छत्तीस का आंकड़ा कभी नहीं बदलता।
सुधीर की बातों पर अगर गौर फरमाया जाए तो कहीं ना कहीं सच्चाई नजर आती है क्योंकि ऐसी कई फिल्में हैं जो इससे भी घटिया नामों के साथ रिलीज हो चुकी हैं। सेंसर बोर्ड की अध्यक्षा शर्मिला टैगोर का इस बारें में कहना है कि बोर्ड ने समय के अनुरूप खुद को बदला है। लेकिन बोर्ड के मापदंड किसी के लिए इतने लचीले हैं कि गाली तो क्या सेक्स सीन से भी परहेज नहीं करते तो कहीं इतने सख्त हो जाते हैं कि 'पीपली लाइव' जैसी सामाजिक सरोकारों वाली फिल्म को भी सेंसर बोर्ड 'ए' ग्रेड थमा देता है।


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