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    '...तू देख कि क्या रंग है, मेरा तेरे आगे'

    By Super
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    दिल्ली में 11वें भारत रंग महोत्सव का आयोजन संपन्न हो गया है. जश्न के दिन पूरे हुए और थिएटर चर्चा, विमर्श, प्रचार से फिर दूर छिटक गया है.यह उदगार हैं दिल्ली में 11वें भारत रंग महोत्सव को देख रहे कुछ दर्शकों, रंगमंच से जुड़े हुए और रंगमंच के पैरोकारों के.

    पिछले दो सप्ताह से चल रहे भारत रंग महोत्सव का 11वाँ आयोजन पूरा हुआ. दुनिया भर में ख़्याति पा रहा भारत का यह अंतरराष्ट्रीय रंगमंच महोत्सव इस बार 60 से ज़्यादा नाट्य प्रस्तुतियाँ लेकर आया.

    इनमें से 12 प्रस्तुतियाँ दुनिया के अन्य हिस्सों से आई थीं. इनमें पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, पोलैंड, स्विटज़रलैंड, जर्मनी, जापान, बांग्लादेश, नेपाल और इसराइल से आई प्रस्तुतियाँ ख़ास थीं.

    कई अच्छी, कुछ कच्ची और कुछ सामान्य प्रस्तुतियों के दौरान जब महोत्सव के मंचों से नगाड़े और वाद्य बजे तो दिल्ली में साहित्य, कला के गलियारे रंगमंच की बतकहियों से चहक उठे.

    बात होने लगी ऐसे तमाम पुराने सवालों पर जो लगभग हर साल दोहराए जाने लगे हैं. मसलन, थिएटर का भविष्य, कौन सा थिएटर, भाषा बनाम अंग्रेज़ी, क्या सीखें क्या छोड़ें आदि.

    पर आयोजन के 14 दिनों में जो एक बात निकलकर आई उसे ग़ालिब अपने एक शेर में यूं कहा जा सकता है,मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,तू देख कि क्या रंग है मेरा तेरे आगे.

    वर्ष 1999 में जब भारत रंग महोत्सव की शुरुआत हुई थी तो उस वक्त दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक थे रामगोपाल बजाज. उन्होंने ही इस रंग महोत्सव की शुरुआत कराने में सूत्रधार की भूमिका निभाई.

    अब इस बात की पड़ताल करने का वक्त हो चला है कि रंग महोत्सव के दायरे को कितना और कैसे व्यापक बनाया जाए. इसकी ज़रूरतें बढ़ रही हैं पर उनपर ध्यान नहीं दिया जा रहा है रामगोपाल बजाज, रंगकर्मी

    थिएटर जगत के लोगों को इस महोत्सव से आस बंधी. भारत के अन्य हिस्सों और फिर दुनिया के दूसरे देशों से इस महोत्सव के ज़रिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सिलसिला भी शुरू हुआ.

    इसे लोगों ने ख़ूब सराहा भी. आलोचक भी इसके महत्व और योगदान को नकार नहीं पाते. रंगकर्मियों और कलाकारों के लिए यह आयोजन वार्षिक उत्सव जैसा ही है.

    मत पूछ कि क्या...

    पर सवाल इतना भर नहीं रह जाता. रामगोपाल बजाज कहते हैं, "अब इस बात की पड़ताल करने का वक्त हो चला है कि रंग महोत्सव के दायरे को कितना और कैसे व्यापक बनाया जाए. इसकी ज़रूरतें बढ़ रही हैं पर उनपर ध्यान नहीं दिया जा रहा है."

    उन्होंने कहा कि रंग महोत्सव में आने वाले समूहों के लिए पारिश्रमिक भी 11 बरसों में नाम मात्र के लिए ही बढ़ा है. क्या आयोजक किसी नाटक की तैयारी के दिन-ब-दिन महंगे होते खर्च को याद नहीं रख पाते?

    ख़ुद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की अध्यक्ष अमाल अल्लाना ने समारोह के उदघाटन पर थिएटर के साथ नौकरशाही और प्रशासन के सौतेले व्यवहार की बात सार्वजनिक तौर पर कही. और यह बात तब कही जब मंत्रालय के अतिथि भी समारोह में आए हुए थे.

