दबंगई का उत्सव

By Staff
दबंगई का उत्सव

विनोद वर्मा

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में 12 सितंबर को पुलिस के जवानों ने एक सिनेमाघर के गार्ड को पीट-पीटकर मार डाला. ये जवान शहर के पुलिस कप्तान यानी एसपी साहब की सुरक्षा में लगे हुए थे. गार्ड की ग़लती यह थी कि उसने सादे कपड़ों में सिनेमा देखने पहुँचे एसपी साहब को नहीं पहचाना और उन्हें सही रास्ते से बाहर निकलने की सलाह दे दी. जवानों को यह बर्दाश्त नहीं हुआ.यह सिर्फ़ संयोग नहीं है कि कप्तान साहब अपने जवानों के साथ फ़िल्म 'दबंग" देखकर निकल रहे थे.

'दबंग" सलमान ख़ान की नई फ़िल्म है जो 10 सितंबर को रिलीज़ हुई है. फ़िल्म समीक्षक और बहुत से सिनेमाप्रेमी इस फ़िल्म की सराहना करते थक नहीं रहे हैं. वे प्रकारांतर से बता रहे हैं कि यह बहुत सफल फ़िल्म है, इसने हिंदी सिनेमा का एक नया व्याकरण रचा है, इसने सलमान के रुप में एक नया सुपरहीरो खड़ा कर दिया है आदि आदि.

अगर 12 सितंबर को पुलिस के जवानों ने उस गार्ड को पीट-पीटकर नहीं मारा होता तो फ़िल्म की सफलता पर संदेह होने लगता. इस घटना से मन में एक आश्वस्ति का भाव उभरता है कि फ़िल्म अपना संदेश देने में सफल हुई है. यह फ़िल्म की व्यावसायिक ही नहीं बल्कि सामाजिक सफलता भी है.

जिन लोगों ने यह फ़िल्म नहीं देखी है उनके लिए बता दें कि यह एक पुलिस अधिकारी पर बनी फ़िल्म है. यह अधिकारी ही 'दबंग" है. वह उत्तर प्रदेश के किसी स्थान पर पदस्थ है लेकिन उसमें वह सारे गुण विद्यमान हैं जिसके लिए भारत में पुलिस बदनाम है. वह असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर है. नाम है चुलबुल पांडे लेकिन वह अपने आपको रॉबिनहुड पांडे कहता है. वह डकैतों को बहुत बहादुरी से घेरता है लेकिन उन्हें गिरफ़्तार नहीं करता. वह लूट का पैसा ख़ुद हड़प लेता है और डकैतों को छोड़ देता है. वह भ्रष्ट छुटभैये नेता को आँख दिखाता है लेकिन उसके भ्रष्ट आका से, जो प्रदेश का गृहमंत्री भी है, हाथ मिलाता है.

वह अपनी तरक़्की के लिए शराब में मिलावट करके लोगों की जान ख़तरे में डाल सकता है और अपने किसी सिपाही की पदोन्नति के लिए उसे गोली मारकर झूठी रिपोर्ट लिखने की सलाह भी दे सकता है. चुलबुल पांडे राह चलते एक लड़की को एक बार देखकर उससे शादी करने का फ़ैसला भी कर सकता है. वह शादीशुदा होते हुए भी शराब पीकर एक नाचने वाली एक लड़की के साथ 'तू एटम बम हो गई मेरे लिए" भी गा सकता है. वह अपने सौतेले पिता को 'पांडे जी" कहकर पुकारता है. उसके भ्रष्टाचार की कमाई उसकी सरल सी दिखने वाली माँ बहुत जतन से संभालती है. कुल मिलाकर वह सर्वगुण संपन्न है और अपने सीधे सादे भाई को मंदबुद्धि कहकर दुत्कारता रहता है.

