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    रावण ने रचा नया इतिहास

    By Staff
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    भावना सोमाया, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

    हमने हाल में प्रकाश झा की फ़िल्म राजनीति देखी जो आज के दौर की महाभारत थी. इस हफ़्ते रिलीज़ हुई है रावण जो मणि रत्नम की आज के दौर की 'रामायण" है. इसमें कुछ किरदार और परिस्थितियाँ रामायण से मिलती-जुलती हैं और कुछ किरदार एकदम अलग. रत्नम की रावण आज के परिवार और समाज की कहानी है जहाँ राम में रावण है और हर रावण में राम.

    इस फ़िल्म के ज़रिए एक नया इतिहास रचने के लिए मैं निर्देशक मणि रत्नम को सलाम करती हूँ. अभिषेक बच्चन ने दस सर वाले रावण को अपने दिल से ज़्यादा आवाज़ और शरीर से प्रस्तुत किया है जो इस किरदार के लिए ज़रूरी था. गोविंदा हनुमान की भूमिका में दिलचस्प हैं. ऐश्वर्या राय पुरानी सीता की तरह न रोती है, न टूटी है बल्कि पूरे जोश और लगन के साथ अपने दुश्मनों से लड़ती है.

    बीरा और रावण

    कहा जाता है कि राम और सीता पहले शिव के मंदिर में मिले और बाद में राम ने सीता का हाथ स्वयंवर में जीता था. फ़िल्म रावण के देव और रागिनी पहले से ही शादी-शुदा हैं. देव एक कामयाब पुलिस इंस्पेक्टर है और रागिनी एक डांस टीचर है. राम को वनवास कैकई ने भेजा था. इंस्पेक्टर देव की पोस्टिंग लालमत्ती आदिवासी इलाक़े में इसलिए होती है क्योंकि वो पुलिस विभाग के सबसे बहादुर सिपाही हैं.

    सीता रावण के भेजे हुए सुनहरी हिरण से मोहित हुई थी. रागिनी बीरा के भेजे हुए फड़फड़ाते पक्षी से आकर्षित होती है. रावण और बीरा की जंग की वजह उनकी बहन थी. दोनों को अपनी बहन के अपमान का बदला चाहिए.

    अलग है ये सीता

    मणि रत्नम का लक्ष्मण अपनी भाभी के आगे रेखा नहीं खींचता. न ही रागिनी सीता की तरह अपने गहने रास्ते में बिखेरती हुई जाती है. वो आज़ाद है और उसे पूरा विश्वास है कि राम उसे कहीं से भी खोज लेंगे. संजीवनी यानी हनुमान अपने आदर्श को राक्षस की दहलीज़ तक ले जाते हैं और उसके पहले रागिनी के पास देव के दूत बनकर पहुंचते हैं. रागिनी पहचान का सुबूत नहीं माँगती बल्कि उन्हें देखते ही उन पर विश्वास करती है.

    ये हनुमान लंका को नहीं जलाता बल्कि बीरा के आगे शांति का प्रस्ताव रखता है. रामायण में भले ही रावण का भाई विभीषण राम का साथी बनता है लेकिन फ़िल्म में देव विभीषण से धोखा करता है. देव प्रताप सिंह भी अपनी पत्नी से अग्निपरीक्षा माँगता है मगर रागिनी अग्निपरीक्षा से इनकार करती है. ये सीता राम से दुखी होकर वाल्मिकी के आश्रम में नहीं जाती, वो सीना तानकर रावण से कुछ सवाल पूछने आती है.

    तकनीकी टीम का कमाल

    कुछ फ़िल्में हम उनकी कहानी के लिए देखते हैं और कुछ कहानी की ट्रीटमेंट के लिए. रावण ऐसी ही फ़िल्म है जिसे उसकी ट्रीटमेंट के लिए देखा जाना चाहिए. इसका सेहरा बंधता है पूरी तकनीकी टीम को- संतोष सिवान को रोचक दृश्यों के लिए, श्याम कौशल को ख़तरनाक ऐक्शन के लिए और समीर चंदा को कला डिज़ाइन के लिए. अभिनेत्री शोभना को शास्त्रीय कोरियोग्राफ़ी के लिए दाद देनी होगी तो गुलज़ार को स्फ़ूर्ति भरे गीतों के लिए-जैसे बहने दे.रहमान का संगीत शानदार है.

    ऐसा नहीं है कि फ़िल्म में ख़ामियाँ नहीं हैं-बहुत सारी हैं. कहानी कमज़ोर है और क्लाइमेक्स बहुत लंबा है. कुछ डॉयलॉग बेतुके लगते हैं जैसे जब विक्रम अपने पूरी तरह से टूटे हुए साथी को पूछता है कि तुम ठीक हो, तो हँसी आती है. कुछ दृश्य जैसे बीरा की बहन की शादी अतिश्योक्ति के दायरे में आते हैं. मगर हर दृश्य इतना ख़ूबसूरत है कि आप सब कुछ माफ़ कर देते हैं. इतने कठिन लोकेशन पर शूटिंग करने के लिए मैं पूरी यूनिट की दाद देती हूँ. रावण एक प्रगतिशील विचारधारा है और हम आभारी हैं रत्नम के....हमें एक नई सीता से मिलाने के लिए.

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