    हालांकि मंत्रालय ने एनएसडी में कार्यरत लोगों के वेतन में इजाफ़े की घोषणा करके कुछ चिंता और गंभीरता के संकेत तो दिए हैं पर रंगकर्म की पढ़ाई करके हर साल बाहर आ रहे छात्रों को रोज़गार और जीविका का सवाल जस का तस दिखाई देता है.

    साथ ही सवाल गुणवत्ता और प्रयोगों पर भी हो रही है. रंगमंच की इन नई चुनौतियों को कुछ रंगकर्मी चिंता तो कुछ संभावना के स्तर पर देख रहे हैं.

    कुछ कह रहे हैं कि नाटक करने वाले समूह बढ़े हैं, यह सकारात्मक संकेत है. दिल्ली में ही अब आए दिन नाटकों के मंचन की सूचना अख़बारों से मिलती रहती है पर दूसरा खेमा थिएटर में हल्केपन और अधकचरेपन से भी चिंतित है.

    दरअसल, सवाल यह उठ रहा है कि कुछ लोगों के रंगमंच में प्रयोग और नए कलेवर के प्रयास कहीं थिएटर को सिनेमा और टीवी के विकल्प जैसा तो नहीं बनाने में लगे हुए हैं. आलोचना इसे ग़लत मानती है और थिएटर के लिए ख़तरा बताती है.

    सरहदों से पार

    रंग महोत्सव में विदेशों से जो नाटक आए उनमें जापान, अफ़ग़ानिस्तान, जर्मनी के नाटकों को ख़ासी सराहना मिली. पाकिस्तान की प्रस्तुतियाँ भी सराही गईं पर इसलिए ज़्यादा, क्योंकि वो पाकिस्तान से थीं.

    आजकल के भारतीय मीडिया की दिक्कत यह है कि वो थिएटर को न तो समझ पा रहा है और न समझने की कोशिश कर रहा है. गंभीर होकर थिएटर के माध्यम को समझना या उसके बारे में कुछ कहना, यह कम ही देखने को मिलता है. बस, धूम-फिरकर थिएटर बचेगा या नहीं, इसी सवाल की रट लगाते रहते हैं रंगकर्मी ऊषा गांगुली

    दरअसल, 26 नवंबर के बाद जिस तरह की स्थिति भारत और पाकिस्तान के बीच पैदा हुई है, उसमें पाकिस्तान से सांस्कृतिक सौगातों का आना ही हिम्मत और सराहना की बात थी. पर थिएटर का शिल्प केवल आने भर को तो श्रेष्ठ नहीं मान लेता न.

    पोलैंड से आए नाटकों में यूरोप की आज की पीढ़ी का द्वंद्व देखने को मिला. निर्देशक पावेल पासीनी कहते हैं, "यूरोप संक्रमण के दौर से गुज़र रहा है. तेज़ी से सामाजिक स्थितियाँ और वर्जनाएं बदल रही हैं. इतिहास से नई पीढ़ी दूर होती जा रही है और जड़ें पीछे अनदेखी, अनजानी छूटती जा रही हैं."

    वो बताते हैं कि इसीलिए मल्टीमीडिया के विरोधी होने के बावजूद उन्होंने उसे अपनी बात कहने के माध्यम के तौर पर अपनाया है क्योंकि नई पीढ़ी से संवाद स्थापित करने के लिए थिएटर को भी अपनी संवाद की शैली, तकनीक और स्तर उनके आसपास लाकर खड़ा करना होगा. तभी तो नई पीढ़ी हमारी बात सुनेगी.

    अफ़ग़ानिस्तान से तीन प्रस्तुतियाँ इस बार आनी थीं. एक ही आ सकी. पर बेहतर काम के साथ. हालांकि अफ़ग़ान समाज अभी भी रंगमंच को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखाई दे रहा है. रंगकर्मी इसकी जद्दोजहद में लगे हैं. कुछ काम हो रहा है, सराहना कम और उलाहना ज़्यादा मिल रही है पर बाहर पसंद किया जा रहा है.

    इसराइल और मध्यपूर्व की स्थिति की कहानी कहता नाटक- मैं इस्तांबुल हूँ इस महोत्सव के आधार को और व्यापक बनाता है. युद्धोत्तर विषय, मानव जनित संकटों के कारण मानव पर असर, ऐसे विषयों पर बात हो रही है.