यह ऐसा समय है जब हमने टेलीविज़न की स्क्रीन पर पुलिस वालों के असली कारनामे देखे हैं, जब हम हर दिन उनके नए क़िस्सों से वाकिफ़ हो रहे हैं. कहीं छोटी चोरी के जुर्म में पकड़े जाने पर पेड़ पर लटका कर पीटते हुए. कहीं एक बच्चे को मोटर साइकिल से बांधकर घसीटते हुए. किसी गैंगस्टर की पार्टी में नाचते हुए. किसी मंत्री या मुख्यमंत्री के कहने पर फ़र्ज़ी मुठभेड़ करते हुए और भ्रष्ट नेताओं की जी हज़ूरी करके पदोन्नति पाते हुए. यह ऐसा समय है कि एक आईपीएस अधिकारी छेड़छाड़ के लिए दोषी ठहराया जा चुका है, एक अपनी कथित प्रेमिका की हत्या के जुर्म में जेल में है तो कई फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामले में अभियुक्त बने हुए हैं. अख़बारों की सुर्खियाँ बता रही हैं कि किस अधिकारी के यहाँ छापे में कितने -कितने करोड़ रुपयों की संपत्ति का पता चल रहा है.

तो ऐसे समय में इस पात्र की रचना आश्चर्यचकित नहीं करती. जैसा कि 'अब तक छप्पन" का एनकाउंटर स्पेशलिस्ट नहीं करता, 'राम लखन" का लखन नहीं करता और 'देव" का पुलिस कमिश्नर नहीं करता.

चकित तो जनता की प्रतिक्रिया करती है जो चुलबुल पांडे के हर उस कारनामे पर ताली पीट रही है जो ग़ैर-क़ानूनी है. यह वही जनता है जिसने अन्याय से नाराज़ एक पुलिस अधिकारी को 'ज़जीर" में सिर पर बिठा लिया था. जिसने 'अर्धसत्य" में एक पुलिस वाले की कुंठा को अपने आपसे जोड़कर देखा था. ऐसा नहीं है कि इससे पहले हिंदी सिनेमा में भ्रष्ट पुलिस अधिकारी का कोई चित्रण नहीं हुआ. कई बार हुआ. लेकिन या तो वह खलनायक के रुप में दिखा या फिर फ़िल्म के आख़िरी रील आते-आते तक पटरी पर आ गया. लेकिन इस बार मामला कुछ अलग है. चुलबुल पांडे भ्रष्ट है और उसे अपने भ्रष्ट होने पर गर्व है. वह क़ानून तोड़ता है और उसे अपना हक समझता है. एक तो वह किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है. यदि है भी तो उसे उन लोगों को भी भ्रष्ट तरीक़ों से ख़रीदने की कला आती है. सबसे बड़ी बात है कि यह सब करते हुए वह खलनायक नहीं है. नायक है. हीरो है.

तर्क दिया जा सकता है कि 'दीवार" का हीरो भी आख़िर में शशि कपूर नहीं था, अमिताभ बच्चन था जो एक तस्कर था. 'दयावान" और 'अग्निपथ" के हीरो भी मुजरिम थे. लेकिन हमें याद रखना होगा कि उनका हश्र अंतत: वही हुआ था जो एक ग़ैर-क़ानूनी काम करने वाले का होना चाहिए. ऐसे कई और उदाहरण दिए जा सकते हैं. लेकिन 'दबंग" का उन सबसे अलग फ़िल्म है. इस फ़िल्म में खलनायक की सारी ख़ूबियों वाला चरित्र पूरी फ़िल्म में नायक बना रहता है और आख़िर में भी विजेता बनकर उभरता है. वह अपने आख़िरी संवाद में भी अपने भ्रष्टाचार की स्वीकारोक्ति दोहराता है और फिर गर्व से दर्शकों की ओर देखता है. चुलबुल पांडे का सौतेला पिता कहता है, 'यह हैप्पी एंडिंग है".

