नन्हीं पिंकी की दौड़ ऑस्कर तक...

वो नन्हीं पिंकी जिस पर बनी लघु डॉक्यूमेंट्री 'स्माइल पिंकी" ऑस्कर के लिए नामांकित हुई है. हिंदी और भोजपुरी में बनी इस डॉक्यूमेंट्री को अमरीका की मेगन मायलन ने निर्देशित किया है.
ये लघु वृत्तचित्र ऐसे बच्चों की कहानी है जो क्लेफ़्ट लिप से पीड़ित हैं यानी जिनके होंठ जन्म से कटे हुए हैं. 'स्माइल पिंकी" के केंद्र में है सात साल की बच्ची पिंकी जो इस बीमारी के कारण हसना-हँसाना कब का भूल चुकी थी.
दरअसल उसका होंठ जन्म से ही कटा हुआ था जिसे क्लेफ़्ट लिप कहा जाता है. इस बीमारी के कारण उसे समाज में, अपने गाँव में और स्कूल में उपहास का केंद्र बनना पड़ा और सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़ा. लेकिन फिर पिंकी को एक चिकित्सा शिविर में जाने का मौका मिलता है और ऑपरेशन के बाद उसकी ज़िंदगी बदल जाती है. निर्देशक मेगन मायलन ने इस बच्ची की ज़िंदगी के इसी हिस्से को कैमरे में क़ैद किया है.
सामाजिक तिरस्कार
बड़ी प्यारी और मासूम बच्ची है पिंकी लेकिन होंठ कटा होने के कारण उसे बहुत चिढ़ाया जाता था. पिंकी ने स्कूल जाना शुरु भी किया था लेकिन छोड़ना पड़ा. उसका बाल सुलभ मन खेलना तो चाहता था लेकिन दूसरे बच्चे उसके साथ खेलते नहीं थे, वो हताश रहने लगी." डॉक्टर सुबोध कुमार सिंह, पिंकी के सर्जन
पिंकी के घर के लोग बताते हैं कि होंठ कटा होने के कारण वो बाक़ी बच्चों से अलग दिखती थी और उससे बुरा बर्ताव किया जाता था.
हमने पिंकी के गाँव फ़ोन लगाकर उसके परिवारवालों से पूछा कि ऑपरेशन के पहले और सर्जरी के बाद उसकी ज़िंदगी कैसी बदल गई है. पिंकी के घर तो फ़ोन नहीं था लेकिन हमने पड़ोसी का फ़ोन नंबर ढूँढा तो उन्होंने पिंकी का नाम सुनते ही तुंरत उसके 'बड़े पापा" से बात करवाई.
वे पुराने दिनों के याद करते हुए कहते हैं, "जन्म से ही पिंकी का होंठ कटा हुआ था. इस कारण सब बच्चे उसको चिढ़ाते थे. कई तरह तरह के गंदे-गंदे नाम से बुलाते थे. बोलने में भी उसको दिक्कत होती थी."
पिंकी की सर्जरी डॉक्टर सुबोध कुमार सिंह ने की है जो स्माइल ट्रेन नाम की संस्था के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में काम करते हैं.
पिंकी की पहले की दशा को याद करते हुए वे कहते हैं, "बड़ी प्यारी और मासूम बच्ची है पिंकी लेकिन होंठ कटा होने के कारण उसे बहुत चिढ़ाया जाता था. पिंकी ने स्कूल जाना शुरु भी किया था लेकिन छोड़ना पड़ा. उसका बाल सुलभ मन खेलना तो चाहता था लेकिन दूसरे बच्चे उसके साथ खेलते नहीं थे, वो हताश रहने लगी."
डॉक्टर सिंह बताते हैं उनका संस्थान सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से ऐसे बच्चों को ढूँढकर उनका नि:शुल्क इलाज करता है. इसी दौरान पिंकी को भी चिकित्सा शिविर आने का मौका मिला.
पिंकी के ताऊ बताते हैं कि जब से पिंकी का ऑपरेशन हुआ है सब प्यार से उसे पिंकी ही बुलाते हैं, बच्ची-बच्ची कहते हैं. अब वो खेल-कूद रही है और बहुत ख़ुश है.
सकुचाती-हिचकिचाती पिंकी से हमने फ़ोन पर बात की तो वो बहुत खुल कर तो बात नहीं कर पाई पर मीलों दूर से भी उसकी आवाज़ में ख़ुशी की खनक और उत्सुकता महसूस की जा सकती थी. पिंकी ने बताया कि वो बहुत ख़ुश है कि उसे पढ़ाई करने का मौका मिल रहा है... लंदन,अमरीका न जाने कहाँ- कहाँ से उसे फ़ोन आ रहे हैं.
स्माइल पिंकी
निर्देशक मेगन मायलन ने पहले पिंकी के जीवन के उस हिस्से को शूट किया जब उसका होंठ कोट हुआ था और लोग उसे उपेक्षा भरी नज़रों से देखते थे.
जब पाँच महीने बाद मेगन दोबारा लौटी तो उन्होंने देखा कि कैसे दुबकी-सहमी पिंकी अब हँसती-कहकहाती पिंकी में बदल गई है, स्कूल ड्रेस पहनकर स्कूल जा रही है.. यही है वृत्तचित्र 'स्माइल पिंकी" जिसे ऑस्कर में नामांकन मिला है.
इस बीमारी के बारे में जानकारी देते हुए डॉक्टर सिंह कहते हैं, "गर्भावस्था के चौथे से 12वें सप्ताह के अंदर होंठ और तालु का विकास होता है. इस दौरान यदि किसी वजह से विकास नहीं हो पाता है तो होंठ या तालु कटे रह जाते हैं. इसके कारणों को लेकर दुनिया भर में शोध चल रहा है ताकि इस बीमारी को होने से ही रोका जा सके या इसकी आशंका कम हो जाए."
डॉक्टर सिंह कहते हैं कि इस बीमार के कारण बच्चों को कई तरह के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दवाबों का सामना करना पड़ता है. उनके मुताबिक भारत में दस हज़ार से ज़्यादा बच्चों को तालु या कटे होंठ होने के कारण ऑपरेशन की ज़रूरत है और हर साल 35 हज़ार बच्चे ऐसे पैदा होते हैं जिन्हें होंठ या तालु कटे होते हैं.
केवल 45 मिनट से दो घंटे के एक ऑपरेशन से इन बच्चों का जीवन बदल सकता है..जैसा कि पिंकी का बदला.
पिंकी अब पूरे गाँव की प्यारी गुड़िया हो गई है.उसके लिए फ़ोन आते हैं तो आस-पास के लोग सब इकट्ठा हो जाते हैं. फ़ोन पर अलविदा लेते-लेते पिंकी के घरवालों ने हमें उनके गाँव आने का न्योता भी दिया..हंसती-हंसाती पिंकी को देखने के लिए.
स्माइल पिंकी नाम की ये डॉक्यूमेंट्री वाकई पिंकी के लिए हंसी-खुशी के पल लेकर आई है.


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