    चिंता, विषय और विस्तार

    मीडिया का भी ध्यान इस महोत्सव के दौरान विरोध की धमकियों और सुरक्षा की चिंताओं के गिर्द ज़्यादा नज़र आया, रंगमंच की चर्चा फिर भी दूसरे पैराग्राफ़ की बात ही रही.

    इसपर जानी-मानी रंगकर्मी ऊषा गांगुली कहती है, "आजकल के भारतीय मीडिया की दिक्कत यह है कि वो थिएटर को न तो समझ पा रहा है और न समझने की कोशिश कर रहा है. गंभीर होकर थिएटर के माध्यम को समझना या उसके बारे में कुछ कहना, यह कम ही देखने को मिलता है. बस, धूम-फिरकर थिएटर बचेगा या नहीं, इसी सवाल की रट लगाते रहते हैं."

    बड़े बैनरों के पास तो पैसा है पर चुनौती तो उन समूहों के सामने सबसे ज़्यादा है जो अपने दम पर सामाजिक-राजनीतिक विमर्श के मुद्दों को लोगों के बीच ले जा रहे हैं. उनके हाथों को मज़बूत करना ज़्यादा बड़ा सवाल है एमएस सथ्यु, इप्टा

    पाकिस्तानी रंगकर्मी शाहिद नदीम कहते हैं कि जिस तरह के माहौल में दोनों मुल्क फिलहाल हैं और जिस तरह से इस माहौल में अपनी दुकानें चलाने के लिए मीडिया चैनल दोनों ओर ख़बरें कर रहे हैं वो चिंताजनक है. अमन के साथ ऐसे खेलना ग़लत है.

    चर्चा का विषय यह भी रहा कि रंगकर्मियों के भविष्य को लेकर अगर सरकारें और समाज गंभीर नहीं होगा तो जिस तेज़ी से रंग महोत्सव एक माहौल बनाने में सफल हुआ है, उसी तेज़ी से इसका ग्राफ़ गिर भी सकता है.

    इप्टा से जुड़े रंगकर्मी एमएस सथ्यु कहते हैं, "बड़े बैनरों के पास तो पैसा है पर चुनौती तो उन समूहों के सामने सबसे ज़्यादा है जो अपने दम पर सामाजिक-राजनीतिक विमर्श के मुद्दों को लोगों के बीच ले जा रहे हैं. उनके हाथों को मज़बूत करना ज़्यादा बड़ा सवाल है."

    बात राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में आ रही नई पीढ़ियों की भी हुई. जहाँ कुछ रंगकर्मी एनएसडी जैसे और संस्थान बनाए जाने की ज़रूरत गिनाते नज़र आए वहीं कुछ रंगकर्मी एनएसडी में ही छात्रों के स्तर में गिरावट और जीविका या महात्वाकांक्षा के थपेड़ों में थिएटर को कम समय देने की चिंता पर भी व्याकुल नज़र आए.

    हाँ, एक बात ख़ासतौर पर सराहनीय रही कि भारत रंग महोत्सव ने अपने दायरे में विस्तार भी किया है. इसबार क़रीब 20 नाट्य प्रस्तुतियों को दिल्ली के बाद उत्तर भारतीय शहर लखनऊ में भी ले जाया गया और वहाँ लोगों से लेकर मीडिया के बीच भी रंगमंच चर्चा का विषय बनता, सराहना और उलाहना पाता नज़र आया.

    रंगमंच का एक बड़ा महोत्सव पूरा हो गया है. कुछ सवाल उठे, कुछ नाटक हुए पर कई नाटक अभी भी नेपथ्य में अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं. कई रंगकर्मी अभी भी दिनभर की मेहनत के बाद शाम की रोटी की चिंता में उलझे हैं. कई सवाल अभी भी अनछुए, अनसुलझे हैं.

    ....पर इन सब के बीच महोत्सव की थापों पर एक तान बार-बार सुनाई दे रही है.- तू देख कि क्या रंग है मेरा तेरे आगे.

    इस बार के रंग महोत्सव का थीम था बांग्ला थिएटर. 12 बांग्ला नाटकों की प्रस्तुति महोत्सव में हुई

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