अमरापुरकर 'रंगमंच' के रंगों में रंग थे, जो रंग चला गया
1950 में जन्में सदाशिव अमरापुरकर आज भले ही हमारे बीच नहीं है लेकिन उन बेहतरीन अभिनेताओं में से थे जिन्होंने रंगमंच की दुनिया से लेकर सिनेमाई दुनिया के रंगीन पर्दे पर अपनी कला का रंग चढ़ाया। 80, 90 के दशक के पसंदीदा विलनों से एक अमरापुरकर ने थियेटर से लेकर फिल्मी जगत तक कई अवार्ड जीते। लेकिन नए कलेवर लिए आगे बढ़ रहा बॉलीवुड 90 के दशक के बाद मानो अमरापुरकर जैसे कलाकारों की अहमियत भूल गया।

रंगमंच के जानकार बताते हैं कि अमरापुरकर ने थियेटर और फिल्मी दुनिया को एक अलग ही अंदाज में जिया। उनकी पहचान इसी से होती है कि जब वह थियेटर में हुए तो सिनेमाई होते और रंगमंच पर होते तो उतने ही लाउड औऱ उतने ही मंझे हुए कलाकार की तरह।
दिल्ली के थियेटर में काफी समय से सक्रिय ग्रुप पूर्वाभ्यास थियेटर ग्रुप चला रहे औऱ कई रंगमच नाटकों के निर्देशक सुभाष रावत अमरापुरकर के बारे में इस तरह कहते हैं- ''अमरापुरकर उन कलाकारों में रहे जो थियेटर को भी भरपूर जीते औऱ फिल्मी दुनिया को भी। अमरापुरकर को थियेटर में देखकर नहीं पहचाना जा सकता था कि यह फिल्मी कलाकार भी हैं और इसी तरह रंगमंच पर उतरने के बाद उन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह फिल्मी दुनिया में हैं वह इस बारीक लाइन को बखूबी समझते"
अमरापुरकर की उपलब्धियां-
1984- अर्ध सत्य के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर अवार्ड
1991- सड़क के लिए बेस्ट विलन का अवार्ड
1991- फिल्मफेयर अवार्ड-सड़क
अमरापुरकर की सबसे कामयाब फिल्मेंः
अमरापुरकर ने क़रीब 250 फ़िल्में की। जिनमें अर्ध सत्य, सड़क, हुकुमत, आंखें, इश्क़ कामयाब शिखर तक पहुंची। इनमें से इश्क फिल्म ऐसी रही कि जिसने वर्तामान युवा वर्ग को अमरापुरकर से रूबरू कराया था।


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