इस बार जनता एक पुलिस वाले की उन सारी हरकतों पर सीटी बजा रही है जिसे देखकर उसे बुरा लगना चाहिए. एक शराबी बाप को छुड़वाने पुलिस चौकी पहुँची एक नवयुवती को चौकी इंचार्ज के कहने पर सिपाही बारी-बारी से ऐसे अश्लील चुटकुले सुनाते हैं जिसे कोई भी व्यक्ति अपने घर पर या सार्वजनिक रुप से नहीं सुना सकता. लेकिन जनता को ग़ुस्सा नहीं आ रहा है, मज़ा आ रहा है. कहने को चुलबुल पांडे क़ानून का रखवाला है लेकिन इस फ़िल्म में वह सरकारी क़ानून को जूते की नोंक पर रखता है और अपने क़ानून ख़ुद बनाता है. लेकिन इस पर किसी को आपत्ति नहीं है.

शायद इस बात पर कोई विचार ही नहीं कर रहा है कि एक फ़िल्म के ज़रिए ही सही हम एक असामजिक व्यवस्था को स्वीकार्यता प्रदान कर रहे हैं. बिना किसी मजबूरी के. ख़ुशी-ख़ुशी. बिलासपुर में हुई घटना को अपवाद मानना एक भूल भी हो सकती है. हो सकता है कि मेरे-आपके शहर में कई असिस्टेंट पुलिस अधिकारियों को और उससे बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को चुलबुल पांडे की तरह दबंग बनने की इच्छा सताने लगे. तब क्या होगा? सत्ता प्रतिष्ठान पहले से छप्पन छेदों वाली छलनी है. वह सब को नापता रहता है कि कौन किस छेद से पार हो सकता है. शिष्टाचार शुल्क पटाओ और छेद के पार चलो.

ऐसे में आश्चर्य इस बात का है कि अच्छे ख़ासे विचारवान लोग इस फ़िल्म को मनोरंजक पा रहे हैं. पता नहीं अपनी मर्ज़ी से या फिर फ़िल्म समीक्षक की सलाह पर वे 'अपना दिमाग़ घर पर छोड़कर" फ़िल्म देख रहे हैं. एक पढ़ा-लिखा पत्रकार कह रहा है कि उसने सीटियाँ बजा-बजाकर यह फ़िल्म देखी. हर तरह की हिंसा से भरी इस फ़िल्म में उन्हें हिंसा नज़र नहीं आ रही है.

यह अंदाज़ा तो था कि समाज ने अपनी बहुत सी बुराइयों को स्वीकार कर लिया है. लेकिन यह संकेत डरावना है कि अब उसे एक लंपट क़िस्म का पुलिस अधिकारी जो सर से पाँव तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, लोगों को मनोरंजक लग रहा है. भ्रष्ट आचरण अगर गुदगुदा रहा है तो यह कहीं यह कोई कुंठा तो नहीं?

वैसे 'दबंग" कोई अकेली फ़िल्म नहीं है जो भ्रष्टाचार और अश्लीलता का उत्सव मना रही है. हाल ही में बनी कई फ़िल्में 'बुरे" का महिमामंडन करती हैं और आख़िर में औपचारिकता के तौर पर 'बुरे का अंत बुरा" बता देती हैं. लेकिन पूरी फ़िल्म में बुरे कर्म करने वाला व्यक्ति सामाजिक रुप से सफल दिखता रहता है. उसके पास धन और ऐश्वर्य किसी चीज़ की कमी नहीं होती. इस कड़ी में प्रकाश झा की हाल ही में आई फ़िल्म 'राजनीति" का नाम लिया जा सकता है. इन फ़िल्मों को देखने के बाद भारतीय सेंसर बोर्ड की उदारता पर आश्चर्य होता है. साथ में उसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े करने को जी चाहता है.

यह कहा जा सकता है कि एक फ़िल्म को लेकर इतना संवेदनशील होने की ज़रुरत नहीं है. फ़िल्में इतनी गंभीरता से नहीं देखी जानी चाहिए. वे मनोरंजन के लिए बनाई जाती हैं और उन्हें उसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए. लेकिन ऐसा है नहीं. क्योंकि ऐसे तर्क 'फ़ायर", 'वॉटर", 'परज़ानिया" और 'ब्लैक फ़्राइडे" के समय सामने नहीं आते. ऐसा नहीं हो सकता कि एक विषय पर बनी फ़िल्म पर आपत्ति हो और दूसरी को सिर्फ़ मनोरंजन की दृष्टि से देखा जाए.

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