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    बेनेगल की नए गांवो में शूट करना पसंद

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    भारतीय फिल्मउद्योग से 26 वर्ष पहले जुड़े और ग्रामीण भारत पर यर्थाथवादी फिल्में बना चुके प्रख्यात निर्देशक श्याम बेनेगल मानते हैं कि इन दिनों वास्तविक गांव की असुविधाओं को देखते हुए एक नया परंपरागत गांव बसाकर वहां फिल्में शूट करना ज्यादा आसान होगा।

    ग्रामीण भारत पर आधारित तीन शास्त्रीय फिल्मों 'अंकुर', 'निशांत' और 'मंथन' का निर्देशन कर चुके इस निर्देशक का कहना है कि वह नया गांव बसाने में अधिक सुविधा महसूस करते हैं।

    बेनेगल ने लंदन में कहा कि वास्तविक गांव कम खर्चीले लगते हैं लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। लोगों को शूटिंग स्थल से दूर रखने और गांव को फिल्म की आवश्यकता के अनुरूप बनाने में काफी समय खर्च होता है।

    लंदन फिल्मोत्सव में अपनी नई फिल्म के प्रदर्शन के लिए यहां पहुंचे बेनेगल ने कहा, "फिल्म की शूटिंग संबंधी कार्यो से वहां के वास्तविक निवासियों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। मुझे लगता है कि यदि आपके पास पर्याप्त पैसा है और आप नया गांव बना सकते हैं तो आपको ऐसा कर लेना चाहिए। ऐसा करना ज्यादा आसान होगा।"

    बेनेगल भारत के जाने-माने फिल्मकार है। अपनी फिल्मों 'वेलकम टू सज्जनपुर' और लंदन में प्रदर्शित हुई नई फिल्म 'वेल डन अब्बा' से उन्होंने फिर फिल्मों में 'ग्रामीण भारत' विषय की ओर वापसी की है।

    चौहत्तर वर्षीय इस फिल्मकार का कहना है कि अब वह सुदूर स्थित वास्तविक गांवों की अपेक्षा हैदराबाद की 'रामोजी फिल्म सिटी' में काल्पनिक गांव बसाकर शूटिंग करना अच्छा समझते हैं।

    'वेल डन अब्बा' बेनेगल की 24वीं फीचर फिल्म है। बोमन ईरानी की भूमिका वाली इस फिल्म में एक गांव के विकास में हो रहे भ्रष्टाचार को हास्य-व्यंग्य के माध्यम से पेश किया गया है।

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