वक्त ने बदला खलनायकों का चेहरा
वैसे तो हमारी फिल्मी दुनिया समय के साथ काफी बदल गयी है। जो चीज कल तक पर्दे में दिखायी जाती थी वो आज खुलेआम परोसी जाती है। कहानी बदली, संगीत बदला, फिल्म का प्रस्तुतिकरण और प्रमोशन बदला लेकिन हर चीज में बदलाव को नोटिस करने वाली लोगों की पैनी नजर के सामने फिल्मों का बैड मैन भी बदल गया, इस पर किसी का ध्यान ही नहीं गया।
इसी बात पर प्रकाश डालते हैं लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ. मुकुल श्रीवास्तव। जिन्होंने अपने लेख शीर्षक 'समय के साथ बदलता खलनायकों का चेहरा' में जो कि गाँव कनेक्शन में प्रकाशित हुआ है, में बहुत ही सुंदर बात लोगों के सामने शानदार ढंग से रखी है।
डॉ. मुकुल श्रीवास्तव लिखते है कि पत्रकारिक फिल्म लेखन में ज्यादा जोर नायक और नायिका के अलावा कहानी पर रहता है पर इस बदलती दुनिया में हमारे फिल्मों के खलनायक कैसे बदल गए इस पर कभी हमने गौर ही नहीं किया।
यहाँ से पचास पचास कोस दूर जब कोई बच्चा रोता है वाला गब्बर कब गाँव के बीहड़ों से निकलकर कब शहर के उस आम इंसान जैसा हो गया कि उसको पहचानना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गया। काफी समय तक खलनायक चरित्र,नायकों के बराबर का हुआ करता था जिसमे कन्हैयालाल, केएन सिंह, प्राण, प्रेम चोपड़ा, मदन पुरी, अमरीश पुरी, सदाशिव अमरापुरकर, कादर खान, शक्ति कपूर, अनुपम खेर, गुलशन ग्रोवर जैसे सितारे शामिल रहे।
ये तथ्य अलग है कि इनके रूप,नाम और ठिकाने बदलते रहे कभी ये धूर्त महाजन, जमींदार, डाकू तो कभी स्मगलर और आतंकवादी के रूप में हमारे सामने आते रहे। व्यवस्था से पीड़ित हो खलनायक बन जाना कुछ ही फिल्मों का कथ्य रहा है पर एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन के बाद खलनायक बस खलनायक ही हुआ करता था वह क्यों गलत है इस प्रश्न का उत्तर किसी भी फिल्म में नहीं मिलता।
नब्बे के दशक के बाद में मानसिक रूप से बीमार या अपंग खलनायकों का दौर आया परिंदा में नाना पाटेकर, डर में शाहरुख खान, ओंकारा में सैफ अली खान,'दीवानगी' के अजय देवगन और 'कौन' की उर्मिला ऐसे ही खलनायकों की श्रेणी में आती है।
एक मजेदार तथ्य यह भी है कि दुष्ट सासों की भूमिका तो खूब लिखी गयी पर महिला खलनायकों को ध्यान में रखकर हिन्दी फिल्मों में चरित्र कम गढे गए अपवाद रूप में खलनायिका,गुप्त राज, और कलयुग जैसी गिनी चुनी फिल्मों के नाम ही मिलते हैं ।

साम्प्रदायिकता कैसे हमारे जीवन में जहर घोल रही है इसका आंकलन भी हम फ़िल्में देखकर सहज ही लगा सकते हैं। सिनेमा के खलनायकों के कई ऐसे कालजयी खलनायक चरित्र जिनके बारे में सोचते ही हमें उनका नाम याद आ जाता है। कुछ नामों पर गौर करते हैं गब्बर, शाकाल, डोंन, मोगेम्बो, जगीरा जैसे कुछ ऐसे चरित्र हैं जो हमारे जेहन में आते हैं पर इन नामों से उनकी सामजिक,जातीय धार्मिक पहचान स्पष्ट नहीं होती वो बुरे हैं इसलिए बुरे हैं पर आज ऐसा बिलकुल भी नहीं है।
संसधानों के असमान वितरण से परेशान पहले डाकू खलनायक आते हैं.मुझे जीने दो ,मदर इन्डिया,पान सिंह तोमर जैसी फ़िल्में इसकी बानगी भर हैं फिर समाजवाद व्यवस्था ने हर चीज को सरकारी नियंत्रण में कर दिया जिसका नतीजा तस्करी के रूप में निकला और विलेन तस्कर हो गया.अमिताभ बच्चन का दौर कुछ ऐसी फिल्मों से भरा रहा,कालिया,दीवार, राम बलराम जैसी फिल्मे उस दौर की हकीकत को बयान कर रही थी।
तस्करों ने पैसा कमाकर जब राजनीति को एक ढाल बनाना शुरू किया तो इसकी प्रतिध्वनि फिल्मों में भी दिखाई पडी अर्जुन ,आख़िरी रास्ता और इन्कलाब जैसी फ़िल्में समाज में हो रहे बदलाव को ही रेखांकित कर रही थी फिर शुरू हुआ उदारीकरण का दौर जिसने नायक और खलनायक के अंतर को पाट दिया एक इंसान एक वक्त में सही और गलत दोनों होने लगा,भौतिक प्रगति और वितीय लाभ में मूल्य और नैतिकता पीछे छूटती गयी और सारा जोर मुनाफे पर आ गया इसके लिए क्या किया जा रहा है इससे किसी को मतलब नहीं महत्वपूर्ण ये है कि मुनाफा कितना हुआ जिसने स्याह सफ़ेद की सीमा को मिटा दिया और फिल्म चरित्र में एक नया रंग उभरा जिसे ग्रे(स्लेटी)कहा जाने लग गया पर इन सबके बीच में खलनायकों की बोली भी बदल रही थी।
सत्तर और अस्सी के दशक तक उनकी गाली की सीमा सुअर के बच्चों,कुत्ते के पिल्ले और हरामजादे तक ही सीमित रही पर अब गालियाँ खलनायकों की बपौती नहीं रह गयी। भाषा के स्तर पर भी नायक और खलनायक का भेद मिटा है. बैंडिट क्वीन से शुरू हुआ ये गालियों का सफर गैंग्स ऑफ वासेपुर तक जारी है जाहिर है गाली अब अछूत शब्द नहीं है वास्तविकता दिखाने के नाम पर इनको स्वीकार्यता मिल रही है और सिनेमा को बीप ध्वनि के रूप में नया शब्द मिला है.रील लाईफ के खलनायकों की ये कहानी समाज की रीयल्टी को समझने में कितनी मददगार हो सकती है ये भी एक नयी कहानी है ।


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